OPINION: US के बाद भारत के चुनाव में भी असर डाल सकता है ‘विदेशी हाथ’

वैश्विक स्तर पर भारत के महत्व को देखते हुए यह तय है कि भारत की लीडरशिप दुनिया के जियोपॉलिटिक्स पर बड़ा असर डाल सकती है. ऐसे में चुनाव में विदेशी दखल के खतरे को नजरअंदाज करना पूरी तरह से गैरजिम्मेदाराना होगा.

News18Hindi
Updated: January 7, 2019, 4:58 PM IST
OPINION: US के बाद भारत के चुनाव में भी असर डाल सकता है ‘विदेशी हाथ’
नेटवर्क 18 क्रिएटिव
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Updated: January 7, 2019, 4:58 PM IST
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हूडा

हम 2019 में कदम रख चुके हैं. इस साल हम देश ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक पर्व यानी लोकसभा चुनाव की साक्षी बनेंगे. हमेशा की तरह राजनीतिक हलचल रहेगी, लेकिन कई मायनों में यह चुनाव पहले से अलग होगा. हमें राजनीतिक हल्के में जानकारियों का युद्ध होता नजर आएगा.

सामान्य राजनीतिक घटनाओं के लिए वारफेयर यानी युद्ध जैसे शब्द का इस्तेमाल हैरानी में डाल सकता है. लेकिन 2016 में हुए अमेरिकी चुनाव में रूसी हस्तक्षेप पर सुनवाई के दौरान का एक किस्सा मैं आपके साथ साझा करना चाहूंगा. फेसबुक, ट्विटर और गूगल के प्रतिनिधियों के गोलमोल जवाब से परेशान होकर सीनेटर डियाने फिंस्टीन ने कहा था, 'आपको समझ में नहीं आ रहा है! यह एक बड़ा मुद्दा है. हम जिस बारे में बात कर रहे हैं वह भूचाल लाने वाला है. यह एक साइबर युद्ध है.'



कैम्ब्रिज एनालिटिका के खुलासे और अमेरिकी चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप की खबरों से भारत में भी खासा हंगामा हुआ. इंफॉर्मेशन टेक्टनोलॉजी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जुलाई 2018 में राज्यसभा में जानकारी दी कि कैम्ब्रिज एनालिटिका द्वारा फेसबुक डेटा के गलत इस्तेमाल की जांच के लिए सीबीआई को निर्देश दिए गए हैं.

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उपचुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा ने भारत में चुनाव की पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों से चर्चा भी की थी. इस दौरान वोटरों को फेक न्यूज के संबंध में जागरूक करने उपायों पर चर्चा की गई थी.

सरकार और चुनाव आयोग के ये कदम भले ही महत्वपूर्ण हों, लेकिन इनका सोशल मीडिया के जरिये राजनीतिक प्रचार पर बेहद कम असर पड़ेगा. इसके नतीजे पहले ही देखे जा सकते हैं, भारत में लिंग, जाति, धर्म और राष्ट्रवाद पर लोगों को सोशल मीडिया पर ट्रोल करना आम बात हो गई है.
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मैं कोई लीगल एक्सपर्ट नहीं हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हमारे यहां फिलहाल ऐसा कोई कानून है जो सोशल मीडिया यूजर्स से टार्गेटेड पॉलिटिकल कम्यूनिकेशन को रोकता है. इसलिए ऐसा कुछ नहीं है जो राजनीतिक दलों को हमारे पूर्वाग्रहों को टारगेट करने और उन पूर्वाग्रहों को अधिक मजबूत बनाकर एक विचारधारा विशेष के लोगों को एक तरफ खींचने से कोई नहीं रोक सकता है.

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राजनीतिक फायदे के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कोई नई चीज नहीं है. 2008 में बराक ओबामा के कैम्पेन को सोशल मीडिया के व्यापक और सधे हुए इस्तेमाल के लिए याद किया जाता है. हालांकि सोशल मीडिया की टेक्नोलॉजी लगातार बढ़ रही है. जब भी हम किसी पोस्ट को लाइक या शेयर करते हैं सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म हमें उसी तरह के कंटेट भेजने लगता है जिससे हमारे विचार को और बल मिलता है और हम किसी वैकल्पिक दृष्टिकोण की तरफ देख ही नहीं पाते हैं.

एली परिसर इसे फिल्टर बबल कहते हैं जो कि अपने आप जनरेट होने वाला एक अदृष्य प्रोपैगैंडा है. यह हमें अपने ही विचारों से बांधे रखता है और चीजों को लेकर हमारी सोच को और मजबूत करता है. इस तरह अनजाने ही हम एक ऐसे अंधेरे में डूबते चले जाते हैं, जहां दूसरे पक्ष को लेकर हमें कुछ भी नहीं मालूम होता है.

इससे कुछ बड़े सवाल खड़े होते हैं. क्या सोशल मीडिया पर इस तरह का प्रचार करना सही है जो समाज की दरार को और बड़ी करता है? यूजर्स की वोटिंग चॉइस को किस हद तक प्रभावित करने की अनुमति राजनीतिक दलों को होनी चाहिए? क्या आगामी लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को महज तकनीकि मुद्दा मानने की बजाए एथिकल माना जाए? इन मुद्दों पर चुनाव आयोग को गंभीर बहस करनी चाहिए.

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भारतीय चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस संबंध में हमने पूरी दुनिया में कई सबूत देखे हैं. पिछले महीने US के 2018 के मिड टर्म चुनाव की रिपोर्ट देते वक्त नेशनल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर डैन कोट्स ने कहा था, “रूस, चीन और ईरान समेत अन्य देशों ने यूएस को टारगेट करते हुए कई गतिविधियां और मैसेजिंग कैम्पेन चलाया था ताकि वे अपने सामरिक हितों को साध सकें.”

2016 में अमेरिकी चुनाव में दखल के संबंध में रूस से जुड़े करीब 146 मिलियन फेसबुक और इंस्टाग्राम यूजर्स का नाम सामने आया था. वैश्विक स्तर पर भारत के महत्व को देखते हुए यह तय है कि भारत की लीडरशिप दुनिया के जियोपॉलिटिक्स पर बड़ा असर डाल सकती है. ऐसे में चुनाव में विदेशी दखल के खतरे को नजरअंदाज करना पूरी तरह से गैरजिम्मेदाराना होगा.

सोशल मीडिया का 'हथियार की तरह इस्तेमाल' अब आम हो गया है, लेकिन भारत में इससे निपटने की दिशा में उचित कदम नहीं उठाए गए हैं. अगर हम लोकतंत्र पर जनता का विश्वास बनाए रखना चाहते हैं तो हमें जल्द से जल्द समाधान की तरफ बढ़ना होगा. इसकी शुरुआत व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा से होगी. इसी डाटा की मदद से टारगेटेड कम्यूनिकेशन के लिए किसी यूजर की साइकोग्राफिक प्रोफाइलिंग की जाती है.

कैम्ब्रिज एनालिटिका की वेबसाइट बड़े ही गर्व से कहती है, 'एक्सपर्ट्स और विभिन्न एनालिटिकल टूल्स की मदद से हमारी कंपनी ने ट्रंप को चुनाव जितवाने में मदद की. उन्होंने चुनाव के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की मदद से वोटर्स को लक्षित संदेश भेजे थे.'

(लेखक भारतीय सेना के पूर्व नॉर्दर्न कमांडर हैं. उनके नेतृत्व में सेना ने 2016 में पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था)

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