राजद्रोह कानून की वैधता पर फिर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

सर्वोच्च अदालत की तरफ से केंद्र सरकार को नोटिस भेजा गया है.

सर्वोच्च अदालत की तरफ से केंद्र सरकार को नोटिस भेजा गया है.

Supreme Court on 124A: याचिका में कहा गया है कि अन्य उपनिवेशवादी लोकतंत्रों में भी राजद्रोह (Sedition) को अपराध के तौर पर रद्द किया गया है. याचिका में बताया गया है कि इसको अलोकतांत्रिक, गैरजरूरी बताकर इसकी निंदा की गई है.

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नई दिल्ली. भारतीय दंड संहिता (India Penal Code) की धारा 124A की वैधता को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई हुई. न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से मामले में जवाब मांगा है. खास बात है कि बीते तीन महीनों से भी कम समय में यह दूसरी बार है जब इस तरह की याचिका अदालत पहुंची है. धारा 124A के तहत व्यक्ति पर राजद्रोह का अपराध तय किया जाता है. इस बार दो पत्रकारों किशोरचंद्र वांगखेमचा और कन्हैया लाल शुक्ला ने याचिका दायर की थी.

IPC की धारा 124A पर सवाल उठना जारी है. शुक्रवार को जस्टिस यूयू ललित, इंदिरा बनर्जी और केएम जोसेफ की तीन सदस्यीय बेंच ने याचिका पर सुनवाई की, जिसके बाद अदालत की तरफ से केंद्र सरकार को नोटिस भेजा गया है. याचिका दायर करने वाले मणिपुर के वांगखेमचा और छत्तीसगढ़ के शुक्ला का कहना है कि यह प्रावधान अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी का उल्लंघन करता है.

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दोनों पत्रकारों के अनुसार, राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र के खिलाफ सवाल उठाने पर उनके खिलाफ धारा 124A के तहत मामला दर्ज है. मामले में शामिल पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कार्टून शेयर करने और टिप्पणी करने को लेकर मामला दर्ज किया गया है. याचिका में कहा गया है कि साल 1962 के बाद लगातार 124A का दुरुपयोग हुआ है. साथ ही यह भी तर्क दिया गया है कि इस धारा की वजह से लोकतांत्रिक आजादी पर अस्वीकार्य प्रभाव पड़ता है.


याचिका में कहा गया है कि अन्य उपनिवेशवादी लोकतंत्रों में भी राजद्रोह को अपराध के तौर पर रद्द किया गया है. याचिका में बताया गया है कि इसकी अलोकतांत्रिक, गैरजरूरी बताकर इसकी निंदा की गई है. इस दौरान याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 1962 केदार नाथ सिंह बनाम स्टेट ऑफ बिहार का भी हवाला दिया गया है. खास बात है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इसी तरह की एक याचिका खारिज की थी. उस समय तीन वकीलों ने प्रावधान को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था.
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