पहली बार सबरीमाला में दो महिलाओं की एंट्री, शुद्धिकरण के बाद कपाट खुले

पहली बार सबरीमाला में दो महिलाओं की एंट्री, शुद्धिकरण के बाद कपाट खुले
दो महिलाओं का दावा है उन्होंने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया और पूजा की (वीडियो ग्रैब)

महिलाओं के परिवार वालों की सुरक्षा के लिए केरल पुलिस की एक टीम को लगा दिया गया है. पिछले साल भी महिलाओं ने सन्निधानम तक चढ़ाई करने की कोशिश की थी लेकिन विरोध के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा था.

  • News18.com
  • Last Updated: January 2, 2019, 11:16 AM IST
  • Share this:
करीब 40 साल उम्र की दो महिलाओं ने बुधवार को भगवान अयप्पा के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया और पूजा-अर्चना की. सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को खत्म करने के बाद यह पहली बार है जब इस उम्र की महिलाओं ने प्रवेश किया है. बता दें कि महिलाओं की एंट्री के बाद पुजारियों ने विरोध जताते हुए शुद्धिकरण के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए थे. शुद्धिकरण की धार्मिक प्रक्रिया के बाद कपाट फिर खोल दिए हैं.

कोझीकोड की रहने वाली सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता बिंदु (42 साल) और मलप्पुरम की रहने वाली सिविल सप्लाई कर्मचारी कनकदुर्गा ने बताया कि उन्होंने भगवान अयप्पा के मंदिर के लिए रात में चढ़ाई करनी शुरू की और सुबह तीन बजकर पैंतालीस मिनट पर दर्शन के लिए पहुंचीं.

जब दोनों महिलाओं ने मंदिर में जाने का अपना वीडियो रिलीज़ किया तो सीएम पिनाराई विजयन ने भी इस बात की पुष्टि की. कनकदुर्गा ने सीएनएन न्यूज - 18 को बताया कि 'हम बीच रात के आस-पार पंबा पहुंंचे और बिना पुलिस सुरक्षा के ही आगे बढ़ने लगे. किसी ने भी हमारा विरोध नहीं किया. वहां भक्त लोग मौजूद थे लेकिन किसी ने भी हमारा रास्ता नहीं रोका और न ही किसी ने हमसे कोई सवाल पूछा.'





ये भी पढ़ें: सबरीमाला में महिलाएं नहीं कर सकीं प्रवेश, एक महीने के लिए कपाट बंद

हालांकि, महिलाओं के परिवार वालों की सुरक्षा के लिए केरल पुलिस की एक टीम को लगा दिया गया है. पिछले साल भी महिलाओं ने सन्निधानम तक चढ़ाई करने की कोशिश की थी लेकिन विरोध के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा था. इसके अलावा 11 महिलाओं को उस वक्त भक्तों ने रोक दिया था.

बता दें कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर हमेशा से रोक नहीं रही है. प्राचीन परंपरा के अनुसार मकरसंक्रांति (मकरविलक्कु) के त्योहार के समय एक खास व्रत रखने वाले लोग ही अनुष्ठान कर सकते हैं. इस अनुष्ठान के लिए 41 दिन का एक व्रत होता है. इस व्रत के 41 दिनों की अवधि महिलाओं को धार्मिक रूप से 'अशुद्ध' कर देती है इसलिए महिलाएं इसे नहीं कर सकतीं. इसीलिए महिलाएं इस अनुष्ठान में हिस्सा नहीं ले सकतीं.

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक पर इतिहासकारों की राय अलग-अलग हैं. एनएस माधवन ने कहा कि 1972 तक महिलाएं मंदिर में आती थीं. राजपरिवार की महिलाओं के आने के प्रमाण भी मिलते हैं. 1980 के दशक में एक फिल्म की शूटिंग भी मंदिर की सीढ़ियों पर हुई. वहीं एमजी शशिभूषण का कहना है कि प्रवेश की अनुमति सिर्फ सीढ़ियों तक थी. सारी परिस्थितियों में यह तय है कि प्रतिबंध का जो
स्वरूप आज है वो इतिहास में इस तरह से नहीं था.

1950 में सबरीमाला में आग लगी थी, जिसमें इस मंदिर को बुरी तरह नुकसान पहुंचा. इसी साल यह मंदिर त्राणवणकोर देवस्वम बोर्ड का हिस्सा बना. त्रावणकोर बोर्ड त्रावणकोर राजघराने के अंदर आने वाले मंदिरों का प्रबंधन देखता है. त्रावणकोर राजपरिवार और मंदिर 18वीं-19वीं शताब्दी में अपने जातिवादि और महिला विरोधी नियमों के लिए विवादित रहे हैं.

सबरीमाला के ऑनलाइन पोर्टल पर 3 लाख श्रद्धालु रजिस्टर्ड, 539 महिलाएं भी शामिल

त्रावणकोर में कथित नीची जाति की महिलाओं से मुलक्करम (स्तन-टैक्स) वसूलने का कुख्यात इतिहास रहा है. इसके अलावा बड़े परिवारों की 'कुलीन' महिलाओं को मंदिरों में प्रवेश के लिए कमर से ऊपर के कपड़े उतारने पड़ते थे, जिससे बचने के लिए टैक्स देना पड़ता था.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज