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कभी UPA के साथ रही ममता बनर्जी आज क्यों कह रही हैं 'अब कोई UPA नहीं', यहां छिपा है जवाब

कभी UPA के साथ रही ममता बनर्जी आज क्यों कह रही हैं 'अब कोई UPA नहीं', यहां छिपा है जवाब

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की फाइल फोटो

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की फाइल फोटो

Mamata Banerjee on UPA: अटकलें हैं कि NCP चीफ शरद पवार (Sharad Pawar) क्षेत्रीय दलों को साथ लाने की पहल कर सकते हैं. बनर्जी के साथ उनकी मुलाकात के बाद पवार ने कहा कि विपक्षी दलों को एक मजबूत विकल्प देना होगा. यह पूछे जाने पर कि क्या कांग्रेस इस मजबूत विकल्प का हिस्सा होगी, उन्होंने कहा 'भाजपा का विरोध करने वाले सभी लोगों का हमारे साथ आना स्वागत योग्य है. किसी को बाहर करने का सवाल ही नहीं है.'

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    नई दिल्ली. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल (West Bengal) की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) बुधवार को महाराष्ट्र पहुंची. यहां राजधानी मुंबई में ममता ने दो महत्वपूर्ण बयान दिए. उन्होंने कहा- ‘अगर सारे क्षेत्रीय दल एक साथ आ जाएं तो भारतीय जनता पार्टी को आसानी से हराया जा सकता है.’ वहीं नेश्नलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) के मुखिया शरद पवार से मुलाकात के बाद ममता ने कहा- ‘UPA क्या है? अब कोई UPA नहीं है.’ बात ममता की करें तो वह कभी खुद कभी UPA यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का हिस्सा थीं.

    अब ‘क्षेत्रीय दलों’ पर ममता का जोर यह संकेत है कि कांग्रेस, भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है. साथ ही वह यह बताने की कोशिश कर रही हैं कि क्षेत्रीय ताकत वैकल्पिक समूह बनने के लिए बेहतर स्थिति में है. बनर्जी शायद संकेत दे रही थीं कि यह ऐसे ग्रुपिंग का समय है, जिसमें कांग्रेस नेता नहीं होगी. साल 2004 में राजनीतिक जरूरतों के जवाब में गठित UPA ने कई चुनौतियों का सामना किया. साल 2008 में प्रमुख साझेदार वामपंथी दलों ने गठबंधन छोड़ दिया तो वहीं कुछ सहयोगी उस पर समय-समय पर हावी होते रहे. साल 2004 और साल 2014 के बीच कई दल इससे बाहर आए और साल 2014 में मिली हार के बाद गठबंधन अपने आप बिखरने लगा.

    कैसे बना UPA?
    साल 2004 के लोकसभा चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए की हार के बाद UPA अस्तित्व में आया. 145 सीटों के साथ कांग्रेस, भाजपा से केवल सात सीटों पर आगे थी. भाजपा को बाहर रखना धर्मनिरपेक्ष विपक्ष के लिए जरूरी हो गया था. स्वाभाविक रूप से सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण कांग्रेस अगुवा बन गई.

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    वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता और उस वक्त सीपीएम के महासचिव रहे हरकिशन सिंह सुरजीत ने इसमें अहम भूमिका निभाई. सुरजीत और कांग्रेस ने अंततः 14 पार्टियों- राजद, डीएमके, एनसीपी, पीएमके, टीआरएस, झामुमो, लोजपा, एमडीएमके, एआईएमआईएम, पीडीपी, आईयूएमएल, आरपीआई (ए), आरपीआई (जी) और केसी (जे) को साथ लाने में सफलता हासिल की. सभी दलों ने चुनाव के बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन किया.

    चार वाम दलों – सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक – ने एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम (सीएमपी) के आधार पर बाहर से समर्थन प्रदान किया, जिस पर 17 मई, 2004 को हस्ताक्षर किए गए. जबकि कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी और रालोद को बैठक के लिए आमंत्रित नहीं किया था, सुरजीत अजीत सिंह और अमर सिंह दोनों को अपने साथ ले आए.

