माफिया डॉन से विधायक बने मुख्तार अंसारी की कहानी, जिसकी नाल यूपी की सियासत से बंधी रही

मुख्तार अंसारी की 7 अप्रैल को एक बार फिर बांदा जेल में वापसी हुई. फाइल फोटो

मुख्तार अंसारी की 7 अप्रैल को एक बार फिर बांदा जेल में वापसी हुई. फाइल फोटो

Rise and Fall of Mukhtar Ansari: 90 के दशक के मध्य में मुख्तार अंसारी को सियासत में सीधी एंट्री मिली. सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले मसीहाओं को भगवा राजनीति को रोकने के लिए एक डॉन से हाथ मिलाने से गुरेज नहीं हुआ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 11, 2021, 5:01 PM IST
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नई दिल्ली. पंजाब के रूपनगर जिले में जब यूपी पुलिस की टीम 6 अप्रैल को गैंगस्टर से विधायक बने मुख्तार अंसारी (Mukhtar Ansari) की कस्टडी लेने के लिए औपचारिकताएं पूरी कर रही थी, लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की पूरे मामले पर पैनी नजर बनी हुई थी. यूपी की सत्ता में चार साल पूरे करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास अब एक और उपलब्धि है, जो प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ उनके कुशल प्रशासन की गवाही देती है. 58 वर्षीय मुख्तार अंसारी की 7 अप्रैल को एक बार फिर बांदा जेल में वापसी हुई, जहां से वह 2019 में पंजाब की रोपड़ जेल जाने में सफल रहा था. पिछले तीन दशक से यूपी की सियासत में मुख्तार का उतार चढ़ाव, प्रदेश की सियासत में बदलाव का प्रतीक भी है, साथ ही सियासत के गलियारे में होने वाले ट्विस्ट और टर्न की दास्तान भी है.

डॉन का उभार

80 के दशक के मध्य में मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजल अंसारी अपने परिवार में पहले शख्स थे, जिन्होंने यूपी की राजनीति में प्रवेश किया. पूर्वी उत्तर के गाजीपुर जिले के मशहूर परिवार से ताल्लुक रखने वाले अफजल अंसारी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के टिकट पर मुहम्मदाबाद विधानसभा से 1985 में विधायक चुने गए. ये वो दौर था, जब यूपी में राम मंदिर की छांव में भगवा राजनीति का उभार तेजी से हो रहा था. बाबरी विध्वंस के ताप से यूपी की राजनीति गर्म थी, तो दूसरी ओर यूपी में दलित राजनीति भी सामाजिक न्याय के विचार को आगे बढ़ाते हुए गरज रही थी. इन सब हलचलों के बीच सियासत में मुख्तार का उभार जल्दी ही शुरू हुआ. संगठित अपराध की आड़ में मुख्तार ने अपनी छवि बनाई. उसका मुख्य फोकस रेलवे के स्क्रैप टेंडरों को हासिल करने के साथ कई अन्य सरकारी ठेकों को पाने पर रहा. मुख्तार को जल्द ही मऊ-आजमगढ़-गाजीपुर और चंदौली में घर-घर जाना जाने लगा. मुख्तार गैंग पर अपहरण के लिए फिरौती और उगाही के कई आरोप भी लगे.

90 के दशक के मध्य में मुख्तार अंसारी को सियासत में सीधी एंट्री मिली. सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले मसीहाओं को भगवा राजनीति को रोकने के लिए एक डॉन से हाथ मिलाने से गुरेज नहीं हुआ. मुख्तार को समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी से कांशीराम के साथ मायावती का साथ भी खूब मिला. दूसरी ओर बीजेपी के पास भी स्थानीय स्तर पर बाहुबलियों का समर्थन था. जैसे कि गोंडा के बृज भूषण शरण सिंह और प्रतापगढ़ में रघुराज प्रताप सिंह - अगर राजनीतिक समीकरण सही बैठ रहे हों.
1996 में बसपा नेता मायावती की मुख्तार अंसारी पर नजर पड़ी और उन्हें पार्टी की ओर से मऊ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव का टिकट मिला. इसके बाद से मुख्तार ने कई चुनाव लड़े और बसपा के साथ निर्दलीय भी चुनाव जीता. यहां तक कि जेल में रहते हुए भी मुख्तार ने चुनावी बाजियां अपने नाम कीं. 2005 के बाद से मुख्तार अंसारी कई जेलों में रहें, लेकिन उनका कद बना रहा. मौजूदा वक्त में मुख्तार बसपा के टिकट पर विधायक हैं और उनके भाई अफजल अंसारी गाजीपुर से बीजेपी के मनोज सिन्हा को हराकर 2019 में सांसद चुने गए थे. सपा और बसपा की सरकारों की शह पर मुख्तार अंसारी ने अपना चरम छुआ. यही वजह रही कि भारतीय जनता पार्टी के एमएलसी और वाराणसी जेल में बंद बृजेश सिंह को 2002 में लखनऊ में मुख्तार को मारने की कोशिश में हुए शूटआउट के बाद यूपी छोड़कर भागना पड़ा. 2008 में बृजेश सिंह को सीबीआई ने ओड़िशा के भुवनेश्वर से पकड़ा.

