ये हैं सुप्रीम कोर्ट के वो 4 जज, जिन्होंने चीफ जस्टिस के खिलाफ किया 'विद्रोह'

सुप्रीम कोर्ट में असाधारण स्थिति देखी गई. सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों ने कोर्ट के आंतरिक मामलों को लेकर मीडिया को संबोधित किया. आइए जानते हैं इन चार जजों के बारे में जिनके उठाए सुर के बाद पूरे देश में हलचल का माहौल है.

News18Hindi
Updated: January 12, 2018, 10:35 PM IST
ये हैं सुप्रीम कोर्ट के वो 4 जज, जिन्होंने चीफ जस्टिस के खिलाफ किया 'विद्रोह'
supreme court judges
News18Hindi
Updated: January 12, 2018, 10:35 PM IST
देश के इतिहास में पहली बार न्यायपालिका में एक ऐसी घटना हुई, जिसे न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव की स्थिति के तौर पर देखा जा रहा है. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में असाधारण स्थिति देखी गई. सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों ने कोर्ट के आंतरिक मामलों को लेकर मीडिया को संबोधित किया. आइए जानते हैं इन चार जजों के बारे में जिनके उठाए सुर के बाद पूरे देश में हलचल का माहौल है.

जे चेलमेश्वर
चीफ जस्टिस के बाद दूसरे सबसे सीनियर जज जस्टिस चेलमेश्वर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कभी-कभी होता है कि देश के सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था भी बदलती है. उन्होंने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा है, अगर ऐसा चलता रहा तो लोकतांत्रिक परिस्थिति ठीक नहीं रहेगी.'' उन्होंने कहा कि हमने इस मुद्दे पर चीफ जस्टिस से बात की, लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी.

जस्टिस चेलमेश्वर 65 साल के हैं और सुप्रीम कोर्ट में जज हैं. वह पहले केरल और गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं. फिज़िक्स में ग्रेजुएट चेलमेश्वर ने 1976 में लॉ के डिग्री ली. चेलमेश्वर तेलुगु भाषा और साहित्य के विद्वान माने जाते हैं. उनकी अपनी एक लाइब्रेरी है जिसे वे अपने साथियों और वकालत के छात्रों के लिए खुला रखते ​हैं.

बड़े फैसले

​भाषण की स्वतंत्रता
जस्टिस चेलमेश्वर और रोहिंटन फली नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की खंडपीठ का गठन किया, जिसने विवादास्पद कानून को खत्म किया. जो भारतीय पुलिस को ‘असुविधा का कारण’ बनने वाले ईमेल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक संदेशों को पोस्ट करने के वाले को गिरफ्तार करने की शक्ति देता था. न्यायाधीशों ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 ए की स्थापना की.

आधार कार्ड
आधार कार्ड के बिना कोई भी भारतीय नागरिक बुनियादी सेवाओं और सरकारी सब्सिडी से वंचित नहीं हो सकता है.

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के 2015 में आए फैसले पर असंतोषपूर्ण राय देते हुए जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा था कि, जजों की नियुक्ति भाई-भतीजावाद में फंस कर रह गई है. जहां सामान्य या उससे भी कम को बढ़ावा दिया जा रहा है. यह प्रक्रिया एक ‘संवैधानिक विकार’ के रूप में उभर रही है.

मदन भीमराव लोकुर

जस्टिस मदन भीमराव लोकुर का जन्म 31 दिसंबर 1953 को हुआ. लोकुर ने दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के सैंट स्टीफ़न कॉलेज से इतिहास में स्नातक करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही 1977 में एलएलबी की डिग्री हासिल की. उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की. वो 1981 में परीक्षा पास करके सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट बने.

जस्टिस लोकुर 1983 में इंडियन लॉ रिव्यू (दिल्ली सिरीज़) के संपादक बने और दिल्ली हाईकोर्ट में नियुक्त होने तक इस पद पर भी रहे. वह दिसंबर 1990 से 1996 तक केंद्र सरकार के अधिवक्ता रहे और 1997 में वो वरिष्ठ वकील नियुक्त कर दिए गए. उन्हें सिविल लॉ, क्रिमनल लॉ, कांस्टीट्यूशनल लॉ और रिवेन्यू एंड सर्विस लॉ में विशेषज्ञता हासिल है.

