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OPINION: गंगा की कहानी... वादे तो बहुत हुए, वो हकीकत में कब बदलेंगे

News18Hindi
Updated: November 26, 2019, 6:11 PM IST
OPINION: गंगा की कहानी... वादे तो बहुत हुए, वो हकीकत में कब बदलेंगे
गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए सरकार की तरफ से 'क्लीन गंगा' प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है.

सेक्शन 43 के मुताबिक गंगा (Ganga) के अंतर्गत जो बाढ़ का क्षेत्र आता है वहां पर किसी भी तरह की गतिविधि पर रोक लगाई जाएगी. तो इस बाढ़ प्रभावित इलाके में जो लाखों लोग रहते हैं वो क्या करने वाले हैं?

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  • Last Updated: November 26, 2019, 6:11 PM IST
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 ये वो अदालत है जो ना कभी देखी गई और ना सुनी गई, ये मुलज़िमान और वक़ील--सफाई की गैरमौजूदगी में फैसला कर रही है. वाह री अंग्रेजी सरकार वाह तेरे कानून. ये संवाद 1965 में भगत सिंह की जिंदगी पर बनी फिल्म का संवाद है. जो उस समय बोला जाता है जब भगत सिंह और उनके साथियों की बात सुने बगैर उनकी गैर मौजूदगी में उनके खिलाफ अंग्रेजी सरकार फैसला ले रही होती है.

अब ज़रा एक मिनट के लिए आंख बंद कीजिए और वर्तमान में आइए. फर्ज कीजिए कि आपके सामने गंगा है जिसका अपराध बस इतना है कि वो बहना चाहती है. कानून बनाने वाले अंग्रेजी हुकूमत नहीं है. बल्कि ये कानून आज़ाद भारत के संविधान के तहत बनाया गया है.  जिसके लिए कानून बनाया जा रहा है उसे हम सदियों से मां कहते आ रहे हैं. ये वही मां है जिसकी रक्षा करने के लिए अरबों रुपए लगाए जा चुके हैं. ये वही मां है जिसकी जीवन बचाने के लिए बाबा नागनाथ (मणिकर्णिका घाट के मंहत), जी.डी अग्रवाल (स्वामी सानंद), जैसे लोग अपनी जान दे चुके हैं.

अब हमारी मां यानी राष्ट्रीय नदी गंगा (पुनर्जीवन, संरक्षण एवं प्रबंधन)  ड्राफ्ट बिल 2018, संसद में रख गया है. इस बिल में जुर्माने, सजा जैसी सजावटी बातों पर अच्छी तरह से ध्यान दिया गया. लेकिन कमाल की बात ये है कि इसमें सब कुछ है पर गंगा और उसका गंगत्व नहीं है. इसमें गंगा की अविरलता नहीं है, निर्मलता नहीं है.


दरअसल इस बिल का चौथा अध्याय बगैर बाधा के गंगा के बहाव और इसकी गुणवत्ता को बचाए रखने की बात करता है. इसी अध्याय के सेक्शन 7 में उल्लेखित है कि गंगा में  न्यूनतम पानी का बहाव का ध्यान रखा जाए.  गंगा और उसकी बड़ी सहायक नदियों के जल प्रबंधन और ईकोसिस्टम के संरक्षण का खास खयाल रखा जाए. अब सवाल यहां ये आता है कि कैसे?  उत्तराखंड के पांचों प्रयाग तो बांध की भेंट चढ़ चुके हैं. जिस ईकोसिस्टम और फ्लोरा फॉना की बात की जा रही है उसे तो ध्वस्त किया जा चुका है. गंगा का गंगत्व यानी बैक्टिरियोफेज जिसकी वजह से गंगा का पानी कभी खराब नहीं होता है वो अब खुद को बचा नहीं पा रहा है. टिहरी के बाद जहां से भागीरथी और अलकनंदा मिलकर गंगा बनाती है वहीं से गंगा में मौजूद बैक्टीरियोफेज की मात्रा में भारी कमी ( 90 फीसद) हो जाती है. तो क्या बिल आ जाने के बाद सरकार वो तमाम बांध और जो लगातार बनाए जा रहे हैं उनका निर्माण बंद कर देगी. ड्राफ्ट को पढ़ कर तो ये नहीं लगता है क्योंकि बिल ने भले ही गंगा की परिभाषा में परिवर्तन करते हुए नई परिभाषा में अब पंच प्रयागों पर मिलने वाली सभी धाराओं को गंगा की परिभाषा में शामिल किया है (पहले गोमुख से गंगासागर तक को शामिल किया जाता था) .  लेकिन इस मसौदे में गंगा पर बांध बनाने को स्वीकार किया गया है, मगर गंगा के प्रवाह को बनाए रखने की शर्त को भी जोड़ा गया है.