2004 में यूपी एसटीएफ ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि मुख्तार गैंग एक अंतरराष्ट्रीय आर्म्स डीलर से हल्की मशीन गन खरीदने की कोशिश कर रहा है. एसटीएफ ने मुख्तार अंसारी और गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद सीट से बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय के बीच घनघोर प्रतिद्वंदिता के बारे में भी सचेत किया था. लेकिन, किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं हुई. दिसंबर 2005 में कृष्णानंद राय को एके-47 असाल्ट राइफल्स से हमलाकर मार दिया गया. मुख्तार अंसारी, अफजल अंसारी और उनके सहयोगियों की भूमिका इस पूरे मामले में संदेह के घेरे में रही. मुख्तार के आलोचकों का कहना है कि मुख्तार अपने इलाके में किसी बीजेपी नेता का उभार बर्दाश्त नहीं कर सकता था, जिससे कि उसकी राजनीति और व्यापार पर कोई असर पड़े.

पूरे मामले में बीजेपी की ओर से हंगामा किए जाने पर मामले की जांच सीबीआई को दी गई. लंबे समय तक ट्रायल के बाद मुख्तार और अफजल अंसारी को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.



यूपी में बीजेपी का उभार

2014 के लोकसभा चुनावों में जबरदस्त जीत हासिल करने के बाद 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी को जबरदस्त जीत मिली. योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और एक बार फिर फोकस मुख्तार और उसके गैंग पर हो गया. यूपी सरकार राज्य में संगठित अपराध को ठिकाने लगाने के लिए नए कानून लेकर आई. योगी सरकार के शुरुआती कार्यकाल में ही मुख्तार अंसारी और उसके गुर्गों पर दबाव बढ़ने लगा. बसपा विधायक को लखनऊ से आगरा जेल भेजा गया. उसके कई साथियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे कैद कर दिया गया. जुलाई 2018 में मुख्तार के करीबी दुर्दांत गैंगस्टर मुन्ना बजरंगी की बागपत जिला जेल में हत्या कर दी गई.

इस बीच यूपी सरकार ने कई माफियाओं और गैंगस्टरों को मार गिराया. एनकाउंटर्स पर विवाद होने लगा और यूपी सरकार पर छोटे-मोटे अपराधियों का टारगेट करने का आरोप लगा. इसी क्रम में मुख्तार पर हो रही कार्रवाई भी पटरी से उतर गई. यूपी सरकार अपनी दूसरी प्राथमिकताओं को पूरा करने में जुट गई और गैंगस्टर से विधायक बना मुख्तार अंसारी पंजाब में पेंडिंग ट्रायल की बिनाह पर यूपी से निकलने में कामयाब रहा. योगी प्रशासन के लिए यह बेहद शर्मनाक क्षण था, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने मुख्तार को यूपी वापस लाने और उसके साम्राज्य को खत्म करने पर फोकस किया. सरकारी एजेंसियों ने मुख्तार के गुर्गों को दबोचना शुरू कर दिया और उसके आर्थिक स्त्रोतों पर लगाम कसने लगी.

अब आगे क्या?

मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ सरकार के मुताबिक मुख्तार अंसारी से जुड़ी 192 करोड़ की संपत्ति नष्ट कर दी गई है या जब्त कर ली गई. मुख्तार के खिलाफ पेंडिंग पड़े 52 मामलों में से कम से कम 10 में सरकार ट्रायल स्पीड को तेज करने की कोशिश में है. अंसारी गैंग के कम से कम 96 सदस्य गिरफ्तार किए गए हैं या फिर जेलों में हैं, जबकि कुछ को एनकाउंटर में मार दिया गया है. सरकार की कोशिश मुख्तार अंसारी के गुर्गों को खत्म करने करने की है और इस कार्रवाई को कानून व्यवस्था की सफलता के रूप में दर्शाने की.



लेकिन, सवाल ये है कि क्या सरकार मुख्तार की सियासत को खत्म कर पाएगी. क्या गैंगस्टर से विधायक बना नेता अप्रासंगिक हो जाएगा या फिर वह बीजेपी के खिलाफ विपक्ष की राजनीति का मुख्य किरदार बनकर रहेगा. 2022 का विधानसभा चुनाव ही इसका जवाब देगा.
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