बड़े फैसले -

ओबीसी में सब कोटा के खिलाफ फैसला

2012 में जस्टिस मदन लोकुर ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में, अल्पसंख्यकों के लिए 4.5% उप-कोटा (27% अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटा के भीतर) को आवंटित करने के भारत सरकार के फैसले को खारिज किया.

माइनिंग स्कैम

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में लोकुर ने विशेष सीबीआई न्यायाधीश टी पट्टाविराम राव को निलंबित कर दिया और रेड्डी बंधुओं से संबंधित खनन घोटाले मामले में अपने अभियोजन का आदेश दिया. जज के खिलाफ शिकायत थी कि उन्होंने रिश्वत प्राप्त करने के बाद जी जनार्दन रेड्डी को जमानत दी थी.​

रंजन गोगोई

असम के पूर्व मुख्यमंत्री केशव चंद्र गोगोई के घर 18 नवंबर, 1954 को पैदा हुए जस्टिस रंजन गोगोई 1978 में वकील बने. गुवाहाटी हाईकोर्ट में बीस साल से ज्यादा वकालत करने के बाद 28 फरवरी 2001 को वह गुवाहाटी हाईकोर्ट में स्थाई जज के रूप में नियुक्त हुए.

इसके बाद 9 सितंबर 2010 को उनका तबादला पंजाब - हरियाणा हाईकोर्ट में हुआ. 23 अप्रैल 2012 को वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने. वे भारत के पूर्वोत्तर से इस पद को बनाए रखने वाले पहले जज हैं. अभी तक माना जा रहा था कि न्यायाधीश दीपक मिश्रा के बाद उनका पद जस्टिस रंजन गोगोई संभाल सकते है. अगर ऐसा होता है तो वे भारत के पूर्वोत्तर से इस पद पर आसीन होने वाले पहले न्यायाधीश होंगे.

कुरियन जोसेफ

जस्टिस कुरियन का जन्म 30 नवंबर 1953 को केरल में हुआ था. इन्होंने केरल लॉ एकेडमी लॉ कॉलेज से तिरुवनंतपुरम से क़ानून की पढ़ाई की. 1977 से 1978 तक वो केरल विश्वविद्यालय के शैक्षणिक परिषद के सदस्य रहे. इसके साथ ही साल 1978 में वो केरल विश्वविद्यालय संघ के महासचिव भी रहे. साल 1996 में उन्हें वरिष्ठ वकील के रूप में नामित किया गया.

1979 से केरल हाई कोर्ट से वक़ालत शुरू करने वाले कुरियन 1987 में सरकारी वक़ील बने और 1994-96 तक एडिशनल जनरल एकवोकेट रहे. 12 जुलाई 2000 को केरल हाई कोर्ट में जज बने. 2006 से 2009 तक केरल हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के अध्यक्ष रहे. जस्टिस कुरियन दो बार केरल हाई कोर्ट के कार्यकारी के मुख्य न्यायाधीश और 2010 से 2013 तक हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के वो मुख्य न्यायाधीश रहे. 8 मार्च, 2013 को जस्टिस कुरियन सुप्रीम कोर्ट में जज बने. वे इस साल नवंबर में रिटायर होने जा रहे है.

बड़े फैसले

जस्टिस आर एम लोढ़ा, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ की बेंच ने विवादास्पद कोयला आवंटन घोटाला मामले की सुनवाई की और किसी भी राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप से केंद्रीय जांच से सीबीआई को मुक्त करने का आदेश दिया.

अफजल गुरू के मामले में मुख्य न्यायाधीश लोढ़ा, कुरियन जोसेफ और आर एफ नरीमन ने इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणों की स्वीकार्यता के मुद्दे पर फैसले को खारिज किया था.
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर