COVID-19: कोरोना काल में अनाथ हुए हजारों बच्चे, यहां जानें कैसे कर सकते हैं उनकी सही मदद

(सांकेतिक तस्वीर)

(सांकेतिक तस्वीर)

Coronavirus Orphan Children: कोरोना काल को अलग भी कर दें तो भी आज की तारीख में लाखों ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें माता-पिता की दरकार है. लाखों बच्चे बालाश्रय में रह रहे हैं तो वहीं लाखों बच्चे सड़कों पर जिंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं. ऐसे में जानें कैसे आप कर सकते हैं इनकी सही मदद...

  • Share this:

नई दिल्ली. कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से देश में कई जगह पूरे के पूरे परिवार ही उजड़ गए हैं. ना जाने कितने बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने पालकों को खो दिया है. ऐसे में बीते दिनों जिस तरह ऑक्सीजन, दवा से लेकर अस्पताल में खाली बिस्तरों के लिए सोशल मीडिया पर गुहार लगाई जा रही है और उतनी ही तेजी से कहां से सब कुछ उपलब्ध हो सकता है उसकी जानकारी सोशल मीडिया पर तैर रही है. ठीक उसी तरह बीते दिनों सोशल मीडिया पर एक संदेश फैला कि ‘दो लड़कियां जिनकी उम्र तीन दिन और छह महीने की है, कोविड की वजह से इन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया. इन बच्चियों की मदद करें, जिससे इन्हें नई जिंदगी मिल सके, इस संदेश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करें’

वॉट्सएप पर इस तरह की खबरों के फैलाने वाले ज़ाहिर तौर पर अपनी संवेदना जताने की कोशिश में लगे हुए है. लेकिन इस तरह से बच्चा देना या लेना जहां गैरकानूनी है, वहीं इस तरह से हम बच्चों की जिंदगी को खतरे में भी डाल सकते हैं. और बच्चों की तस्करी को बढ़ावा मिल सकता है. इसे, तुरंत रोक दिया जाना चाहिए, बच्चे को गोद लेने की एक कानूनी प्रक्रिया होती है और किसी भी बच्चे के मामले में इसे अंतिम विकल्प के तौर पर लिया जाता है, जब बच्चे की देखरेख से जुड़े दूसरे विकल्प मौजूद ना हों, ये कहना है, यूनिसेफ भारत की बाल संरक्षण विशेषज्ञ तनिष्ठा दत्ता का.

Youtube Video

गैरकानूनी तौर पर गोद लेना पहुंचा सकता है जेल
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, बाल कल्याण समीति के अध्यक्ष विजय दोइफोडे का कहना है कि दत्ता का डर बेबुनियाद नहीं है. जब तीन दिन और छह महीने की बच्ची की खबर उन्हें पता चली तो उन्हें उनकी उम्र के अंतर को लेकर शक हुआ. अगर वो दोनों सगी बहने हैं तो उम्र का अंतर सही नहीं लग रहा है. साथ ही विजय बताते हैं कि उन्होंने संबंधित नंबर पर कई बार फोन करने की कोशिश की लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया.

दिल्ली के सरोज अस्पताल में कोरोना का कहर, 80 कर्मचारी पॉजिटिव, एक डॉक्‍टर की मौत

वहीं बाल कल्याण समीति के पूर्व अध्यक्ष और बंगलुरु चाइल्डलाइन की नोडल डायरेक्टर वसुदेव शर्मा का कहना है कि ‘अगर लोग इस तरह की अफवाहों के झांसे में आकर कोई कदम उठाते हैं तो मानव अधिकार के उल्लघंन के मामले में फंस सकते हैं.’ यही नहीं किशोर कानून (बाल सुरक्षा एवं सरक्षंण अधिनियम) 2015 के मुताबिक कानून के दायरे से बाहर जाकर इस तरह के प्रस्ताव देना और स्वीकार करना, दोनों ही गैरकानूनी होता है और इसके लिए 1 से 5 साल तक की सजा हो सकती है.



वैसे भी बच्चों को एक कानूनी दायरे में लाकर गोद लेने की प्रक्रिया ना सिर्फ बच्चे के लिए बल्कि गोद लेने वाले परिवार के लिए भी बेहतर होता है. अगर कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती है तो बच्चे को गोद लेने वाले पालकों से अलग किया जा सकता है, यही नहीं पालकों को बच्चो की तस्करी के मामले में जेल भी हो सकती है.

