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संविधान की विकास गाथा: भारत में आर्थिक असमानता का (अ)संवैधानिक पक्ष

News18Hindi
Updated: March 23, 2020, 7:00 PM IST
संविधान की विकास गाथा: भारत में आर्थिक असमानता का (अ)संवैधानिक पक्ष
(News18 Hindi क्रिएटिव)

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  • Last Updated: March 23, 2020, 7:00 PM IST
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वर्ष 2020 में, यानी जब भारत का संविधान लागू हुए 70वाँ साल चालू है, तब भारत के पास अपनी भीषण गलतियों और विभाजनकारी विचारधाराओं को स्वीकार करके "नैतिक" सुधार की शुरुआत करने का मौका है. भीषण गलतियाँ हुई हैं, इसका प्रमाण लोकहित की पक्षधर संस्था "आक्सफेम" की उस रिपोर्ट से मिल जाता है, जो जनवरी 2020 में विश्व आर्थिक फोरम की बैठक के दौरान पेश की गयी.

1- क्या आप यह सच जानकर सुकून से रह सकते हैं कि भारत के एक प्रतिशत लोगों (25 करोड़ में से 25 लाख परिवार) के कब्ज़े में जितनी संपत्ति है, वह संपत्ति भारत की 70 प्रतिशत जनसँख्या (95.3 करोड़) लोगों की संपत्ति के जोड़ से भी ज्यादा है.

2- वर्ष 2018-19 में भारत के 63 अरबपतियों के पास जितनी संपत्ति थी, वह उस साल के भारत सरकार के बजट 24.42 लाख करोड़ रूपए से भी ज्यादा थी.

3- आज की स्थिति में किसी मशीन-तकनीक कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को एक साल में जितना वेतन मिलता है, उतनी राशि अर्जित करने में एक महिला कामगार को 22277 साल लगेंगे.



4- भारत में महिलायें और लड़कियां हर रोज़ 3.36 अरब घंटे का श्रम करती हैं, जिसकी हमारी आर्थिक व्यवस्था में कहीं कोई गणना नहीं होती है. अपने घर के प्रबंधन, बच्चों-बुजुर्गों-बीमार परिजनों की देखरेख के काम को पूरी तरह से "महत्वहीन" माना जाता है. यानी आज भारत आर्थिक और लैंगिक असमानता के चरम शिखर पर पहुँच चुका है.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? जब यह दावा किया जाने लगा है कि भारत अब एक विकसित देश है और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और जल्द ही 5 लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा; तब इस विद्रूप असमानता के क्या मायने हैं? सच तो यह है कि यह असमानता बताती है कि भारत नीति के संदर्भ में अपने मार्ग से भटक कर इस दशा में पहुँच गया है. हम यह महसूस कर ही नहीं पा रहे हैं कि श्रम की भूमिका और महत्व को नकार करके हम जिस आर्थिक विकास को पूज रहे हैं, उसका मूल स्वभाव "बर्बरता" है.

30 अगस्त 1947 को संविधान सभा के सदस्य आर. के. सिधावा ने वक्तव्य दिया कि मैं आशा कर रहा था कि हमारे विधान में सामाजिक और आर्थिक समानता का प्रमुख अंग होगा. मैं यह कह दूं कि चाहे हम कितने ही प्रयत्न करें और ग्रामोद्धार, ग्राम-पंचायत, ग्रामोन्नति इत्यादि के समान किसी भी साधन को क्रियान्वित करें, जब तक आर्थिक परिस्थितियों पर सुनीतिपूर्ण विचार नहीं किया जाएगा, इन साधनों से कोई लाभ नहीं और न इनमें सफलता होगी. स्थानीय संस्थाओं को अधिकार दे दिए गए हैं, किन्तु उनके पास खर्च करने के लिए धन नहीं है. अतः वे बिलकुल असहाय है. बिना धन के वे कभी कार्य नहीं कर सकतीं. हम केंद्र को अधिक आर्थिक अधिकारों से शक्तिशाली बनाने की बात बढ़ा-चढा कर कर रहे हैं, परन्तु प्रांतीय सरकारों की आर्थिक दशा इतनी गिरी हुई है कि वे स्थानीय संस्थाओं को उतनी भी सहायता नहीं दे सकते है, जितनी आवश्यक है. इस देश में अर्थ विभाजन इतनी सोचनीय अवस्था में है कि जब तक हम उसे समानता के स्तर पर नहीं लायेंगे, परिस्थितियों में सुधार नहीं होगा. यह किस प्रकार की आर्थिक व्यवस्था है? इस देश में कुछ सौ या हज़ार व्यक्ति ऐसे हैं, जो करोड़ों के फेर में हैं और करोड़ों ऐसे हैं, जिनके पास खाने को दाने नहीं है. यह हालात है. इसका हम कैसे सुधार कर सकते हैं, जब तक कि यह आर्थिक समानता जो कि इस देश के कुछ लोगों तक सीमित है, दूर नहीं की जाती. मुझे पूरा विश्वास है कि साधारण जनता पर अनेक प्रकार के करों का और भी अधिक भार डाले बिना ही यदि इस धन का उचित विभाजन कर दिया जाए तो राज्य के पास राष्ट्र निर्माण कार्य को सफलतापूर्वक चलाने के लिए पर्याप्त धन हो जाएगा……. यदि आप समाज सम्बन्धी आर्थिक व्यवस्था की प्रणाली में सुधार करना चाहते हैं तो आपको अपने बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करना होगा.”; पंडित जवाहर लाल नेहरु मानते थे कि जब तक हम राष्ट्रीयकरण करके किसी काम को ठीक से चलाने के लिए तैयार नहीं हैं, तब तक राष्ट्रीयकरण करना ख़तरा मोल लेना होगा. राष्ट्रीयकरण के लिए हमें वस्तुओं को चुनना होगा. मेरी समाजवाद की कल्पना यह है कि राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति के सामान अवसर उपलब्ध हों"; लेकिन पंडित नेहरु यह कल्पना नहीं कर पाए कि भारत में सत्ता और पूँजी का ऐसा गठजोड़ बन जाएगा कि राज्य खुद सभी संसाधन नीति के जरिये पूंजीवादियों की गोदी में भर देगा.