आगे अगर अध्याय 13 के सेक्शन 40 पर नज़र डालें तो मालूम चलता है कि गंगा के तट पर जेट्टी या पोर्ट, और स्थायी हाइड्रोलिक संरचना का निर्माण किसी भी तरह के स्टोरेज या जिससे नदी के प्रवाह पर असर पड़ता है, बगैर पूर्व इजाज़त के नहीं किया जा सकता है. यानी गंगा या उससे जुड़ी किसी भी सहायक नदी पर आपको किसी भी तरह का कुछ व्यवधान पैदा करना है तो सरकार से पूर्व से इजाज़त लेना ज़रूरी होगा. इस नियम के लागू होते ही क्या उस जलमार्ग को भी बंद कर दिया जाएगा जिसके उद्घाटन के लिए वाराणसी में गतवर्ष एक विशाल जलसे का आयोजन किया गया था. सवाल है कि गंगा के रेवेन्यू मॉडल बनाए जाने के सपने का क्या होगा. लेकिन शायद इसीलिए इस कानून में पूर्व इजाज़त को शामिल किया गया है. अब गंगा में किराए से ट्राला ले जाकर मछली पकड़ने वाले कई छोटे छोटे मछुआरे जो गंगा के किनारे ही कोई ठिकाना बना कर वहां अपना ट्राला लगा दिया करते थे उनको तो इस कानून के बन जाने के बाद इजाजत मिलने से रही लेकिन जहाजरानी मंत्रालय ने चूंकि पूर्व इजाजत ले रखी है तो उसके निर्माण में कोई व्यवधान पैदा नहीं होगा.

सेक्शन 41 और 44 के तहत किसी भी तरह के भूमिगत जल के दोहन पर रोक है. यानी गंगा के दोनों किनारों पर एक किलोमीटर तक के क्षेत्र  को जल बचत क्षेत्र घोषित किया जाएगा लेकिन वहीं जलशक्ति मंत्री ने तो हर घर, हर नल जल का सपना देख रखा है जिसके लिए गंगा के किनारे बोरवेल लगाने की तैयारी भी की जा रही है.


सेक्शन 43 के मुताबिक गंगा के अंतर्गत जो बाढ़ का क्षेत्र आता है वहां पर किसी भी तरह की गतिविधि पर रोक लगाई जाएगी. तो इस बाढ़ प्रभावित इलाके में जो लाखों लोग रहते हैं वो क्या करने वाले हैं.
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घरों की नालियां अगर गंगा में मिलती है तो उस पर जुर्माने का प्रावधान रखा गया है लेकिन कोई औद्योगिक नाला पूर्व अनुमति या ट्रीटेट वॉटर यानी शोधित जल वाली बात के साथ गंगा में मिल सकता है.

क्लीन गंगा प्रोजेक्ट के बाद भी गंगा नदी के किनारों पर गंदगी की भरमार है.


गंगा पर क्या बनेगा, क्या नहीं बनेगा, कौन बनाएगा, कौन नहीं बनाएगा, कितना बनाएगा, कितना नहीं बनाएगा, कुल मिलाकर निर्माण से जुड़े वो सब पहलू हैं जो गंगा को एक कमाई का जरिया बनाने के लिए काफी हैं वो सब पूर्व अनुमति से निर्धारित होंगे. जैसा कि इस एक्ट को बोला जा रहा है कि ये पुनर्जीवन, संरक्षण एव प्रबंधन के लिए हैं. तो इसमें गंगा का पुनर्जीवन यानी इसमें मौजूद गंगा को गंगा बनाने वाले तत्व (बेक्टीरियोफेज) के बारे में कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं है. जहां तक संरक्षण की बात है तो यहां संरक्षण से मतलब उस पानी के संरक्षण से है जो कमाने के साधन उपलब्ध करवाता रहे, कमाई और लाभ भी सत्ता का, गंगा के किनारे रहने वाले और इससे अपनी जिंदगी को संरक्षित करने वालों को तो इस एक्ट के तहत जुर्माने का अधिकारी बना दिया गया है. रही बात प्रबंधन की तो वो ठीक से किया जा रहा है कि किस तरह गंगा को प्रबंधित करके उसे अपने हाथों की कठपुतली बना लिया जाए.

आज संविधान दिवस है. जब संविधान का निर्माण हो रहा था तो उस दौरान एक बात चली कि गाय या दूसरे के जीने के अधिकार को भी मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाए. अंबेडकर ने इस बात पर घोर आपत्ति जाहिर की और मामला आगे नहीं बढ़ पाया. सोचिए गाय के लिए मौलिक अधिकार की मांग करने वाले हम लोग आज़ादी से पहले से इस देश में रहते आ रहे हैं और गंगा जो हमारे अस्तित्व में आने से पहले से मौजूद है या यूं कहिए जिसके होने से हमारा अस्तित्व आकार ले सका. हम उसे बहने का अधिकार नहीं दे पा रहे हैं. जिस अंग्रेज हुकूमत ने एकतरफा फैसले लिए, उसी अंग्रेजी हुकूमत से जब गंगा महासभा के महामना मदन मोहन मालवीय और अन्य सदस्यों ने हर की पैड़ी (नहर) निर्माण के वक्त आपत्ति जताते हुए कहा था कि आज के बाद गंगा पर किसी भी तरह के निर्माण से पहले उनसे पूछना ज़रूरी होगा. अंग्रेजी हुकूमत इस बात पर राजी हुई थी और कभी अपनी कथनी से पीछे नहीं हटी. और हमारी सरकारें सत्ता में आते ही गंगा पर सिर्फ निर्माण किए जा रही है और ये नया कानून तो एक मिसाल है.

हरिशंकर परसाई ने निठल्ले की डायरी में लिखा है कि, उसकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता है, वही चोर से कहता है की चोरी कर और वही पहरेदार से कहता है की जागता रह. ये बात उन्होंने ऊपरवाले (ईश्वर) के लिए लिखी थी लेकिन यहां आते आते ऊपरवाले की परिभाषा बदल गई है.

(नोटः यह लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: November 26, 2019, 5:43 PM IST
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