India Vs Hindia: अमित शाह के ट्वीट से दक्षिण भारत में फिर छिड़ी भाषाओं की समानता पर बहस

India Vs Hindia: अमित शाह के ट्वीट से दक्षिण भारत में फिर छिड़ी भाषाओं की समानता पर बहस
दक्षिण भारतीय राज्‍यों के लोगों का कहना है कि केंद्र सरकार दूसरी भारतीय भाषाओं की कीमत पर हिंदी को प्रोत्‍साहित करना चाहती है.

केंद्रीय गृह मंत्री (Union Home Minister) और बीजेपी अध्‍यक्ष (BJP National President) अमित शाह (Amit Shah) के ट्वीट के बाद छिड़ी बहस. शाह ने लिखा था, भारत को पहचान के लिए एक वैश्विक भाषा (One Global Language) की दरकार है और हिंदी (Hindi) इस मामले में सबसे बेहतर भाषा हो सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 17, 2019, 6:56 PM IST
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बेंगलुरु. केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह (Amit Shah) के 14 सितंबर को 'विश्‍व हिंदी दिवस' (World Hindi Day) पर किए एक ट्वीट ने भाषा (Language) को लेकर बहस छेड़ दी है. दरअसल, शाह ने ट्वीट किया था कि भारत को अपनी पहचान के तौर पर एक वैश्विक भाषा (One Global Language) की दरकार है और हिंदी इस मामले में सबसे बेहतर भाषा हो सकती है. इसके कुछ ही देर बाद दक्षिण भारत (South India) समेत गैर-हिंदी भाषा वाले ज्‍यादातर राज्‍यों (Non-Hindi States) में भाषा की समानता पर बहस शुरू हो गई. गैर-भाजपा दलों और भाषा के पैरोकारों (Language Activists) ने सोशल मीडिया पर शाह को आड़े हाथ ले लिया. इन लोगों ने कहा कि अमित शाह राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) के 'एक राष्‍ट्र, एक भाषा' के सपने को साकार करने की कोशिश कर रहे हैं.

डीएमके के नेतृत्‍व में तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र को दी चेतावनी
बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह सोशल मीडिया पर लोगों के तंज पर खामोश रहे. इसके बाद बीजेपी नेताओं ने सोशल मीडिया पर मोर्चा संभाला और उनके बचाव में दलीलें देनी शुरू कर दीं. इनमें से काफी लोग सभी के लिए एक भाषा के तौर पर हिंदी की व‍कालत कर रहे थे. वहीं, कुछ लोग कह रहे थे कि इससे किसी दूसरी बड़ी भाषा को कोई नुकसान नहीं होगा. आजादी के बाद से हिंदी थोपे जाने के खिलाफ लड़ रहे तमिलनाडु (Tamil Nadu) के सभी राजनीतिक दलों ने डीएमके (DMK) के नेतृत्‍व में केंद्र को ऐसा कदम नहीं उठाने की चेतावनी दे डाली. यही नहीं, कर्नाटक (Karnataka) में भी इसका कड़ा विरोध किया गया. कर्नाटक के राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार (Central Government) दूसरी भारतीय भाषाओं की कीमत पर हिंदी को प्रोत्‍साहित करना चाहती है.

विरोध के कारण पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्‍त्री को वापस लेना पड़ा था फैसला



भाषा की समानता को लेकर आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh), तेलंगाना (Telangana) और केरल (Kerala) में विरोध की सुगबुगाहट भी हुई. तमिलनाडु और कर्नाटक में 1964-65 के हिंदी विरोधी आंदोलन (Anti-Hindi Protest) में कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी. नतीजतन तत्‍कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री (Lal Bahadur Shastri) को हिंदी को राष्‍ट्रीय भाषा (National Language) बनाने के फैसले को वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था. तब पूर्व पीएम शास्‍त्री के मंत्रिमंडल में मंत्री इंदिरा गांधी (Indira gandhi) ने सरकार के फैसले का विरोध किया था. यहां तक कि उन्‍होंने तमिलनाडु का दौरा कर विरोध कर रहे लोगों से मुलाकात भी की थी. इसके बाद एक राष्‍ट्रीय भाषा के मुद्दे पर ज्‍यादातर सरकारों ने चुप्‍पी साधे रखी. हालांकि, अप्रत्‍यक्ष तरीकों से हिंदी का प्रचार किया जाता रहा, जिसका कई बार विरोध भी हुआ.



पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री को विरोध के कारण हिंदी को राष्‍ट्रीय भाषा बनाने के फैसले को वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था.


हिंदीभाषी राज्‍यों में भी गैर-हिंदी भाषाओं का प्रचार-प्रसार करे सरकार
कन्‍नड़ के सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक, हालिया हिंदी विरोधी आंदोलन उन अप्रवासी उत्‍तर भारतीयों को सीधा जवाब है जो अन्‍य भाषाओं और दक्षिण भारत की संस्‍कृति (Culture of South India) को हीन भावना से देखते हैं. वह कहते हैं कि भाषा के तौर पर कोई भी हिंदी का विरोध नहीं कर रहा है. लोग हिंदीभाषी राज्‍यों में इसके प्रोत्‍साहन का सम्‍मान करते हैं. दक्षिण भारतीय लोगों की मांग है कि सरकार को गैर-हिंदी भाषाओं को भी इसी उत्‍साह के साथ हिंदीभाषी राज्‍यों में भी प्रोत्‍साहित करना चाहिए. कर्नाटक के समाजिक कार्यकर्ता बरुण जवागल ने कहा कि यह भाषाओं की समानता (Language Equality) का आंदोलन है. आंदोलन हिंदी के खिलाफ नहीं है. यह हिंदी को दूसरी बड़ी भाषाओं की कीमत पर प्रोत्‍साहित करने के खिलाफ है.