स्वतंत्र भारत के संविधान के बारे में यह कहा जाता रहा है कि यह पूरी तरह से मौलिक नहीं है. इसमें भारत सरकार अधिनियम, 1935, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, आयरिश संविधान से ज्यादातर बिंदु लिए गए हैं. इस पर संविधान सभा के सदस्य बी. दास ने 30 अगस्त 1947 को कहा कि “मैं समझता हूं कि सरकार का भुखमरी हटाने, प्रत्येक नागरिक को सामाजिक न्याय प्रदान करने तथा सामाजिक संरक्षण देने का प्रमुख कर्तव्य है. मुझे संतोष नहीं हुआ है, यद्यपि रूस के विधान के भागों के किसी ऐसे मिश्रित रूप को इन बारह पैरों में शामिल कर लिया गया है कि उनमें हमें कुछ आशा होती है, परन्तु करोड़ों देशवासियों को ऐसी कोई आशा नहीं होती कि दो माह बाद जो संघ संविधान स्वीकार होगा, वह उनको भुखमरी से मुक्त करेगा, उन्हें सामाजिक न्याय प्रदान करेगा, उनको जीवन यापन के निम्नतम परिमाण तथा स्वास्थ्य के निम्नतम परिमाण तक ले जाएगा. चाहे वह प्रांतीय विधान हो, संघीय विधान हो अथवा संघीय अधिकार हों. मुझे ऐसी कोई बात नहीं मिली जिसने सरकार या राज्य को बाध्य किया हो कि वह सर्वसाधारण की भलाई तथा जनता के हित के लिए अपने पालनीय कर्तव्यों का पालन करे.” स्वतंत्रता के साथ भारतीय राज्य व्यवस्था पर जिम्मेदारी आई थी कि वे भारत के नागरिकों, विशेष तौर पर समाज के वंचित तबकों के मूलभूत अधिकारों की रखा करेंगे. इस बात से सभा के सदस्य से वाकिफ थे और बार-बार यह उल्लेख कर रहे थे कि आर्थिक न्याय के बिना भारत एक बेहतर मुल्क नहीं बन पायेगा और उपनिवेशवाद से मुक्त नहीं हो पायेगा. भारत के संविधान के साथ एक शर्त जुडी हुई है "संवैधानिक नैतिकता" की; यह मान लिया गया था कि अगर संविधान को लागू करने वाले व्यक्ति अनैतिक और दुराचरण करने वाले होंगे, तो इस संविधान के शरीर पर केवल घाव ही घाव होंगे. और यह आज हो रहा है.

सत्ता पर पूंजीपतियों का नियंत्रण

वर्तमान शासन व्यवस्था में भारत के सामने “हितों का टकराव (यानी ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों का शासन व्यवस्था में निर्णायक भूमिका या पद पर होना, जो उसी तरह के उपक्रम या व्यवसाय से लाभ कमाते हैं) बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ खड़ा हुआ है. उद्योगपति नीति-नियम बनाने वाली समितियों के सदस्य है, वे सांसद हैं, वे मंत्री भी हैं. ऐसे में उनसे जन-पक्षीय नीतियों की अपेक्षा करना बेमानी हो जाता है. उल्लेखनीय यह है कि हितों के टकराव की गंभीरता 21वीं सदी में ही हमारे सामने नहीं आई है. भारत का संविधान बनाने वाले इसका सच जानते थे और बहुत ही चेतना के साथ उन्होंनें इस विषय पर बहस भी की थी.