    कैसे मिला गठबंधन को UPA नाम
    गठबंधन का नाम ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन’ रखना नेताओं की पसंद नहीं था. इसमें शामिल लोगों का कहना है कि शुरुआती विकल्प ‘यूनाइटेड सेक्युलर एलायंस’ या ‘प्रोग्रेसिव सेक्युलर एलायंस’ था, लेकिन द्रमुक के दिवंगत संरक्षक एम करुणानिधि ने 16 मई, 2004 को एक बैठक में कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी से कहा कि तमिल में, धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ गैर-धार्मिक है. फिर उन्होंने ‘प्रगतिशील गठबंधन’ नाम सुझाया. सभी ने उनके कद को देखते हुए नाम स्वीकार कर लिया.

    22 मई 2004 को मनमोहन सिंह ने UPA सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. सिंह के साथ शपथ लेने वालों में NCP प्रमुख पवार, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद, तत्कालीन लोजपा अध्यक्ष स्व. रामविलास पासवान, झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन, टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव, द्रमुक के टीआर बालू, दयानिधि मारन और ए राजा और पीएमके प्रमुख एस रामदास के बेटे अंबुमणि रामदास शामिल थे.

    UPA को लगे झटके
    UPA छोड़ने वाली पहली पार्टी साल 2006 में टीआरएस थी. तत्कालीन श्रम मंत्री
    केसीआर और उनके पार्टी के सहयोगी ए नरेंद्र ने तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर सरकार छोड़ दी थी. वाइको के एमडीएमके ने सीएमपी में अधिकांश योजनाओं को लागू करने में विफल रहने का आरोप लगाते हुए साल 2007 में गठबंधन छोड़ दिया और सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.

    वाम दलों ने दिया सबसे बड़ा झटका
    सबसे बड़ा झटका साल 2008 में लगा जब चार वाम दलों ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर आगे बढ़ने की सरकार की जिद पर अपना समर्थन वापस ले लिया. साल 2005 में पीएम सिंह की अमेरिका यात्रा के बाद सौदे पर मतभेद सामने आए. अगले तीन सालों तक सरकार और वामपंथी दलों के बीच लंबी वार्ता हुई. सरकार अल्पमत में चली गई लेकिन समाजवादी पार्टी ने उन्हें अविश्वास प्रस्ताव से बचा लिया. इसी सपा ने साल 2004 में UPA का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने पर अपमानित महसूस किया था.

    साल 2009 में अपने-अपने राज्यों में चुनावी बदलाव के कारण पीडीपी और पीएमके बाहर हो गए. पीएमके ने UPA छोड़ दिया और डीएमके-कांग्रेस के खिलाफ तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन किया, जबकि पीडीपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन न करने का फैसला किया, क्योंकि कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस संग जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने का फैसला कर लिया था.

    UPA 2 का क्या रहा हाल?
    साल 2009 में UPA सत्ता में लौटी और कांग्रेस को आश्चर्यजनक रूप से 206 सीटें मिलीं. हालांकि पांच साल पहले की तुलना में कहीं अधिक सीटें हासिल करने के बाद भी कांग्रेस को अभी भी सहयोगियों की जरूरत थी. इसके लिए तृणमूल कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस आगे आईं. UPA 2 में बनर्जी को रेलवे विभाग दिया गया था. लेकिन UPA-1 की तुलना में सहयोगी दलों की सूची कम हो गई थी. केवल पांच दलों ने कांग्रेस के साथ शपथ ली, जिसमें तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, डीएमके, नेशनल कॉन्फ्रेंस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग शामिल थी.

    UPA को इस बार वाम दलों का समर्थन नहीं मिला. पासवान और लालू भी साथ नहीं थे, बिहार में चुनाव के लिए गठबंधन बनाते समय दोनों ने कांग्रेस को नजरअंदाज कर दिया था और कांग्रेस ने लालू की पार्टी राजद को सरकार का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित नहीं किया. हालांकि, राजद ने सरकार को समर्थन दिया और ऐसा ही सपा और बसपा ने भी किया. लालू ने अंततः साल 2010 में राज्य सभा में महिला आरक्षण विधेयक के विरोध में समर्थन वापस ले लिया.

