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मेरे बढ़ते कदमों को रोकने के लिए कट्टरपंथियों ने जारी किया था फतवा : जामिया कुलपति नजमा अख्‍तर

Anoop Mishra | News18India
Updated: November 8, 2019, 4:55 PM IST
मेरे बढ़ते कदमों को रोकने के लिए कट्टरपंथियों ने जारी किया था फतवा : जामिया कुलपति नजमा अख्‍तर
जामिया मिलिया इस्‍लामिया की पहली महिला वाइस चासंलर प्रो. नजमा अख्‍तर.

नजमा अख्‍तर (Prof Najma Akhtar) देश की उन महिलाओं में शामिल हैं, जिनके बढ़ते कदमों को बार-बार रूढ़िवादियों ने रोकने की कोशिश की. एक बार, उनकी नौकरी के खिलाफ फतवा भी जारी किया गया. इन तमाम अड़चनों के बावजूद प्रो. नजमा अख्‍तर एक के बाद एक सफलता भरे कदम बढ़ाती गईं. 

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  • Last Updated: November 8, 2019, 4:55 PM IST
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नई दिल्‍ली: जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया (Jamia Millia Islamia) के वाइस चांसलर (Vice Chancellor) पद पर प्रो. नजमा अख्‍तर (Prof  Najma Akhtar) की तैनाती किसी ऐतिहासिक फैसले से कम नहीं है. ऐतिहासिक इ‍सलिए भी क्‍योंकि जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया के 100 साल पुराने सफर में यह पहली बार हुआ, जब एक महिला को यूनिवर्सिटी के सर्वोच्‍च पद पर आसीन किया गया. यहां आपको यह भी बता दें कि प्रो. नजमा अख्‍तर देश की उन महिलाओं में शामिल हैं, जिनके बढ़ते कदमों को बार-बार रूढ़िवादियों ने रोकने की कोशिश की. एक बार, उनकी नौकरी के खिलाफ फतवा भी जारी किया गया. इन तमाम अड़चनों के बावजूद प्रो. नजमा अख्‍तर के सफलता की ओर बढ़ते कदम नहीं रुके. सफलता की इस कहानी को आगे बढ़ाते हुए अब नजमा जामिया की नई तस्वीर बनाने जा रही हैं. इस नई तस्‍वीर को लेकर NEWS 18 इंडिया के विशेष संवाददाता अनूप कुमार मिश्र ने प्रो. नजमा अख्तर से खास मुलाकात की और इस रोचक सफर के पीछे की सच्चाइयों को जाना.

50 के दशक में बच्चियों की तालीम को बेहद गैरजरूरी माना जाता था. इस सोच के इतर, बेहतर तालीम हासिल करने से लेकर वाइस चांसलर के पद तक पहुंचने का सफर कितना चुनौती भरा रहा?
लड़कियों के लिए यह दशक बहुत मुश्किल भरा था. यह वह दौर था, जब लड़कियों में पढ़ने की चाह आने लगी थी, लेकिन कई सामाजिक बंदिशें उनके रास्ते का रोड़ा थीं. चूंकि मैं एक पढ़े-लिखे परिवार से ताल्‍लुक रखती थी, मेरे पिता शिक्षा निदेशक के पद पर थे, लिहाजा मेरी तालीम में कोई खास बाधा नहीं आई. हां, मैंने अपनी तालीम के दौरान इस बात का खास खयाल रखा था कि मुझे तालीम सिर्फ तालीम हासिल करने के लिए नहीं करनी थी, बल्कि कुछ कर गुजरने के लिए करनी थी.

बताया जाता है कि उस दौर में मुस्लिम समुदाय में अंग्रेजी के बाद फारसी और उर्दू जुबां को ही तवज्‍जो दी जाती थी. आपने हिंदी की तालीम ली. कोई खास वजह?

मेरी पूरी तालीम कॉन्‍वेंट में हुई है. लिहाजा, मैं शुरू से ही अंग्रेजी की छात्रा रही हूं. मेरे वालिद साहब की यह सोच थी कि आने वाले जमाने में अगर कुछ बनना है तो हमें न केवल देश की भाषा सीखनी चाहिए, बल्कि बहुत अच्‍छी तरह से सीखनी चाहिए. इसीलिए, मैंने एक्‍सक्‍लूसिविली हिंदी भाषा की तालीम ली. मैंने हिंदी पर अपनी अच्‍छी पकड़ बनाने के लिए कुछ पोर्शन हिंदी मीडियम से भी पढ़ा है. आज मैं, जितनी बेहतर पकड़ फारसी या उर्दू जुबां पर रखती हूं, उससे कहीं अधिक मेरी पकड़ हिंदी भाषा पर है.

