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the son who was told by the father to be dependent on the family the father of the green revolution was convinced of the seeds made by him

पिता ने जिस बेटे को कहा था परिवार पर रहोगे आश्रित, उसके बनाए बीजों के कायल हुए हरित क्रांति के जनक

आंखों की रोशनी खो चुके श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी ने बनाए कई उन्नत बीज

आंखों की रोशनी खो चुके श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी ने बनाए कई उन्नत बीज

समय-समय पर श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी को बीजों के विकास के लिए सम्मानित किया गया है. देश में हरित क्रांति के जनक डॉक्टर एम. एस. स्वामीनाथन से भी वे दो बार मिल चुके हैं. जिन्होंने उनके काम की बहुत प्रशंसा की.

वाराणसी. पेंसिलिन के इंजेक्शन के रिएक्शन से गंभीर रूप से बीमार होने के बाद अपनी आंखों की रोशनी गंवाने वाले बेटे से उसके पिता ने कहा, ‘बेटा अब तुम करीब-करीब अपाहिज और परिवार पर आश्रित हो गए हो. इसलिए अपने भाइयों और परिवार के साथ मिलजुल कर रहना.’ जिस इंसान को ये कहा गया था, आज वह कई परिवारों का सहारा बना हुआ है. अपने उद्यम और कौशल से उन्नत बीजों की कई किस्में विकसित करके वह पूरे देश के किसानों को लाभ पहुंचाने की कोशिश में जुटा हुआ है. बात हो रही है बनारस के टड़िया जक्खिनी गांव के श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी की. जिनको 1977 में पेंसिलिन की दवा का इंजेक्शन लगाया गया था. जिसके रिएक्शन से उनकी तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी.

बाद में श्रीप्रकाश रघुवंशी की तबियत तो सुधर गई, लेकिन उनकी आंखों पर इसका बहुत गहरा असर पड़ा. उनकी आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होने लगी. काफी इलाज के बाद भी उनकी आंखों की रोशनी में सुधार नहीं हुआ. श्रीप्रकाश सिंह ने हाईस्कूल की परीक्षा देने की भी कोशिश की. लेकिन आंखों की खराब रोशनी के चलते हुए परीक्षा पूरी नहीं दे सके. श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी का विवाह बचपन में ही हो गया था और 1979 में उनका गौना भी हो गया. उसके बाद उनका परिवार बढ़ने लगा. आज उनके परिवार में तीन बेटे और तीन बेटियां हैं.

परिवार तंगी में फंसा तो श्रीप्रकाश ने कसी कमर

परिवार का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा था और एक समय श्रीप्रकाश रघुवंशी को ऐसा महसूस हुआ कि उनको भी कुछ न कुछ करना होगा. क्योंकि उनका परिवार उनकी जिम्मेदारी है. जब कभी उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता तो उनकी मां मदद करती थीं. इतने कठिन हालात के बावजूद श्रीप्रकाश सिंह निराश नहीं हुए और जीवन में नया रास्ता तलाशने लगे. इसके बाद उन्होंने खेती करने का ही फैसला किया. उनके पिता शीतला प्रसाद सिंह अपने समय के एक अच्छे किसान और प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक थे. श्रीप्रकाश सिंह ने बचपन में उनसे ही खेती के गुर सीखे थे. खेती में उनको बचपन से ही पिता के साथ काम करने का कुछ अनुभव था.

Shriprakash Raghuvanshi

गेहूं का अलग पौधा मिला तो ली कृषि वैज्ञानिकों की सलाह

खेती करने के दौरान सबसे पहले 1995 में उन्हें अपने खेत में गेहूं का एक पौधा दूसरे पौधों से थोड़ा अलग किस्म का मिला. इस पौधे को जब उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों को दिखाया तो उन्होंने कहा कि यह कोई अलग किस्म का पौधा है. आप इसको बढ़ाइये लेकिन दूसरों को मत दीजिए और इसका प्रचार मत करिए. हो सकता है कि आगे चलकर इससे कोई अच्छी किस्म निकल जाए. ये गेहूं का पौधा बहुत अच्छा दिख रहा था, इसकी बालों की लंबाई 9 इंच थी और हर बाल में करीब 100 से 125 दाने थे. पिता और गांव के बुजुर्गों के अनुभवों और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से श्रीप्रकाश रघुवंशी अच्छे पौधों की पहचान करके उनसे अच्छे बीज बनाने के काम में जुट गए.

