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दिल्ली के जिस शिक्षा मॉडल पर केजरीवाल ने लड़ा चुनाव, शिक्षाविदों ने उसी पर उठाए सवाल

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Updated: February 8, 2020, 8:44 PM IST
दिल्ली के जिस शिक्षा मॉडल पर केजरीवाल ने लड़ा चुनाव, शिक्षाविदों ने उसी पर उठाए सवाल
केजरीवाल सरकार लगातार दावा करती रही है कि उसने दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम किया है. फाइल फोटो

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) ने अपने पांच साल का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में किए गए काम को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया. लेकिन शिक्षाविदों ने इसी प्रगति सीरीज (Pragati Series) की उपयोगिता पर कुछ सवाल उठाए हैं.

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  • Last Updated: February 8, 2020, 8:44 PM IST
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इरम आगा
नई दिल्ली. दिल्ली में आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party)  ने अपने पांच साल का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में किए गए काम को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया. लेकिन शिक्षाविदों ने इसी प्रगति सीरीज (Pragati Series) की उपयोगिता पर कुछ सवाल उठाए हैं.  फरवरी 2015 में सत्ता में आने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने स्पष्ट किया था कि दिल्ली के स्कूलों की शिक्षा उनकी प्राथमिकता है. 2016 में गर्मियों की छुट्टियों में सरकारी शिक्षकों और एनजीओ प्रथम (NGO Pratham) के लोग मिलकर पूरक शिक्षण सामग्री लेकर आए. इसका उद्देश्य दिल्ली के स्कूलों में शिक्षा के स्तर को बढ़ाना था. लेकिन शिक्षाविदों का कहना है कि प्रगति श्रृंखला "सामग्री को कमजोर बनाती है." इस कारण "विषय को प्वाइंटर्स के कारण उसे विस्तार से पढ़ना कम हो गया है."

इन पाठ्यपुस्तकों के पीछे शिक्षकों और मुख्य समूह ने पुस्तकों का बचाव किया है. वह कह रहे हैं कि ये सामग्री छात्रों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुरूप हैं और यह सीखने के स्तर को सुधारने में काफी मददगार है. शनिवार को दिल्ली ने विधानसभा चुनावों के लिए वोट किए. इन चुनावों में आप ने स्कूलों में शिक्षा को भी बड़ा मुद्दा बनाया. ऐसे में दिल्ली सरकार द्वारा स्कूलों में चलाई गई प्रगति सीरीज पर दोनों पक्ष क्या कह रहे हैं. इस पर News18 ने दोनों पक्षों से बात कर इसकी पड़ताल की.

प्रगति सीरीज क्या है?



2015 में शिक्षा विभाग ने एक आधारभूत मूल्यांकन किया और 1,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में छात्रों के सीखने के स्तर पर जो आंकड़े पेश किए, वह काफी चौंकाने वाले थे. कॉमर्स के लेक्चरर अंजू घावड़ी के मुताबिक इन स्कूलों में 60 फीसदी बच्चे ऐसे थे, जो ढंग से पाठ भी नहीं पढ़ सकते थे. 2016 में सरकार ने इस बात को समझने के लिए एक वर्कशॉप आयोजित की क्यों बच्चे पढ़ने में इतने कमजोर हैं. इसमें पाया गया कि NCERT की पाठ्यपुस्तकें बच्चों के लिए सही संदर्भ निर्धारित नहीं कर रही थीं. इसके बाद तय किया गया कि शिक्षक बच्चों की सहायता के लिए हेल्प बुक तैयार करेंगे. इसमें वह बच्चों के सामाजिक और आर्थिक हालात को ध्यान में रखेंगे.

अंजू घावड़ी के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां अलग अलग होती हैं. दिल्ली के नजफगढ़ के स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के हालात कालकाजी में पढ़ने वाले बच्चों से बिल्कुल अलग होते हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन शिक्षकों को सहायक शिक्षण सामग्री तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई, जो कि जमीनी हालात जानते हैं. हालांकि दिल्ली सरकार ने जिस एनजीओ प्रथम को इसके लिए चुना, शिक्षाविद उस पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं.

शिक्षा निदेशालय में प्रधान सलाहकार शैलेंद्र शर्मा का कहना है कि हमारा फोकस इस बात पर था कि बच्चे कॉन्सेप्ट समझ सकें. ये कम्यूनिकेशन के बारे में है. इसमें बच्चों को वैसी ही सामग्री मिलती है, जैसी पाठ्यपुस्तकों में होती है. बस वह सरल भाषा में और ऐसे उदाहरणों के साथ होती है, जिनके साथ वह संबंध बिठा सकते हैं.

शैलेंद्र शर्मा का कहना है कि इस अभियान का अर्थ ये नहीं है कि हमने एनसीईआरटी की किताबों को क्लास से बाहर ले जा रहे हैं. ये अतिरिक्त सामग्री कक्षा से 6 से 8 के बच्चों की सहायता के लिए है. ये पांच विषय सामाजिक विज्ञान, इंग्लिश, हिंदी, गणित और विज्ञान के लिए है. इस सीरीज को तीन साल में शिक्षकों के फीडबैक के आधार पर अपडेट भी किया गया है. 2020-21 में इसे सातवीं बार अपडेट किया जाएगा. ये बिक्री के लिए नहीं है. इसे सरकारी स्कूलों में मुफ्त उलब्ध कराया जाता है. शिक्षकों को एनसीईआरटी की किताबों के साथ ये अतिरिक्त शिक्षण सामग्री भी पढ़ानी अनिवार्य की गई है. दिल्ली सरकार ने इसे चुनौती स्कीम के तहत दो श्रेणियों में लॉन्च किया है. निष्ठा श्रेणी उन छात्रों के लिए है जिनमें सुधार की जरूरत है. प्रतिभा श्रेणी उनके लिए है जिनका प्रदर्शन अच्छा है.

शिक्षाविद कर रहे हैं आलोचना
दिल्ली सरकार भले इस स्कीम पर अपनी पीठ ठीक ठोक रही है, लेकिन शिक्षाविद इस स्कीम पर सवाल उठा रहे हैं. वह इस तरह की अतिरिक्त शिक्षण सामग्री को बच्चों के लिए चम्मच से खाना खिलाने के समान बता रहे हैं. शिक्षा संकाय में पूर्व डीन अनिता रामपाल का कहना है कि इससे बच्चों की विश्लेषण की क्षमता, सोचने और कल्पनाशीलता कम हो रही है. सामाजिक विज्ञान को पढ़ाने का एक बहुत ही सरल तरीका है. इन किताबों में कोई तारतम्य नहीं है. उन्होंने कहा, छात्रों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि इतिहासकार विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों से ज्ञान कैसे प्राप्त करते हैं. साथ ही सामाजिक विज्ञान के माध्यम से अलग-अलग समाजों के बारे में वह कैसे सीखते हैं.

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First published: February 8, 2020, 8:44 PM IST
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