ANALYSIS: 'रिजर्व' में आई अर्थव्‍यवस्‍था को रिजर्व बैंक ने किया स्टार्ट, अब उद्योग जगत की बारी

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था (Indian Economy) के स्‍कूटर का पेट्रोल रिजर्व में आ चुका है. रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) ने इसे झुका कर स्‍टार्ट कर दिया है. अब सरकार और उद्योगजगत की जिम्‍मेदारी है कि वे इसे जल्‍दी से पेट्रोल पंप पर ले जाएं और इसका टैंक फुल कर दें, ताकि यह दूर तक चलता रहे.

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: August 27, 2019, 1:34 PM IST
ANALYSIS: 'रिजर्व' में आई अर्थव्‍यवस्‍था को रिजर्व बैंक ने किया स्टार्ट, अब उद्योग जगत की बारी
भारतीय रिजर्व बैंक ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए केंद्र सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये देने का फैसला किया
Piyush Babele
Piyush Babele | News18Hindi
Updated: August 27, 2019, 1:34 PM IST
भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था (Indian Economy) को मंदी के दलदल में धंसने से बचाने के लिए हफ्तेभर में दो बड़े कदम उठाए जा चुके हैं. पिछले हफ्ते वित्‍त मंत्री निर्मला सीमारमण (Nirmala Sitharaman) ने अन्‍य घोषणाओं के साथ ही सरकार की तरफ से बैंकों में 70,000 करोड़ रुपये डालने की घोषणा की. इसके बाद सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India)​ ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए केंद्र सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये देने का फैसला किया. कदम इसलिए अभूतपूर्व है कि इसके तहत रिजर्व बैंक ने 2018-19 की अपनी सारी कमाई यानी नेट इनकम के 1.23 लाख करोड़ रुपये सरकार को दे दिए हैं. इस तरह एक तरफ सरकार ने बैंकों को पैसा दिया, तो दूसरी तरफ रिवर्ज बैंक से उससे ढाई गुनी रकम खुद हासिल कर ली है.

इन दो कदमों के बाद आशा की जा रही है कि सरकार भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को नकदी के उस संकट से बाहर निकाल पाएगी जिसे कुछ दिन पहले नीति आयोग के उपाध्‍यक्ष राजीव कुमार ने 70 साल का सबसे भयानक नकदी संकट बताया था. इन दोनों कदमों को लेकर अर्थशास्‍त्री यही मान रहे हैं कि इससे अर्थव्‍यवस्‍था को मौजूदा संकट से राहत मिलेगी. लेकिन दूसरा कदम यानी आरबीआई से पैसा लेने वाले कदम की आगे समीक्षाएं होती रहेंगी. खासकर इसलिए कि रिजर्व बैंक के दो पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और उर्जित पटेल इसका विरोध करते रहे हैं. पटेल ने तो इसे लेकर बैंक से इस्‍तीफा ही दे दिया था.

बहरहाल अब उन वजहों को देखते हैं जिनके चलते सरकार ने यह फैसला लिया और इन फैसलों का भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर क्‍या-क्‍या असर पड़ सकता है-

सरकार के पास नहीं था कोई दूसरा रास्‍ता

नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर लगातार दबाव बन रहा था. यह दबाव उस समय ज्‍यादा खुलकर दिखने‍ लगा जब मोदी सरकार चुनाव में जाने वाली थी. जब चुनाव सामने हों तो सरकारों को जनता के लिए लोकलुभावन फैसले करने ही होते हैं. खासकर तब जब मुख्‍य विपक्षी दल 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' जैसा ठोस वादा लेकर चुनाव में उतर रहा हो और किसान कर्जमाफी के नाम पर तीन राज्‍यों का विधानसभा चुनाव जीत चुका हो.

ऐसे में सरकार ने किसान सम्‍मान योजना के तहत हर किसान को सालाना 6,000 रुपये देने का फैसला किया. इससे सरकार पर करीब 70,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्‍त खर्च आया. यही नहीं छोटे कामकाज के लिए सरकार ने बैंकों से मुद्रा लोन दिलाए थे, उनमें भी डिफाल्‍ट रेट काफी ज्‍यादा हो गया. यह रकम भी काफी बड़ी थी. अन्‍य कल्‍याणकारी योजनाओं पर भी सरकार को खर्च बढ़ाने पड़े. इस तरह के सारे फैसलों ने सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाया.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

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बैंकों का डूबा कर्ज
एक तरफ सरकार को लोककल्‍याण की योजनाओं पर पैसा खर्च करना था, तो दूसरी तरफ बैंकों का कर्ज लगातार डूब रहा था. इसकी मुख्‍य वजह कंपनियों का दीवालिया होना और उद्योगपतियों का देश से भागना था. डूबते कर्ज के कारण बैंकों के डूबने का खतरा भी साफ दिखने लगा था, बैंकों के डूबने का मतलब है पूरी अर्थव्‍यवस्‍था का चौपट हो जाना. इसलिए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बैंकों को करीब पौने तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज समाप्‍त करने के लिए प्रोत्‍साहित किया और बदले में अपनी जेब से इतनी रकम बैंको को दी. इससे बैंक तो बच गए, लेकिन सरकार की माली हालत और खराब हो गई.

