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वन अधिकार अधिनियम की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली पहुंचे हजारों आदिवासी

News18Hindi
Updated: November 21, 2019, 11:15 PM IST
वन अधिकार अधिनियम की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली पहुंचे हजारों आदिवासी
वन विभाग की जमीन से बेदखल करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट (supreme Court) के आदेश के विरोध में आदिवासी संगठन दिल्ली में भूमि अधिकार आंदोलन के लिए पहुंच गए. Photo. News18

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वन अधिकार अधिनियम को सही तरह से लागू करने की मांग को लेकर देश के हजारों आदिवासी विरोध प्रदर्शन करने पहुंचे हैं. वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के तहत जिन आदिवासियों एवं पारंपरिक वनवासियों के दावे खारिज हो गए हैं, उन्हें वन विभाग की जमीन से बेदखल करने संबंधी आदेश के विरोध में आदिवासी संगठनों का ये विरोध प्रदर्शन है

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  • Last Updated: November 21, 2019, 11:15 PM IST
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नई दिल्ली. वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के तहत जिन आदिवासियों एवं पारंपरिक वनवासियों के दावे खारिज हो गए हैं, उन्हें वन विभाग की जमीन से बेदखल करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट (supreme Court) के आदेश के विरोध में आदिवासी संगठन दिल्ली में भूमि अधिकार आंदोलन के लिए पहुंच गए.  केंद्र सरकार का विरोध करने और विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए देश भर से 60 से ज्यादा संगठनों के हजारों लोग दिल्ली पहुंचे हैं. ये संगठन सीपीआईएम नेता बृंदा करात, पश्चिम बंगाल के पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह, त्रिपुरा के पूर्व सांसद जितेंद्र चौधरी के नेतृत्व में इन आदिवासियों की मांग है कि सरकार वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act (FRA), 2006) सही ढंग से लागू करे.

विरोध प्रदर्शन करने आए लोगेां का कहना है कि कानून के मुताबिक अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ साथ वनों में रहने वाले लोगों को इस बात की इजाजत है कि वह जीवन जीने के लिए वन संसाधनों का इस्तेमाल करें और वनों का सरंक्षण करें. लेकिन जमीनी हालात बिल्कुल अलग हैं. ऐसे कोई प्रयास नहीं हुए हैं जो कानून के हिसाब से हों.

दार्जिलिंग के रहने वाले और ऑल यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपल के शिवा शुनुवा की कहानी ऐसी ही है. वह गोरखालैंड की मांग करने वालों और वहां पर गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के बीच फंसकर रह गए हैं. इसमें अब तक उनकी जमीन का वर्गीकरण नहीं हो पाया है.

कुछ ऐसी ही कहानी मध्य प्रदेश के सिवाल के राकेश नरसिंह दावार की है. उनका कहना है कि वन विभाग ने उनके घर और खेतों को नष्ट कर दिया है. उन्होंने आसपास के घरों में बुलडोजर चला दिया और हमारे खेतों में ट्रकों के साथ गड्ढों को खोद दिया. उत्तराखंड के रहने वाले गुज्जर समुदाय से आने वाले मोहम्मद शफी को भी 2015 में भी ऐसा ही कड़वा अनुभव मिला. उस समय भी वन विभाग ने उनके घर और खेतों को तहस नहस कर दिया था. वह इसकी लड़ाई अब तक कोर्ट में लड़ रहे हैं.

हालांकि 13 फरवरी, 2019 को पारित सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक वन अधिकार रैली कोर्ट के आदेश के खिलाफ है. उस आदेश में पारंपरिक वनवासियों को उनके प्राकृतिक आवास से विस्थापन का निर्देश दिया गया था. वन विभाग द्वारा व्यक्तिगत वन अधिकारों, सामुदायिक अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के उनके दावों को खारिज कर दिया गया. आदेश के तहत इस कार्रवाई पर कोर्ट ने 10 जुलाई, 2019 तक रोक लगा दी थी. इस प्रकार 11.8 लाख वनवासियों उनके घरों से बाहर निकलने से बच गए.

इस मामले में 26 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई से पहले इससे जुड़े नेता, किसान और भूमि अधिकार कार्यकर्ता एकत्रित होकर अपना विरोध पक्ष मजबूत करना चाहते हैं.

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First published: November 21, 2019, 11:15 PM IST
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