आपके नाम देश की पहली एग्‍जामिनेशन कंट्रोलर का खिताब भी है. सुना है उस समय आपके खिलाफ फतवा भी जारी किया गया था, क्या हुआ था उस समय?
अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में कंट्रोलर ऑफ एडमिशन एंड एग्‍जामिनेशन के लिए ऑल इंडिया सेलेक्‍शन के जरिए मेरा चयन हुआ था. उस समय तक न केवल अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, बल्कि देश की अन्‍य किसी भी यूनिवर्सिटी में इस पद पर किसी महिला का चयन नहीं हुआ था. यह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के लिए खास तौर पर बेहद नई बात थी. लिहाजा, मेरे खिलाफ एक फतवा जारी किया गया कि कोई महिला एडमिनिस्‍ट्रेशन के शीर्ष पद पर नहीं रह सकती, क्‍योंकि इस्‍लाम इसकी इजाजत नहीं देता है. इस फतवे के खिलाफ उस समय के डीन फैकेल्‍टी सामने आए और उन्‍होंने नया फतवा जारी कर मेरी राह आसान की.
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आज ऑप्टिकल मार्क रीडर के बिना किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की कल्‍पना करना संभव नहीं है. देश में पहली बार किसी यूनिवर्सिटी में ऑप्टिकल मार्क रीडर को इंट्रोड्यूस करने का श्रेय भी आपको है. यह सोच कैसे आई?
उस समय ऑप्टिकल मार्क रीडर का इस्‍तेमाल कुछ खास प्रतियोगी परीक्षाओं में ही किया जा रहा था. उस समय किसी यूनिवर्सिटी ने नहीं सोचा था कि हम ऑप्टिकल मार्क रीडर के जरिए अपने एडमिशन और एग्‍जामिनेशन भी करा सकते हैं. पहली बार 1990 में मैंने इसे सफलतापूर्वक अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लागू किया. हमारी सफलता के बाद, देश की कई अन्‍य यूनिवर्सिटीज ने एएमयू की तर्ज पर मार्क रीडर को अपने एडमिशन का हिस्‍सा बनाया. आज यह व्‍यवस्‍था पूरे देश में लागू है.

जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया को पहली बार महिला वाइस चांसलर मिली है, यहां के लिए आप क्या नया सोच रही हैं?
मैं हर वह कदम उठाऊंगी, जिसमें  इंस्‍टीट्यूशन और छात्रों की तरक्‍की हो. हम योजनाबद्ध तरीके से जामिया में नए डिपार्टमेंट खोल रहे हैं. बच्‍चों के बेहतर प्‍लेसमेंट के लिए कोशिशें जारी हैं. जामिया के टीचर्स, दूसरी यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर, डायरेक्‍टर के पद तक पहुंचे, इसको लेकर उनकी पहचान को नया मुकाम देने का भी काम हो रहा है. न केवल देश बल्कि विदेशों से बेहतर टीचर्स को जामिया में लाया जा रहा है, जिससे बच्‍चों को बेहतर से बेहतर तालीम दी जा सके.

एक्‍सचेंज प्रोगाम के तहत जामिया के बच्‍चों को विदेश भेजने की योजना पर भी काम चल रहा है?
जामिया के छात्रों को बेहतर तालीम देने के मकसद से हमने ऑस्‍ट्रेलिया, चीन, यूके, जर्मनी सहित अन्‍य देशों के साथ एमओयू साइन किया है. एमओयू के तहत हमारी यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी कुछ सेमेस्‍टर की पढ़ाई विदेश में करते हैं और विदेशी यूनिविर्सटी के छात्र हमारी यूनिवर्सिटी में पढ़ने आते हैं. इसी योजना के तहत, ऑस्‍ट्रेलिया के छात्र जामिया और यहां के छात्र अगले दो सेमेस्‍टर की पढ़ाई के लिए ऑस्‍ट्रेलिया जा रहे हैं.

जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया के बेहतरी से जुड़े़ अन्‍य सवालों के जवाब जानने और पूरा इंटरव्‍यू देखने के लिए क्लिक करें :

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First published: November 8, 2019, 4:26 PM IST
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