जिन्ना पर किताब लिखने के चलते पार्टी से निकाले जाने के बाद जसवंत सिंह को इस बात का हमेशा अफसोस रहा

एक फाइल फोटो में 1999 में कारगिल पर बोलते हुए जसवंत सिंह. 27 सितंबर, 2020 को उनका देहांत हो गया
एक फाइल फोटो में 1999 में कारगिल पर बोलते हुए जसवंत सिंह. 27 सितंबर, 2020 को उनका देहांत हो गया

कुछ घंटे बैठक चलने के बाद जसवंत सिंह (Jaswant Singh) को भाजपा (BJP) की ओर से सभा स्थल पर नहीं आने की सूचना दी गई क्योंकि उन्हें जिन्ना पर लिखी गई पुस्तक (book on Jinnah) के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 27, 2020, 4:04 PM IST
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नई दिल्ली. समुद्र तल से सात हज़ार फुट की ऊंचाई पर शिमला रिज (Shimla ridge) एकदम सही ऊंचाई है, जहां प्यारे देवदार और काई चढ़े ओक (moss coated oaks) दोनों ही पाए जा सकते हैं. 2009 में अगस्त के अंतिम सप्ताह में मूसलाधार बारिश (torrential downpour) के बाद, धूप ने नीचे घाटी को बिल्कुल धो दिया था और घने पत्तों से छनकर धीरे-धीरे हवा आ रही थी. स्वतंत्रता से पहले के भारत (pre-independent India) की शीतकालीन राजधानी (winter capital) में घुड़सवार सेना की एक टुकड़ी धीरे-धीरे पीटरहॉफ (Peterhoff) में प्रवेश कर गई और बाद में सात वायसराय और गवर्नर जनरलों का यह निवास स्थान एक सरकारी होटल (government hotel) में परिवर्तित हो गया.

भाजपा (BJP) के शीर्ष नेतृत्व में सभी 2009 के लोकसभा चुनावों (2009 Lok Sabha Elections) में हार का कारण और वजहें खोजने के लिए इस हिल स्टेशन (Hill Station) पर इकट्ठा हुए थे. हालांकि पार्टी के एक वरिष्ठ नेता होटल सेसिल में अपने कमरे में, तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) के आगे के निर्देशों की प्रतीक्षा कर रहे थे. कुछ घंटे बैठक चलने के बाद जसवंत सिंह (Jaswant Singh) को भाजपा की ओर से सभा स्थल पर नहीं आने की सूचना दी गई क्योंकि उन्हें जिन्ना पर लिखी गई पुस्तक (book on Jinnah) के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था.

"पार्टी ने अपनी बात रखने का एक मौका भी नहीं दिया"
निष्कासन त्वरित था और बिना किसी उलझन के किया गया था और जसवंत सिंह के करीबी मित्र लालकृष्ण आडवाणी सहित हर कोई इसके लिए सहमत था. कुछ लोगों ने महसूस किया कि इस निष्कासन की बड़ी वजह राजनीतिक मजबूरियां थी- भाजपा नेतृत्व के एक वर्ग ने पार्टी की हार की वजहों को खोजना बंद कर दिया था और सिंह केवल एक बलि का बकरा थे.
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भारत के पूर्व विदेश, वित्त और रक्षा मंत्री सिंह को शिमला से दिल्ली के लिए निकलते हुए सिर्फ एक बात का अफसोस था. पार्टी ने उन्हें अपनी बात रखने का एक मौका भी नहीं दिया.

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यह भाजपा में वाजपेयी-आडवाणी युग के अंत की शुरुआत भी थी. जब अगली पीढ़ी के नेता पार्टी में वास्तविक शक्ति के दावेदारों की स्थिति में खुद को लाने के लिए जूझ रहे थे.
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