विश्वम्भर दयाल त्रिपाठी ने कहा था कि “प्रस्तावित विधान के मुताबिक 10 वर्ष के अन्दर हमारी स्वतंत्र सरकार गांव-गांव में प्रत्येक गरीब के लिए प्राथमिक शिक्षा पूर्ण रूप से सुनिश्चित कर देगी. कोई ऐसा बच्चा हमारे देश में नहीं रहेगा, जिसको शिक्षा पाने का सुयोग प्राप्त न हो सकेगा. मैं इसका विशेष रूप से स्वागत करता हूं. मैं एक बात कहना चाहता हूं कि हमने सब चीज़ तो शासन विधान में बनायी, बहुत से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों को हल करने का प्रयत्न किया, लेकिन हमने गरीब आदमी के लिए एक शब्द भी न लिखा. सिवाय सदिच्छा के और कोई शब्द हमारे पूरे शासन विधान में नहीं मिलता. सिवाय एक बात को छोड़ कर कि उसको वोट देने का अधिकार अवश्य दे दिया गया है, इसके अलावा एक गरीब के लिए कोई बात हमारे शासन विधान में अभी तक नहीं आई है. मैं बहुत ही नम्रता के साथ कहूंगा कि आप इसमें कुछ एक नियम लाईये जिसमें यह स्पष्ट हो सके कि हमारा जो शासन विधान तैयार होगा और उस पर जब अमल होगा, तो उसमें यह नहीं होगा कि थोड़े से पूंजीपतियों और कुछ थोड़े से लोगों का साम्राज्य हो और उनका शासन हो. और गरीब आदमी और साधारण जन-समूह उनकी दया पर आश्रित रहे. आप ऐसे नियम लायें जिसमें हमारे शासन पर वेस्टेड इंटरेस्ट (निजी निहित हित) पूंजीपतियों का, ऐसे लोगों का, जो गरीब आदमियों को हमेशा दबाये रखना चाहते हैं, प्रभुत्व कायम न हो सके. आप कम से कम इतना ही कीजिये कि किसी भी ऊंचे ओहदे पर, धारा सभा की सदस्यता पर और मिनिस्ट्री में वह लोग न खड़े हो सकें, जो लोग वेस्टेड इंटरेस्ट से हैं, जो पूंजीपति हैं. जनता को इस बात पर संदेह होता है कि आखिर जो शासन विधान बन रहा है क्या उन गरीब आदमियों के लिए बन रहा है, जिन्होंनें 30 साल से लगातार त्याग और तपस्या की है और देश के लिए 30 साल से मरे हैं. हम जनता को क्या जवाब दें?”

वास्तव में संविधान सभा में यह बात बहुत स्पष्ट रूप से कही और मानी गयी थी कि बिना आर्थिक स्वतंत्रता हासिल किये, राजनीतिक स्वतंत्रता के मायने बहुत सीमित होंगे. 18 नवम्बर 1949 को एम्. अनंतशयनम आयंगार ने कहा था कि "किसी मनुष्य से यह कहने से कोई लाभ नहीं होता है कि संपत्ति के लिए समान अवसर के बिना वह राजनैतिक लोकतंत्र से संतोष करे और उत्पादन के साधन चंद व्यक्तियों के हाथ में सीमित कर दिए जाएँ".


वर्तमान भारत की स्थिति बताती है कि स्वतंत्रता के बाद भारत में आर्थिक समानता लाने के लिए किये गए प्रयासों में सीमित राजनैतिक प्रतिबद्धता थी. 1970 के दशक में द्विपक्षीय युद्धों, आपातकाल और जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन ने आर्थिक लोकतंत्र और समाजवाद के प्रश्न को भारतीय जीवन के केंद्र में ला दिया था. जिसके चलते 44 वें संविधान संशोधन के जरिये राज्य के नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 38 (2) को जोड़ा गया था. यह अनुच्छेद कहता है कि "राज्य, विशिष्टतया, आया की असमानताओं को कम करने का प्रयाश करेगा और न केवल विषित व्यक्तियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूह के बेच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा." वस्तुतः नीति निदेशक तत्वों में शामिल किये गए इस अनुच्छेद तो नागरिकों के मूलभूत अधिकारों - शोषण से मुक्ति, न्याय और गरिमामय जीवन जीने के अधिकार के साथ जोड़ कर पढ़े और स्वीकार किये जाने की जरूरत है.