क्या है सही तरीका

किसी पालक को अगर बच्चे को गोद लेना है या कानूनी तरीके से किसी बच्चे की मदद करनी है, तो उसे चाइल्डलाइन 1098 पर फोन करके अनाथ या परिवार से बिछड़े हुए बच्चे की जानकारी देना चाहिए. यही नहीं अगर कोई जागरुक नागरिक चाहे तो करीब की विशेषज्ञ एजेंसी जो बच्चों के गोद लेने की प्रक्रिया पर काम करती है, वहां बच्चें को छोड़ सकते हैं. जो एजेंसी से संपर्क करना चाहता है वो इस लिंक पर क्लिक करके राज्य का चुनाव कर सकता है. इस लिंक के ज़रिये आप Central Adoption Resource Authority (CARA) के पेज पर पहुंच जाएंगे जो महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय का हिस्सा है.

जैसे ही इस विशेषज्ञ एजेंसी के पास बच्चा पहुंचता है, बाल कल्याण समिति तुरंत कार्यवाही करके ये पता लगाती है कि बच्चे का कोई नाते रिश्तेदार मौजूद है, जो उसकी जिम्मेदारी उठा सकता है, उसके बाद वो ये बताते हैं कि बच्चे को गोद दिया जा सकता है. वर्तमान में 30,000 ऐसे पालक हैं जिनकी CARA की तरफ से तमाम तरह की जांच पूरी की जा चुकी है और वो बच्चे के लिए इंतज़ार कर रहे हैं. कोविड को अलग भी कर दें तो भी आज की तारीख में लाखों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें माता पिता की दरकार है. लाखों बच्चे बालाश्रय में रह रहे हैं तो वहीं लाखों बच्चे सड़कों पर जिंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं.

क्या कहते हैं, बालआश्रय के हाल

ये एक आम धारणा है कि अनाथ बच्चों की देखरेख लिए बालआश्रय एक अच्छा विकल्प हो सकता है, कुछ बालआश्रय अच्छा काम भी कर रहे हैं. लेकिन ये बहुत दुखद है कि ज्यादातर बालाश्रय कभी भी बच्चों को गोद देने का प्रावधान नहीं अपनाते हैं. 2019-2020 में हुए एक सर्वे में पाया गया कि कई बालाश्रय जो जनता के दान पर चल रहे हैं वो बच्चों को गोद देने के बजाए उन्हें जब तक अपने पास रखते हैं जब तक वो खुद अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते हैं. ये ठीक है कि सड़क पर पलने के बच्चों का ऐसे रहना बेहतर विकल्प है. लेकिन किसी बच्चे को जो प्यार, देख-रेख, शिक्षा किसी परिवार में मिल सकता है वो बालाश्रय में नहीं मिल सकता है. कोविड की वजह से इन बाल सुधार गृहों के हाल और बुरे हो गये हैं और ना तो इन्हें चलाने के लिए दान मिल रहा है और ना ही लोग मिल रहे हैं.

गोद लेने की प्रक्रिया में सुधार करने की भी ज़रूरत

जहां लाखों बच्चे बिना माता-पिता के जिंदगी गुज़ार रहे हैं, जहां हज़ारों पालक बच्चों को अपनाने के लिए इंतज़ार कर रहे हैं ऐसे में ज़रूरत है कि हम गोद लेने की प्रक्रिया को दुरुस्त करें जिससे बच्चों को सही देखरेख हासिल हो सके. इस महामारी ने हमें एक मौका दिया है, जिससे इस तंत्र को सुधारा जा सकता है.

अनाथ या बिछड़े बच्चे की मदद के लिए क्या करें

1. तुरंत चाइल्डलाइन नंबर 1098 पर संपर्क करें

2. बच्चें को करीब की विशेषज्ञ गोद लेने वाली एजेंसी के पास ले जाएं, जिसे आप अपना राज्य का चुनाव करके देख सकते हैं.

3. बच्चे को किसी भी ऐसी संस्था को सुपुर्द ना करें जो ये दावा करता है कि वो बच्चों के लिए पालक ढूंढ लेगा

4. जो पालक बच्चा गोद लेना चाहते हैं वो कारा पर जाकर देख सकते हैं कि इस प्रक्रिया के लिए कैसे रजिस्टर्ड किया जाता है.

5. बच्चों को लेने या देना का कोई और तरीका ना अपनाए, ये गैरकानूनी है.

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज