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टी. एन. शेषन: चुनाव आयुक्त के रूप में शानदार कार्य के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा

News18Hindi
Updated: November 11, 2019, 12:00 PM IST
टी. एन. शेषन: चुनाव आयुक्त के रूप में शानदार कार्य के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा
देश के 10वे चुनाव आयुक्त टी एन शेषन का निधन हो गया है.

1955 बैच के भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी टी.एन शेषन को दिसंबर 1990 में चुनाव आयुक्त बनाया गया और उन्होंने 1996 तक इस पद पर कार्य किया.

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  • Last Updated: November 11, 2019, 12:00 PM IST
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बेहतरीन प्रशासक और राजनीतिज्ञों को चुनाव आयोग की ताकत का एहसास कराने वाले पूर्व चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन (T. N. Seshan) का रविवार को निधन हो गया है. 1955 बैच के तमिलनाड़ु कैडर के आईएएस (IAS) अधिकारी रहे शेषन ने भारत सरकार के कई महत्वपूर्ण विभागों में काम किया था. हालांकि देश के 10वें चुनाव आयुक्त के रूप में शेषन के शानदार कार्य के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक संवेदना व्यक्त करते हुए टी. एन. शेषन को भारतीय प्रशासनिक सेवा का शानदार अधिकारी बताया.

शेषन को एक सख्त चुनाव आयुक्त के रूप में जाना जाता है. शेषन को दिसंबर 1990 में चुनाव आयुक्त बनाया गया था और उन्होंने 1996 तक इस पद पर कार्य किया. शेषन को ऐसे अधिकारी के रूप में जाना जाता है, जो भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे.

तमिलनाडु कैडर के आईएएस अधिकारी रहे टी.एन. शेषन को एक सख्त चुनाव आयुक्त के रूप में जाना जाता है.


मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत

शेषन मूलत: एक मौलिक सोच वाले ईमानदार अधिकारी थे. चुनाव को साफ सुथरा रखने में उनका योगदान सराहनीय रहा. वह देश के पहले चुनाव आयुक्त थे जिन्होंने चुनाव आयोग की शक्तियों से लोगों को अवगत कराया. शेषन ने चुनाव में होने वाली धांधली को रोकने के लिए मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत की थी.

चुनाव आयोग ने सर्वप्रथम 1993 में देश के सभी मतदाताओं के लिए पहचान पत्र बनाने का आदेश दिया. हालांकि कई सुधारों के बाद चुनाव आयोग ने 2000 में मतदाता फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) का अनिवार्य बनाने का आदेश जारी किया. जिसके तहत अब तक पूरे भारत में 450 मिलियन से अधिक मतदाता या चुनाव पहचान पत्र वितरित किए जा चुके हैं.

गौरतलब है कि मतदाता फोटो पहचान पत्र निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किया गया एक ऐसा पहचान पत्र है, जो सभी योग्य मतदाताओं को चुनाव के समय पहचान सुनिश्चित करने में मदद करता है. बता दें कि भविष्य में इस पहचान पत्र को और संशोधित करके बायोमेट्रिक डेटा का रूप देने की तैयारी है. जिसमें मतदाता के डिजिटल हस्ताक्षर और फिंगरप्रिंट को एक माइक्रोचिप के अंदर रखा जाएगा.
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चुनाव आयोग ने 2000 में मतदाता फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) का आदेश जारी किया.


आदर्श आचार संहिता को सख्ती से लागू किया
शेषन के चुनाव सुधारों में आदर्श आचार संहिता एक महत्वपूर्ण आयाम है. चुनावों में आदर्श आचार संहिता आज सभी राजनीतिक पार्टियां और सरकार पर लागू हो रही है, तो इसका श्रेय शेषन को ही जाता है. शेषन ने अपने कार्यकाल में चुनाव सुधारों के लिए सभी राजनीतिक दलों पर चुनाव आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करके चुनाव आयोग की ताकत का एहसास कराया. शेषन के इन उपायों द्वारा चुनाव आयोग के मजबूत होने के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र भी मजबूत हुआ है.

90 के दशक से पहले राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रचार के नियमों का पालन नहीं किया जाता था. चुनावों में बेहिसाब धन और बाहुबल का प्रयोग होता था. लेकिन शेषन ने आचार संहिता को सख्ती से लागू करके चुनावी खर्च को नियंत्रित करने के साथ ही चुनाव प्रचार का समय भी निश्चित किया. अब रात 10 बजे के बाद चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी गई है और राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों को चुनाव खर्च का हिसाब भी देना पड़ता है.

चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था बनाया
चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित करने में  शेषन का महत्वपूर्ण योगदान है. शेषन देश के पहले ऐसे चुनाव आयुक्त थे जिन्होंने यह कहने का साहस दिखाया कि चुनाव आयोग सरकार का हिस्सा नहीं है. चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है. शेषन से पहले सरकारी पत्र में चुनाव आयोग भारत सरकार लिखा होता था. शेषन ने इस परंपरा को समाप्त कर सरकारी अधिकारियों की चुनाव आयोग के प्रति जवाबदेही तय की.

शेषन ने केंद्र और राज्य सरकारों के सचिवों को आयोग के प्रति जिम्मेदार बनाया और इसके लिए उन पर सख्ती भी की गई. अधिकारियों को चुनाव आयोग के काम को गंभीरता से लेने का आदेश दिया. शेषन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब वह कैबिनेट सचिव थे, तो प्रधानमंत्री ने उनसे कहा था कि वह चुनाव आयोग को बता दे कि प्रधानमंत्री इस-इस दिन चुनाव करवाना चाहते हैं. लेकिन शेषन ने प्रधानमंत्री को बताया कि ऐसा करने का उन्हें अधिकार नहीं है, वह सिर्फ यह कह सकते हैं कि सरकार चुनाव के लिए तैयार है.

शेषन ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित किया.


कार्यप्रणाली को लेकर शेषन की राजनीतिज्ञों द्वारा आलोचना
1993 में शेषन ने सरकार को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए लिखा. साथ ही उन्होंने स्वतंत्रता बहाल न होने तक देश में चुनाव कराने में असमर्थता जाहिर की. शेषन के इस कदम से देश के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया था. हालांकि शेषन के इस कदम से उनकी काफी आलोचना हुई लेकिन वह अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए.

चुनाव आयुक्त बनने के लिए शेषन को स्वामी ने मनाया
कहा जाता है कि शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के लिए उत्सुक नहीं थे. चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में शेषन को प्रधानमंत्री की तरफ से डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद का प्रस्ताव दिया था, लेकिन शेषन ने इनमें कोई रुचि नहीं दिखाई.

दरअसल स्वामी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में शेषन के गुरु थे और इस नाते वह उनके करीब थे. प्राप्त जानकारी के अनुसार डॉ. स्वामी ने शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को स्वीकार कर लेने के लिए काफी मान मनौव्वल की थी. बाद शेषन ने राजीव गांधी की सलाह पर मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए अपनी सहमति दी थी. हालांकि राजीव गांधी ने चंद्रशेखर को इस फैसले के लिए पछताने की बात कही थी.

राजीव गांधी के करीबी थे शेषन
टी. एन. शेषन राजीव गांधी के काफी करीबी माने जाते थे. राजीव गांधी ने उनकी काबिलियत देखते हुए उन्हें आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सुरक्षा सचिव बना दिया था. हालांकि इस पद पर कार्य करते हुए शेषन खुद सुरक्षा विशेषज्ञ बन गए थे. कई बार तो उनकी कार्यशैली के कारण राजीव के लिए काफी असहज स्थित उत्पन्न हो जाती थी.

उल्लेखनीय है कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो उस समय उनकी सुरक्षा सचिव की जिम्मेदारी शेषन निभा रहे थे. राजीव विजय चौक से इंडिया गेट तक दौड़ने वाले थे. उस दौरान शेषन उनकी सुरक्षा में पूरी तरह से मुस्तैद थे. जब राजीव गांधी ने मजाक किया तो तब उन्होंने कहा था कि कुछ लोगों को सीधे खड़ा होना पड़ता है, ताकि देश का प्रधानमंत्री दौड़ सके.

निर्भीकता और स्पष्टवादिता से असहज हुए शेख अब्दुल्ला
शेषन अपनी कर्तव्यनिष्ठा, निर्भीकता, स्पष्टवादिता और आजाद प्रवृत्ति के लिए जाने जाते थे. पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन के नाम से विख्यात ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने अपनी जीवनी ‘अग्नि की उड़ान’ में शेषन की ईमानदारी और पेशेवर रवैये की तारीफ की है.

दरअसल जब शेषन मदुरै जिले के कलेक्टर थे तो उसी समय तमिलनाडु में जम्मू-कश्मीर के नेता शेख अब्दुला को नजरबंद किया गया था. उस दौरान शेषन को शेख के पत्रों को पढ़ने की जिम्मेदारी दी गई थी. कहते हैं कि एक दिन शेख ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन के नाम पत्र लिखा और शेषन से पूछा क्या तुम अब भी इसे खोलना चाहोगे? शेषन ने कहा कि उनके लिए पत्र पर लिखा पता कोई मायने नहीं रखता.