श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत में समाजवाद की व्यवस्था लाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये. उनका कहना था कि "समाजवाद का अर्थ समूहवाद नहीं है, बल्कि उसका अर्थ है सामाजिक-आर्थिक सुधारों द्वारा सबको सामान अवसर उपलब्ध करवाना. यही कारण रहा कि उन्होंने बैंक, बीमा, उड्डयन, कोयला और खनन जैसे क्षेत्रों की राष्ट्रीयकरण किया. यह एक सच्चाई है कि भारत की व्यवस्था राष्ट्रीयकरण के माध्यम से उठाई गयी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभा नहीं पायी और व्यापक निजीकरण के लिए रास्ता खोल दिया गया.


हमें यह तो स्वीकार करना ही होगा कि वर्ष 1991 के बाद अपनाई गयी आर्थिक विकास की नीतियों ने संविधान के इन सबसे बुनियादी प्रावधानों की लगभग ह्त्या ही कर दी है क्योंकि किसानों, मजदूरों समेत 99 प्रतिशत भारतीयों के "शुभ" की बलि चढ़ाकर एक प्रतिशत भारतीय पूंजीपतियों के "लाभ" को केंद्र में रख कर नीतियां बनायी और लागू की गयीं. इन नीतियों से पिछले कुछ वर्षों में लाभ की कुछ खुरचन 10 प्रतिशत उच्च मध्यमवर्गीय भारतीयों को भी मिली, किन्तु जिस तरह से बाज़ार और पर्यावरण के संकट विकराल होते गए हैं, उससे यह तय तय हो गया कि विकास का यह गुब्बारा ज्यादा दिन टिक नहीं पायेगा और फूट जाएगा. वर्ष 2007 से 2020 के बीच एक दिन भी ऐसा नहीं आया, जब यह माना गया हो कि भारत की आर्थिक स्थिति और लोगों के जीवन में आर्थिक सुरक्षा अब स्थाई होने की दिशा में आगे बढ़ रही है. भारत के आर्थिक जीवन में अब केवल और केवल आर्थिक असुरक्षा है, भयंकर गैर-बराबरी है और भुखमरी-बेरोज़गारी के विकराल संकट हैं. जिनका निर्माण प्रकृति ने नहीं किया है, इनका निर्माण स्वतंत्र भारत की नीतियों ने किया है, इनका निर्माण संविधान सभा की मूल भावना की उपेक्षा के फलस्वरूप हुआ है.

यह कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा कि भारत का संविधान हर समस्या का हल प्रदान करता है, लेकिन इसमें जो प्रावधान किये गए थे, उनके पीछे यह विश्वास सबसे अहम् था कि आने वाले पीढियां और सरकार के प्रबंधक "राजनैतिक नैतिकता" और "संवैधानिक मूल्यों" का सम्मान करेंगे; संविधान बनाने वालों के इस विश्वास को पूरी तरह से ढ़हाया जा चुका है. जरा सोचिये कि नीति निदेशक तत्वों में यह कितनी स्पष्ट बात थी कि राज्य ऐसी नीतियां बनाएगा कि "समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिसे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो और आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेन्द्रण न हो". वर्तमान की शोषणकारी अवस्थाओं और असमानता के मूल कारणों का विश्लेषण करते समय हमें इस बात को स्वीकार करना ही होगा कि राष्ट्र की विकास की नीतियों को बनाते समय नीति बनाने वालों ने संवैधानिक मूल्यों की उपेक्षा की है और न्यायपालिका ने इस पहलू के साथ लगातार भेदभाव किया है, जबकि इन नीति निदेशक प्रावधानों को संविधान की उद्देशिका और मूलभूत अधिकारों के साथ जोड़ कर परिभाषित किये और लागू करवाए जाने की जरूरत थी.

नोट - यह वक्त भारत को भारत के संविधान से परिचित कराने का है. इस संविधान से परिचित होने के लिए इसकी पटकथा, इसकी पृष्ठभूमि से साक्षात्कार करना एक अनिवार्यता है. भारतीय संविधान की विकास गाथा को समाज के समक्ष लाने के लिए हमने एक श्रृंखला शुरू की है. इसमें संविधान निर्माण के उन अनछुए पहलुओं पर आलेख होंगे, जिन्हें अब तक विस्मृत किया गया है, जिनकी उपेक्षा की गई है. संविधान को आत्मार्पित किए हुए अब 70 वर्ष गुज़र गए हैं, लेकिन समाज ने इसे अपनाया नहीं है. आज भारत और भारतीयता के वजूद को संरक्षित करने के लिए संविधान लोक शिक्षण अभियान की महती आवश्यकता है. आशा है कि "भारतीय संविधान की विकास गाथा" के लेखक सचिन कुमार जैन द्वारा  news18 के लिए विशेष रूप से लिखी गई श्रृंखला को उपयोगी पाएंगे.

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First published: March 23, 2020, 6:59 PM IST
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