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30 साल में पहाड़ काटकर बना दी 3 KM लंबी सड़क, लोग बोले- ये हैं एक और दशरथ माझी

30 साल में पहाड़ काटकर बना दी 3 KM लंबी सड़क, लोग बोले- ये हैं एक और दशरथ माझी

ओडिशा के नयागढ़ जिले के तुलुबी गांव के हरिहर बेहरा ने 30 साल में पहाड़ काटकर बना दी तीन किलोमीटर की सड़क.

ओडिशा के नयागढ़ जिले के तुलुबी गांव के हरिहर बेहरा ने 30 साल में पहाड़ काटकर बना दी तीन किलोमीटर की सड़क.

हर तरफ से मिली नाकामी के बाद हरिहर बेहरा ने वो कर दिखाया, जिसकी कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था. हरिहर बेहरा ने अपने भाई के साथ मिलकर 30 साल में पहाड़ काटकर सड़क बना दी, लेकिन इस दौरान उन्‍होंने अपने भाई को खो दिया.

    नई दिल्‍ली. कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…! इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है ओडिशा के नयागढ़ जिले के तुलुबी गांव के हरिहर बेहरा ने. तीस साल पहले हरिहर बेहरा ने प्रशासन से पहाड़ी जंगल के जरिए एक तीन किलोमीटर की सड़क बनाने की मांग की थी, जिससे उनके गांव को मुख्‍य सड़क से जोड़ा जा सके. लेकिन प्रशासन ने उनकी मांग को खारिज कर दिया. हर किसी ने कहा कि यह असंभव है. हर तरफ से मिली नाकामी के बाद हरिहर बेहरा ने वो कर दिखाया, जिसकी कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था. हरिहर बेहरा ने अपने भाई के साथ मिलकर 30 साल में पहाड़ काटकर सड़क बना दी, लेकिन इस दौरान उन्‍होंने अपने भाई को खो दिया.

    बताते हैं कि प्रशासन और स्‍थाीनय नेताओं से निराशा हाथ लगने के बाद हरिहर बेहरा और उनके भाई कृष्‍ण बेहरा ने खुद फावड़ा उठा लिया और पहाड़ काटने में जुट गए. हरिहर बेहरा ने जब काम शुरू किया था उस वक्‍त उनकी उम्र 26 साल थी. दोनों भाइयों के पास हथौड़े, कुदाल और लोहदंड के अलावा और कुछ नहीं था. हरिहर बेहरा खेतों में काम करने के साथ ही पहाड़ों को हथौड़ से काटने का काम करते थे. दोनों भाइयों ने पहले जंग का एक हिस्‍सा साफ किया फिर छोटे-छोटे विस्‍फोटकों से बड़ी-बड़ी चट्टानों को फोड़ने की कोशिश की.

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    हरिहर बेहरा ने देखा कि विस्‍फोट से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है. इसके बाद उन्‍होंने हथौड़े से ही चट्टानों को तोड़ने का काम शुरू कर दिया. काम के दौरान ही हरिहर बेहरा ने अपने भाई को खो दिया. कृष्‍ण बेहरा को किडनी की बीमारी थी. जिसके बाद हरिहर बेहरा बिल्‍कुल अकेले पड़ गए और तीस साल की कड़ी मेहनत के बाद वो कर दिखाया जिसकी कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था. गांव के लोग दोनों भाइयों का आभार जताते हुए नहीं थकते हैं.

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    हरिहर ने कहा, हमारे पास शहर जाने के लिए कोई रास्‍ता नहीं था. बाहर से कोई हमारे गांव आता था तो वह रास्‍ता भूल जाता था और जंगलों में भटक जाता था. करीब 30 साल पहले हमने जिला प्रशासन से गांव में सड़क बनाने की मांग की थी लेकिन किसी ने हमारी फरियाद नहीं सुनी. हमारे पास कोई विकल्‍प नहीं था. मैंने और मेरे बड़े भाई ने खेती का काम खत्म कर सड़क पर काम किया. हमें गांव के लोगों की भी मदद मिली.

    Tags: Motivational Story, Odisha, Odisha news

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