'संविधान के एक प्रावधान का किया जा रहा इस्‍तेमाल, हम इसके खिलाफ'
जवागल ने कहा कि केंद्र सरकार की सूची में हिंदी बाकी भाषाओं से ऊपर है. केंद्र संविधान के एक प्रावधान का इस्‍तेमाल कर जानबूझकर ऐसा कर रहा है. सबसे पहले इस प्रावधान में संशोधन किया जाना चाहिए. हम इस प्रावधान के खिलाफ हैं. हम भाषाओं की समानता चाहते हैं. संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी 22 भाषाओं के साथ समान व्‍यवहार किया जाना चाहिए. किसी भी भाषा को बड़ा या छोटा दिखाने की जरूरत नहीं है. केंद्र सरकार हिंदी को थोपने के लिए हमारे पैसे का इस्‍तेमाल कर रही है. हम इसी का विरोध कर रहे हैं. कन्‍नड़ डेवलपमेंट अथॉरिटी (KDA) के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर एसजी सिद्दारमैया लंबे समय से भाषाओं की समानता के लिए लड़ रहे हैं.

'अपने हित साधने को हिंदी और गैर-हिंदीभाषी लोगों में खटास डाली जा रही'
प्रोफेसर सिद्दारमैया कहते हैं कि कुछ लोग अपने हित साधने के लिए हिंदी और गैर-हिंदीभाषी लोगों के बीच खटास पैदा करना चाहते हैं. ऐसे लोग इस आंदोलन को हिंदी-विरोधी आंदोलन बता रहे हैं. वह सवाल उठाते हैं कि केंद्र सरकार कन्‍नड़, तमिल या बंगाली के ऊपर हिंदी का प्रचार क्‍यों कर रही है? ये भाषाएं अपने-अपने राज्‍यों में राजभाषाएं हैं. ऐसा करने के पीछे केंद्र की मंशा आखिर क्‍या है? अगर दिल्‍ली और लखनऊ मेट्रो में कन्‍नड़, तमिल या मराठी में साइन बोर्ड नहीं हैं तो बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी में साइन बोर्ड क्‍यों होने चाहिए? भाषा के पैरोकार वसंत शेट्टी का मानना है कि आर्थिक उदारीकरण ने हालात बिगाड़ दिए हैं. ये हिंडिया और इंडिया के बीच की लड़ाई है.



कर्नाटक के पूर्व मुख्‍यमंत्री सिद्दारमैया कहते हैं कि केंद्र सरकार को हिंदी का प्रचार-प्रसार हिंदीभाषी राज्‍यों तक सीमित रखना चाहिए.

सिद्दारमैया ने कहा - हिंदीभाषी राज्‍यों तक सीमित रखें हिंदी का प्रचार-प्रसार
कर्नाटक के पूर्व मुख्‍यमंत्री सिद्दारमैया (Siddaramaiah) भी भाषाओं की समानता की वकालत करते रहे हैं. वह कहते हैं कि केंद्र सरकार को हिंदी का प्रचार-प्रसार हिंदीभाषी राज्‍यों तक सीमित रखना चाहिए. उन्‍हें वहीं हिंदी को लेकर पैसा खर्च करना चाहिए. हमारे राज्‍य में हमारी भाषा ही सबसे ऊपर रहेगी. हमें किसी राष्‍ट्रीय भाषा की जरूरत नहीं है. सभी भारतीय भाषाएं देश की राष्‍ट्रीय भाषाएं हैं. हिंदी के पैरोकार हिंदी की तुलना अंग्रेजी से करते हैं. दक्षिण भारत में इसकी कड़ी आलोचना होती है. वे कहते हैं, सरकार कहती है कि अंग्रेजी विदेशी और हिंदी भारतीय भाषा है, इसलिए हमें इसे पूरे देश में स्‍वीकार कर लेना चाहिए. उनकी दलील बहुत ही कमजोर है क्‍योंकि ऐसे हिंदीभाषी खुद भी अंग्रेजी सीखते हैं. वे कन्‍नड़, तमिल या बंगाली क्‍यों नहीं सीखते?

'केंद्र सरकार देश के संघीय ढांचे से खिलवाड़ कर रही है, जो असंवैधानिक है'
वसंत शेट्टी के मुताबिक, केंद्र सरकार को लगता है कि केवल हिंदी पूरे देश का प्रतिनिधित्‍व कर सकती है. सरकार को ध्‍यान रखना चाहिए कि भारत संघीय राष्‍ट्र है. यह राज्‍यों का एक संघ है. सभी बड़ी भाषाओं के संरक्षण और प्रसार के लिए भाषा के आधार पर राज्‍य बनाए गए. केंद्र सरकार देश के संघीय ढांचे से खिलवाड़ कर रही है, जो असंवैधानिक है. वह सवाल उठाते हैं कि अगर हिंदी रोजगार पैदा कर सकती है तो क्‍यों लाखों हिंदीभाषी राज्‍यों के लोग दक्षिण और पश्चिम के प्रदेशों में पलायन कर रहे हैं. दक्षिण और पश्चिम भारत से कितने लोगों ने हिंदीभाषी राज्‍यों में नौकरी व शिक्षा के लिए पलायन किया है? हिंदीभाषी लोग गैर-हिंदीभाषी राज्‍यों में सभी सेवाएं हिंदी में चाहते हैं, जबकि वे खुद ऐसा नहीं करते हैं.

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