    हालांकि एआईएमआईएम, वीसीके, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट सहित कई पार्टियां बिना किसी मंत्री पद के UPA का हिस्सा थीं. इस बीच बनर्जी ने UPA-2 की शर्तों को तय किया.  उदाहरण के लिए साल 2012 में, उन्होंने अपनी पार्टी के सहयोगी दिनेश त्रिवेदी को यात्री किराए में बढ़ोतरी के बाद रेल मंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए कहा और पार्टी के सांसद मुकुल रॉय को उनके उत्तराधिकारी के रूप में नामित किया. कांग्रेस नेतृत्व के पास इसको मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था.

    उसी साल तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक ने UPA छोड़ दिया. मार्च 2012 में, दूसरे सबसे बड़े घटक डीएमके ने तमिलों के कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन पर श्रीलंका के खिलाफ प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में चिंताओं का जिक्र ना करने की वजह से सरकार के विरोध में अपने पांच मंत्रियों को बाहर कर दिया और सितंबर में, तृणमूल कांग्रेस ने मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर 6 मंत्रियों के साथ अपना समर्थन वापस ले लिया. झारखंड की जेवीएम-पी ने दो सांसदों के साथ इसी मुद्दे पर अपना समर्थन वापस ले लिया. एआईएमआईएम ने भी उसी साल UPA छोड़ दिया था.

    साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे कम 44 सीटें मिलीं. हालांकि राजनीतिक दलों के समूह को इसके बाद भी UPA कहा जा रहा था. तकनीकी रूप से साल 2014 के बाद कोई UPA नहीं था. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इन दिनों, वे आम तौर पर विपक्षी दलों के लिए ‘समान विचारधारा वाले दल’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

    तो क्या बनर्जी सही कर रही हैं?
    इसलिए बनर्जी का यह कहना सही है कि UPA नहीं है. इसके नेता लंबे समय से नहीं मिले हैं. द्रमुक, NCP और झामुमो को छोड़कर, उनमें से अधिकांश के साथ कांग्रेस के संबंध अब तनावपूर्ण हैं. कांग्रेस को लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ रहा है. पिछले सात वर्षों में कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है. पार्टी को राज्यों में एक हार से दूसरी हार का सामना करना पड़ा है. राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर आंतरिक असंतोष और नेतृत्व के सवाल का समाधान करने में असमर्थता ने इस गति को और बढ़ा दिया है. विपक्ष में कई लोगों का मानना है कि कांग्रेस जरूरी नेतृत्व नहीं कर पा रही है.

    कांग्रेस और UPA के बचे हिस्से के लिए सबसे नई चुनौती तृणमूल कांग्रेस का आक्रामक विस्तार अभियान, बनर्जी का बढ़ता कद और कांग्रेस के सहयोगियों तक पहुंचने की उनकी कोशिश है. UPA के अस्तित्व को नकारते हुए ममता शायद यह संदेश देने की कोशिश में हैं कि अब एक ऐसा नया समूह बनेगा, जिसमें कांग्रेस खुद-ब-खुद नेता नहीं हो सकती है. इस मुद्दे पर ममता और पवार एक साथ दिख रहे हैं.

    NCP के सूत्रों का कहना है कि पवार विपक्षी खेमे को जरूरी नेतृत्व मुहैया नहीं कराने को लेकर कांग्रेस से नाराज हैं. NCP के कुछ नेताओं का कहना है कि पवार का मानना है कि क्षेत्रीय दल भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकते हैं और कांग्रेस यह तय कर सकती है कि वह उसका हिस्सा बनना चाहती है या नहीं.

    अटकलें हैं कि पवार क्षेत्रीय दलों को साथ लाने की पहल कर सकते हैं. बनर्जी के साथ उनकी मुलाकात के बाद पवार ने कहा कि विपक्षी दलों को एक मजबूत विकल्प देना होगा. यह पूछे जाने पर कि क्या कांग्रेस इस मजबूत विकल्प का हिस्सा होगी, उन्होंने कहा ‘भाजपा का विरोध करने वाले सभी लोगों का हमारे साथ आने पर स्वागत है. किसी को बाहर करने का सवाल ही नहीं है.’

    Tags: Congress, Mamata banerjee, NCP, Sharad pawar, TMC

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