घटता टैक्‍स कलेक्‍शन
एक तरफ सरकार आम आदमी और बैंको को बचाने के लिए पैसा खर्च कर रही थी, दूसरी तरफ उसकी आमदनी अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ रही थी. सरकार को मिलने वाले डायरेक्‍ट टैक्‍स और इनडायरेक्‍ट टैक्‍स, मोटे तौर पर कहें तो इनकम टैक्‍स और जीएसटी दोनों की वसूली लक्ष्‍य से कम हो रही थी. टैक्‍स वसूली में कमी का सीधा मतलब था कि सरकारी खजाने में आमदनी कम और खर्च ज्‍यादा हो रहा है. टैक्‍स की कम वसूली का दूसरा अर्थ यह भी है कि या तो टैक्‍स की बड़े पैमाने पर चोरी हो रही है या फिर मंदी के कारण लोगों और कंपनियों की आमदनी कम हो गई है, जिसके कारण वे कम टैक्‍स जमा कर रहे हैं. सुस्‍त जीडीपी ग्रोथ रेट और दूसरे आंकड़े देखकर यही समझ आ रहा था कि दूसरी बात ज्‍यादा सही है.

फिस्‍कल डेफिसिट में संतुलन की दरकार
इन चीजों से बचने का उपाय यह था कि सरकार अपनी आमदनी से ज्‍यादा खर्च करके अर्थव्‍यवस्‍था को चलाती, लेकिन ऐसा करने पर फिस्‍कल डेफिसिट यानी मौद्रिक घाटा बढ़ जाता. डेफिसिट बढ़ने का मतलब होता कि अंतरराष्‍ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग कम कर देतीं. ऐसे में पहले ही विदेशी निवेश के संकट से जूझ रहे देश में विदेशी निवेश आना और कम हो जाता. यानी दुनिया के बाजार में भारत की रेटिंग नीचे आ जाती, जो अंतत: मंदी के संकट को और बढ़ाता.

नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर लगातार दबाव बन रहा था.


यह कमाई के बजाय पुश्‍तैनी संपत्ति खर्च करने जैसा मामला
ऊपर बताए गए सारे रास्‍ते बंद हो जाने के बाद सरकार के पास एक ही उपाय बचा था कि वह रिजर्व बैंक की शरण में जाए. आम आदमी को लग सकता है कि आरबीआई की शरण में जाने यानी उससे पैसा लेने में क्‍या बुराई है. आखिर को यह पैसा भी तो देश का ही है. यह बात बिल्कुल सही है. लेकिन यह पैसा उस तरह का है जैसे पारंपरिक भारतीय घरों में सोने का हाल होता है. घर की महिलाओं के पास सोना रखा रहता है और वह पीढ़ी दर पीढ़ी सास से बहू के हाथ में जाता रहता है. उसे बेचने के बारे में यानी पैसे के तौर पर उसका इस्‍तेमाल करने के बारे में शायद ही कभी सोचा जाता है. सोना तभी बेचा जाता है जब घर पर घनघोर आर्थिक संकट आ जाता है.

ऐसे हालात में सोना एक बार तो घर को बचा लेता है, लेकिन इससे परिवार का अपनी आर्थिक ताकत के प्रति विश्‍वास कमजोर हो जाता है, दूसरे अगर जल्‍द ही पहले की तरह कमाई शुरू नहीं की जाती तो दोबारा बेचने के लिए सोना बचता नहीं है. यह एक तरह से कमाई के बजाय संचित धन पर निर्भर हो जाने जैसा होता है. इसीलिए दो पूर्व गवर्नर इसके खिलाफ थे. लेकिन लगता है कि अर्थव्‍यवस्‍था का संकट वाकई बहुत गहरा है, जिसके चलते आरबीआई के एक अन्‍य पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्‍यक्षता में बनी कमेटी ने इसकी सिफारिश की और मौजूदा अध्‍यक्ष शक्तिकांत दास ने उसे स्‍वीकार किया.