किसान मेले में बांट दिए 500 किलो बीज

श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी ने 2003 तक कुछ अच्छे बीज बना लिए थे. जिसमें गेहूं, अरहर और कुछ सब्जियों के बीज शामिल हैं. श्रीप्रकाश रघुवंशी 2003 में महाराष्ट्र में पुणे के किसान मेले में गए और करीब 500 किलोग्राम गेहूं का बीज किसानों के बीच बांटकर वापस आए. कुदरत-9 नाम का यह गेहूं का बीज सैंपल के रूप में किसान मेले में बांटा गया था. जब किसानों ने इसकी बुवाई की तो उसके नतीजे शानदार रहे. किसानों ने श्रीप्रकाश रघुवंशी को पत्र लिखकर धन्यवाद भी दिया. इसी बीच महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याओं की बाढ़ आ गई. इससे भी श्रीप्रकाश सिंह विचलित हुए और महाराष्ट्र के उन गांवों में गए, जहां किसान ज्यादा संख्या में आत्महत्या कर रहे थे. वहां जाकर श्रीप्रकाश रघुवंशी ने किसानों को खेती और उन्नत बीज बनाने का प्रशिक्षण दिया. इसी तरह उन्होंने मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में भी काम किया.

काम को मिली मान्यता, कई सम्मानों से नवाजे गए

श्रीप्रकाश रघुवंशी के इन कामों से उनकी चर्चा होने लगी. इसी बीच अहमदाबाद के नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के डॉक्टर अनिल गुप्ता बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए काम कर रहे थे. उन्होंने श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी के बारे में सुना. डॉ. गुप्ता ने उनके बनाए बीजों को इकट्ठा किया और कई जगह उनका परीक्षण करवाया. जब परीक्षण के नतीजे अच्छे आए तो उन्होंने श्रीप्रकाश रघुवंशी को प्रोत्साहित करने का काम किया. श्रीप्रकाश रघुवंशी को सबसे पहले देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से 2007 में 75,000 रुपये का पुरस्कार हासिल हुआ. 2009 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उनको 1 लाख रुपये का प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार दिया. श्रीप्रकाश रघुवंशी को 2010 में आनंद महिंद्रा ने किसान समृद्धि अवार्ड दिया. जिसमें उनको 51,000 रुपये का पुरस्कार दिया गया.

डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने भी की प्रशंसा

श्रीप्रकाश रघुवंशी को 2018 में राष्ट्रपति भवन में 5 दिन का मेहमान भी बनाया गया था. अहमदाबाद के नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार के रूप में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उनको 7.5 लाख रुपये का पुरस्कार दिया. इतना ही नहीं आईएएस ट्रेनिंग एकेडमी, मसूरी में नए आईएएस अधिकारियों को खेती के बारे में जानकारी देने के लिए भी श्रीप्रकाश रघुवंशी को बुलाया गया. हरियाणा, ओडिशा, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने समय-समय पर श्रीप्रकाश सिंह रघुवंशी को बीजों के विकास के लिए सम्मानित किया है. देश में हरित क्रांति के जनक डॉक्टर एम. एस. स्वामीनाथन से भी वे दो बार मिल चुके हैं. जिन्होंने उनके काम की बहुत प्रशंसा की.

Shriprakash Raghuvanshi

बीजों को मिली सरकारी मान्यता

श्रीप्रकाश रघुवंशी का कहना है उनके बीजों की मांग बहुत है. सरकार ने उनको बीजों को पंजीकृत किया है. नई दिल्ली के पूसा कृषि संस्थान के ‘पौधा किस्म अधिकार प्राधिकरण’ ने उनके बीजों को मान्यता दी है. गेहूं के कुदरत-9 और अरहर के कुदरत-3 किस्म को सरकार से मान्यता मिली है. कानपुर, फैजाबाद और जबलपुर के कृषि विश्वविद्यालयों में उनके बीजों का ट्रायल हुआ है और नतीजे बहुत अच्छे आए हैं. श्रीप्रकाश रघुवंशी के कुदरत-9 गेहूं की पैदावार 1 एकड़ में 25 क्विंटल है. जबकि अरहर के कुदरत-3 की पैदावार 1 एकड़ में 14 से 15 क्विंटल है. यह भी काफी अच्छी उपज मानी जा रही है. अगर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के किसानों को उनकी अरहर की कुदरत-3 की जानकारी होती तो इससे देश में दलहन की पैदावार बढ़ती. श्रीप्रकाश रघुवंशी के बीजों की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वे स्थानीय जलवायु के अनुकूल हैं और उनको कम पानी की जरूरत है. वे तापमान में उतार-चढ़ाव को सहन कर लेती हैं. इनमें कोई रोग नहीं लगता और उनसे अच्छी उपज मिलती है.