शेषन एक पेशवर अधिकारी 
शेषन के पेशवर रवैये के कई बेमिसाल उदाहरण हैं. चेन्नई के ट्रांसपोर्ट कमिश्नर रहते शेषन ने समस्याओं को करीब से जानने के लिए  ड्राइविंग और बस के इंजन की भी जानकारी हासिल की थी. साथ ही एक बार सवारियों से भरी बस को कई किलोमीटर तक ड्राइव भी किया था.

हालांकि शेषन एक धार्मिक व्यक्ति थे लेकिन जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त होकर आए तो सबसे पहले उन्होंने ऑफिस से सभी देवी देवताओं की मूर्तियों और कैलेंडरों को हटवा दिया. शेषन अपने फैसले लेने की क्षमता के लिए भी जाने जाते हैं. जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो उन्होंने चुनाव स्थागित कर दिया था.

शेषन साहसिक प्रवृत्ति के अधिकारी
शेषन की साहसिक प्रवृत्ति के अधिकारी थे. मुख्य चुनाव आयुक्त होने के बाद उन्होंने सरकार को लिखा था कि जब तक सरकार चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को सुनिश्चित नहीं करती है, तब तक आयोग चुनाव कराने में असमर्थ है. उन्होंने अगले आदेश तक देश के सभी चुनावों को स्थागित कर दिया था. जिसके कारण बंगाल में राज्यसभा के चुनाव नहीं हो पाए और केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी को इस्तीफा देना पड़ा था.

बिहार में संपन्न कराया था निष्पक्ष चुनाव
एक ऐसा भी समय था, जब बिहार में शायद ही ऐसा कोई चुनाव हो, जो निष्पक्ष और बिना खून-खराबे के संपन्न हुआ हो. चुनाव के सारे अनाचार- बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, हेरा-फेरी, हिंसा ये सभी बिहार के चुनाव के अनिवार्य अंग थे. मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन ने बिहार चुनाव की इस गंदगी को साफ करने के लिए झाडू उठा कर एक साहसिक अभियान चलाया.

हालांकि इसके लिए उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा कई बार परोक्ष धमकी भी दी गई लेकिन शेषन अपने मकसद से एक इंच भी नहीं हटे. अन्होंने बिहार में निष्पक्ष चुनाव करने का फैसला किया. 1995 के बिहार चुनाव में पहले के चुनावों से चली आ रही हत्या और हिंसा का सिलसिला कम हुआ. उन्होंने कठोर नियंत्रण में चार चरणों में बिहार का चुनाव संपन्न कराया था.

बिहार में चुनाव चार चरणों में तीन महीने चला था
इसके लिए उन्होंने बिहार में अर्धसैनिक बलों की 650 टुकड़ियों को तैनात किया था. चुनाव को अलग-अलग चार चरणों में संपन्न कराया था. चार बार मतदान स्थगित किया और राज्य प्रशासन को कड़े नियंत्रण में रखा. चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का जरा सा भी संकेत मिलने पर शेषन ने पूरी चुनाव प्रक्रिया रद्द कर दी.

शेषन की कठोर कार्रवाई के चलते बिहार में चुनाव तीन महीने तक चला था. 8 दिसंबर, 1994 को चुनाव को अधिसूचित किया गया और अंतिम मतदान 28 मार्च, 1995 को संपन्न हुआ. लगभग तीन महीने तक उम्मीदवार सड़कों पर रहा. चुनाव के दौरान चुनाव आयोग अधिकारियों को कड़े निर्देश देता रहा और निर्देशों का पालन न होने की स्थिति में कड़े परिणाम की धमकी देता रहता था.

हालांकि लालू यादव ने इस अवसर का अच्छा फायदा उठाया और बार फिर से अपनी सरकार बनाने में सफल रहे. इस चुनाव के दौरान बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव ने शेषन को धमकी भी दी थी. लालू ने कहा था, ‘भैंसिया पर चढ़ा करके गंगाजी में हेला देंगे.’ हालांकि अंदर से लालू प्रसन्न थे. दरअसल लालू ने सरकारी मशीनरी का प्रयोग करते हुए अपनी जीत सुनिश्चित कर ली थी.

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First published: November 11, 2019, 11:20 AM IST
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