झुकाकर स्‍टार्ट किया जा रहा अर्थव्‍यवस्‍था का स्‍कूटर
अगर आगे के रास्‍ते के बारे में देखें तो इसे इस तरह समझा जा सकता है कि पुराने चलन के स्‍कूटर का पेट्रोल रिजर्व में आ चुका है. रिजर्व बैंक ने इसे झुका कर पेट्रोल पाइप तक पहुंचा दिया है और इसे स्‍टार्ट भी कर दिया है. अब सरकार और उद्योगजगत की जिम्‍मेदारी है कि वे इसे जल्‍दी से पेट्रोल पंप पर ले जाएं और इसका टैंक फुल कर दें, ताकि यह दूर तक चलता रहे.

इसके अलावा सरकार की एनफोर्समेंट एजेंसियों और टैक्‍स इंस्‍पेक्‍टर्स को भी धीरज से काम लेने की जरूरत है. अगर वे अपने पुराने टारगेट को हासिल करने के लिए हर कंपनी को चोर या बेईमान समझकर नोटिस भेजते रहे, तो उद्योग में व्‍याप्‍त अविश्‍वास का माहौल खत्‍म नहीं होगा. उन्‍हें एक ऐसे ट्रैफिक इंस्‍पेक्‍टर की तरह काम करना है जो गाडि़यों को रोककर चालान काटने के बजाय, ट्रैफिक के निर्बाध संचालन पर ज्‍यादा ध्‍यान देता है. अगर वे ऐसा करेंगी तो अर्थव्‍यवस्‍था का स्‍कूटर समय रहते पेट्रोल पंप पर पहुंच सकता है. ऐसा न करने से अर्थतंत्र में झोंका गया पेट्रोल रास्‍ता तय करने के बजाय रेड लाइट पर ही फुंक जाएगा.

अर्थव्‍यवस्‍था के पहिए को घुमाने में खर्च हो आरबीआई की रकम
सरकार को जो पैसा आरबीआई से मिला है उसका इस्‍तेमाल सरकार अपनी राजकोषीय जरूरतों के बजाय सीधे ऐसी परियोजनाओं में करे जो डिमांड जनरेट कर सकें. इस डिमांड से न सिर्फ ग्रोथ जनरेट हो, बल्कि रोजगार भी पैदा होने चाहिए. क्‍योंकि जॉबलेस ग्रोथ भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का दूसरा बड़ा संकट है. ऐसे में अगर बैंक उदारता से कर्ज दें, टैक्‍स कलेक्‍टर संयम से टैक्‍स वसूलें और सरकार टारगेटेड तरीके से सेक्‍टरों को आगे बढ़ने में मदद करे, तो भारतीय उद्योग जगत इस संकट से बाहर आ सकता है.

एक बार पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ में तेजी से जाने लगेगा तभी अर्थव्‍यवस्‍था पटरी पर आएगी, क्‍योंकि ये जो पौने दो लाख करोड़ रुपये अर्थव्‍यवस्‍था में झोंके जा रहे हैं, अगर वे घूमे नहीं तो जीरो हो जाएंगे. अगर वे दिनभर में दस हाथों में गए, तो 20 लाख करोड़ हो जाएंगे. क्‍योंकि पैसे का मतलब नोट नहीं होते, नोट की रफ्तार होती है. पैसे का एक हाथ से दूसरे हाथ में जाना ही उत्‍पादन है.

करना होगा भरोसे का संचार
वहीं, मंदी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि पैसा जिसके पास पहुंचता है वही उसे दबाकर बैठ जाता है. यानी यह एक आर्थिक गतिविधि के साथ ही मानसिक गतिविधि भी है. नोटबंदी के बाद से लोगों की यह मनोदशा तेजी से बढ़ी है, टैक्‍स कलेर्क्‍स के नोटिसों ने इसे और तेज किया है. सरकार को अर्थव्‍यवस्‍था में पैसे के साथ भरोसा भी झोंकना होगा. और यह भी देखना होगा कि देश आर्थिक संकट से इस तरह बाहर आए कि दोबारा आरबीआई की तरफ न देखना पड़े. क्‍योंकि बार बार आरबीआई की तरफ देखा तो आरबीआई के पास देखने को कुछ बचेगा ही नहीं. पैसा आरबीआई की गुल्‍लक के बजाय जनता की मेहनत से आना चाहिए. फिलहाल सरकार यही करती नजर आ रही है. हालांकि उसे बहुत ज्‍यादा करते हुए भी नहीं दिखना होगा, क्‍योंकि अमेरिका के राष्‍ट्रपति रहे रोनाल्‍ड रीगन कहा करते थे- ‘‘दुनिया का सबसे खतरनाक वाक्‍य है- मैं सरकारी कर्मचारी हूं और आपकी मदद करने आया हूं.’’

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First published: August 27, 2019, 1:05 PM IST
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