सालाना 30 लाख की आमदनी, 20 लोगों को दिया रोजगार

श्रीप्रकाश रघुवंशी आजकल बीजों को बेचकर साल में करीब 30 लाख रुपये कमा लेते हैं. जिसमें से उनको करीब 10-12 लाख रुपये का मुनाफा होता है. उन्होंने अपनी संस्था में वेतन पर और कमीशन एजेंट के रूप में कम से कम 20 लोगों को रोजगार भी दिया है. इसके अलावा उन्होंने कुछ किसानों को भी अपने साथ बीज उगाने के लिए भी जोड़ा है. लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या अब भी पूंजी की है. श्रीप्रकाश रघुवंशी चाहते हैं कि कोई सरकारी संस्था, कृषि विश्वविद्यालय या निजी कंपनी उनके साथ जुड़कर बीजों को बड़े पैमाने पर तैयार करके उनकी मॉर्केटिंग का काम करे. श्रीप्रकाश रघुवंशी चाहते हैं कि उनके बीजों का ज्यादा प्रचार-प्रसार हो. जिससे किसानों को इसका पूरा लाभ मिल सके.

बीजों के विकास पर लगता है लंबा समय और बड़ा पैसा

श्रीप्रकाश रघुवंशी ने अपने क्षेत्र के सब्जी के पुराने बीजों को इकट्ठा करके उनसे उन्नत बीजों को तैयार करने का काम किया है. अगर उनकी मेहनत और लगन से पैदा किए गए बीजों को देश के किसानों के लिए उपलब्ध कराया जा सके तो इससे किसानों की फसल में एक अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है. अपनी आर्थिक कमजोरी की वजह से श्रीप्रकाश रघुवंशी जैसे लोग व्यापार में पिछड़ गए हैं. श्रीप्रकाश रघुवंशी का कहना है कि सरकार बीजों के विकास में काफी खर्च कर रही है. एक बीज के विकास में 10 साल लगते हैं और उस पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं. जबकि उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इतने अच्छे बीज विकसित कर दिए हैं. जिनको सरकारी मान्यता भी मिली है.

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बीजों के व्यावसायिक उत्पादन के लिए मदद की जरूरत

श्रीप्रकाश रघुवंशी चाहते हैं कि सरकार उनके बीजों को अपनाए और उसका ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करके किसानों के बीच पहुंचाए. अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो कोई निजी कंपनी उनको लेकर ज्यादा उत्पादन करके किसानों तक पहुंचाए. श्रीप्रकाश रघुवंशी के पास व्यावसायिक पैमाने पर बीजों को तैयार करने के लिए जरूरी पूंजी का अभाव है. बीजों को तैयार करने के लिए एक ग्रेडिंग मशीन की कीमत करीब 20-25 लाख रुपये है. इसी तरह ज्यादा बीज बनाने के लिए ज्यादा जमीन उनके पास नहीं है. परिवार के बंटवारे के बाद उनके हिस्से में 3 एकड़ जमीन आई है. अभी तक उनको कोई प्रायोजक या सहयोगी कंपनी नहीं मिल रही है. सरकार भी इसको आगे बढ़ाने में पर्याप्त सहयोग नहीं कर रही है. सरकार ने उनको सम्मान जरूर दिया, लेकिन उनके बीजों को बढ़ावा देने में कोई खास पहल नहीं कर रही है. उनको उम्मीद है कि एक दिन जरूर कोई न कोई कंपनी या सरकारी संस्थान उनसे जुड़ के बीजों को किसानों तक पहुंचाने के लिए काम करेगा.

Tags: Farmer, Farmer story, Farming, Farming in India, Green Revolution, News18 Hindi Originals

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