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भुखमरी की कगार पर झारखंड का ये गांव, यहां किसी के पास नहीं है राशन कार्ड

मोनोवारा

मोनोवारा

एक ओर जहां पास के सभी गांवों में राशन मिलता है वहीं चंद्रपाड़ा के निवासियों को चावल के एक निवाले के लिए, शहर जाना पड़ता ...अधिक पढ़ें

    देबायन रॉय
    साल 2005 में जब मोनोवरा के बड़े बेटे की मौत हुई थी तो उसके घर में दुख का माहौल नहीं, बल्कि चिंता की लकीरें थीं. मोनोवरा को अब अपने 8 साल के बच्चे के पालन-पोषण के लिए कोई काम शुरू करना होगा. विधवा पेंशन और राशन के बिना वह इस बात का इंतजार नहीं कर सकती थी कि उसका 8 साल का बेटा इतना बड़ा हो जाए कि वह काम कर सके.

    बेटे की मौत के 13 साल बाद भी मोनोवरा झारखंड के पाकुड़ जिले के चंद्रपाड़ा गांव में एक झोपड़ी में रहती है और अपने बच्चे की मदद से बीड़ी बेचकर घर का खर्च चलाती है. रीढ़ में दर्द होने की वजह से मोनोवरा को यह एहसास हुआ कि वह आसपास के गांव में घरेलू सहायिका का काम नहीं कर सकती, न ही वह कहीं अस्थायी तौर पर मजदूरी का काम कर सकती है. वह रोजाना 250 बीड़ी बना लेती है. कई दिन जब बच्चे ज्यादा बीड़ी नहीं बेच पाते हैं तो उस दिन उन्हें पड़ोसियों से खाना मांगना पड़ता है या फिर भूखे ही सोना पड़ता है.

    पाकुड़ जिले के इशकपुर पंचायत से पश्चिम में कुछ किलोमीटर दूरी पर स्थित चंद्रपाड़ा गांव में भी बाकी गांवों की तरह अव्यवस्थित सड़कें हैं और न ही वहां नौकरी देने वाला कोई उद्योग है. गांव में करीब तीन हजार लोग रहते हैं, जिनमें अधिकतर बांग्लाभाषी मुस्लिम हैं.

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    उन लोगों को सूची जिन्हें चाहिए राशन- Photo: Debayan Roy


    बीड़ी बनाते हुए मोनोवरा कहती हैं, आप यह दर्द नहीं समझेंगे, हमें खाने के लिए बहुत काम करना पड़ता है. उसने कहा, 'मेरे पास राशन कार्ड नहीं है. मैं इसकी वजह भी नहीं जानती कि मुझे राशन कार्ड क्यों नहीं दिया गया. जब भी मैं ऑफिस जाती हूं तो मुझे दोबारा आने के लिए कहा जाता है.'

    मोनोवरा और उसके 8 बच्चे घर चलाने के लिए बीड़ी बनाते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पसंद कि उनकी बेटी भी इस काम में लगे. उन्होंने कहा, 'यहां तक कि मुझे मेरी बेटी को भी बीड़ी बनाने के काम में लगाना पड़ता है. जिन दिनों में मेरे पैसा नहीं होता, मुझे पेट भरने के लिए पड़ोसियों से खाना मांगना पड़ता है.'

    गांव के लोगों की बोली तो बांग्लादेशियों से थोड़ी अलग है. बीते 30 साल से मस्जिद में आज़ान देने का काम कर रहे उस्ताद नूर कहते हैं, 'यहां की भाषा को लेकर सरकारी दस्तावेज़ सारे भ्रम दूर करते हैं. पाकुड़ की मुख्य भाषा बंगाली, संथाल, पहाड़िया और हिन्दी भी है.'

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    कुद्दू शेख-Photo: Debayan Roy


    भाषा के मुद्दे पर भले ही कोई भ्रांति हो, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि झारखंड के 1250 गांवों को राशन कार्ड मिल गया, लेकिन इस गांव में किसी भी परिवार को राशन कार्ड नहीं दिया गया. इसे लेकर नूर कहते हैं कि सिर्फ उनके गांव को राशन कार्ड नहीं दिया गया है.

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    ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों एक पूरा गांव राशन कार्ड की सुविधा से दूर है? यहां 'दादा' कहकर पुकारे जाने वाले मोहम्मद मुजफ्फर हुसैन के पास न सिर्फ जिलाधिकारी को लिखे कागजात हैं, बल्कि वह कई अधिकारियों से भी मिल चुके हैं, लेकिन इसका कोई हल नहीं निकला.

    गांव वालों का दावा है कि उन्हें साल 2011 की जनगणना से भी बाहर कर दिया गया, जिसका परिणाम यह है कि किसी को राशन कार्ड नहीं मिल सका.

    हुसैन कहते हैं, 'साल 2011 की जनगणना के मुताबिक इशकपुर पंचायत में 5 गांव हैं. चंद्रपाड़ा भी इसमें शामिल है. चंद्रपाड़ा गांव के आधे लोगों को जनगणना में शामिल किया गया, लेकिन आधे को छोड़ दिया गया. गांव का जो हिस्सा छोड़ा गया है, वहां के लोगों के पास राशन कार्ड नहीं है.'

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    आधार कार्ड दिखाती महिला- Photo: Debayan Roy


    हुसैन जब यह बात कह रहे थे, तभी करीब 100 महिलाएं वहां इकट्ठा हो गईं, उनमें से अधिकतर के पास आधार और वोटर कार्ड तो है, लेकिन राशन कार्ड नहीं है.

    एक ओर जहां पास के सभी गांवों में राशन मिलता है, वहीं चंद्रपाड़ा के निवासियों को चावल के एक निवाले के लिए पैसे कमाने को शहर जाना पड़ता है. गांव के कई लोगों, खासतौर से बुजुर्गों को भूख मिटाने के लिए भीख या फिर मस्जिद से इकट्ठा चंदे के भरोसे रहना पड़ता है.

    पैसे की कमी के चलते राशन नहीं खरीद पाने वाले लोगों के लिए गांव की स्थानीय मस्जिद ने एक फंड बनाया है. गांव के लोग उस फंड से चावल और दाल खरीदने के लिए 5 रुपये ले सकते हैं.

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    कुछ ऐसी ही दास्तां 63 वर्षीय कुद्दु शेख की भी है. उन्हें मस्जिद से पैसे मिलने का इंतजार रहता है.  शेख बताते हैं, 'मैं बीते 40 साल से इसी गांव में हूं. पहले हम राशन कार्ड पाने के लिए स्कूल मास्टर को पत्र लिखते थे, लेकिन कभी नहीं मिला. चंद्रपाड़ा के एक हिस्से को राशन कार्ड मिला है, लेकिन दूसरा हिस्सा छूटा हुआ है. हमसे ऑनलाइन रजिस्टर करने के लिए कहा गया, लेकिन वह भी काम नहीं आया.'

    (News18  ने पाकुड़ के उप आयुक्त, दिलीपुर कुमार झा, पाकुर के उप आयुक्त, जितेंद्र कुमार देव, तक पहुंचने की कोशिश की. हालांकि, दोनों की टिप्पणी नहीं मिल सकी.)

    Tags: Jharkhand news

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