'मैं कैसे वहां वोट डाल सकता हूं जहां मेरे बेटे की हत्या हुई थी'

'मैं कैसे वहां वोट डाल सकता हूं जहां मेरे बेटे की हत्या हुई थी'
मोहम्मद अमीन, मारे गए युवक अकील अहमद के पिता

श्रीनगर में वोटिंग के कुछ ही घंटे बचे हैं, ऐसे में मोहम्मद अमीन उस दिन को याद करते हैं जब दो साल पहले उपचुनाव वाले दिन उनके बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 17, 2019, 6:00 PM IST
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(आकाश हसन)

श्रीनगर में वोटिंग के कुछ ही घंटे बचे हैं. ऐसे में मोहम्मद अमीन उस दिन को याद करते हैं जब दो साल पहले उनके बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. बसंत का मौसम था और उस दिन भी कश्मीर में चुनाव हो रहे थे. चारों ओर हरियाली छाई हुई थी.

अमीन, श्रीनगर से 45 किलोमीटर दूर पश्चिम में बसे चुरमाजरू में रहते हैं. ये अखरोट, सेब और चमकते सरसों के खेतों से घिरा छोटा सा इलाका है. यहां ज्यादातर लोग खेती करते हैं. दो साल पहले 9 अप्रैल को इस गांव में हुए उपचुनावों में काफी खून बहा था.



चुरमाजरू गांव, कश्मीर

अमीन का बेटा अकील अहमद गांव में अपने चातुर्य और हाजिरजवाबी के लिए जाना जाता था. वो बिजली के तारों से लेकर पानी के पाइप और कई तरह के गैजेट्स ठीक कर लेता था. उस सुबह भी वो अपने इलाके की मस्जिद में लगे लाउडस्पीकर को ठीक कर रहा था.

गांव में एक छोटे से किराने की दुकान चलाने वाले अमीन कहते हैं, 'एक घंटे बाद जब वो घर लौटा तो उसकी मां ने उससे पास के गांव से कुछ दवाइयां लाने के लिए कहा. उन्हें दिल की बीमारी है.' अकील अपनी मां के लिए दवाइयां ले आया, लेकिन घर लौटने के दौरान वो कुछ लड़कों के साथ जा मिला जो उसके स्कूल पर पत्थर फेंक रहे थे. दरअसल ये स्कूल उपचुनाव के  दौरान पोलिंग बूथ में तब्दील हो गया था. अमीन अपनी दुकान पर थे जब उन्हें गोली चलने की आवाज़ सुनाई दी. इसके तुरंत बाद स्थानीय लोग ये बताने के लिए उनकी दुकान पर पहुंचे कि उनके बेटे को गोली मार दी गई है.

लड़कों पर सुरक्षाबलों की तरफ से चली गोलियों में अकील के चेहरे पर गोली लगी थी. पोलिंग बूथ के अंदर लगे कैमरे में कुछ तस्वीरें कैद हो गईं. बाद में एक वीडियो सामने आया जिसमें देखा गया कि उस दिन अर्धसैनिक बल के जवानों ने जब पत्थरबाज़ों पर गोलियां चलाईं तो एक लड़का गिर गया.

केवल सात फीसदी ही मतदान हुआ था

वैसे उस दिन वो इकलौता नागरिक नहीं था जो मारा गया था. आठ युवक मारे गए थे और पूरे इलाके में झड़प शुरू हो गई थी. मतदान कर्मियों को ले जा रही बसों को फूंक डाला गया था और कुछ मतदान केंद्रों को काफी क्षति पहुंचाई गई थी. उस दिन केवल सात फीसदी ही मतदान हुआ था.

अमीन कहते हैं कि उनके बेटे की मौत के बाद कोई उनसे मिलने नहीं पहुंचा या मदद के लिए नहीं आया. वो कहते हैं, 'मुझे पैसा या मुआवज़ा नहीं चाहिए, लेकिन मुझे न्याय चाहिए. मतदान केंद्र के अंदर मौजूद  सशस्त्र बल के 18 जवानों पर छह लड़के पत्थर फेंक रहे थे. आंसू गैस के गोले या दूसरे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता था. लेकिन मेरा बेटा मार डाला गया, ये नृशंस हत्या है.'

इन चुनावों में किसी राजनीतिक कार्यकर्ता या नेता ने इस गांव में आकर वोट नहीं मांगे. यहां कोई रैली नहीं हुई. लेकिन ये घटना अब भी गांव वालों के मन से निकली नहीं है.

'इन चुनावों ने हमारे खून बहाए'

शोक में डूबे अकील अहमद के पिता कहते हैं, 'इन चुनावों ने हमारे खून बहाए. मेरी अंतरात्मा मुझे उसी मतदान केंद्र में नहीं जाने देगी जहां मेरे बेटे की हत्या हुई थी.' वो कहते हैं, 'उस चुनाव में लोगों ने जिस सांसद को चुना था वो भी हमसे मिलने नहीं आए.'

अमीन के आंगन में अभी भी कपड़े से ढकी एक मोटर साइकिल खड़ी है. वो कहते हैं, 'अकील ने बतौर मजदूर जो पैसे कमाए थे उसी से पैसे बचाकर उसने अपनी हत्या के कुछ ही दिन पहले ये सेकेंड हैंड बाइक खरीदी थी. तब से किसी ने उसे छुआ नहीं है.'

24 वर्षीय निसार अहमद मीर भी उसी दिन मतदान केंद्र के पास मारा गया

करीब 10 किलोमीटर दूर रतसुना गांव का 24 वर्षीय निसार अहमद मीर भी उसी दिन मतदान केंद्र के पास मारा गया था. मीर के पिता, एक हस्तशिल्प कारीगर मोहम्मद अशरफ का कहना है कि उनका बेटा पत्थरबाजी या ऐसे कोई भी कार्य में शामिल नहीं था जिससे चुनावों में बाधा पहुंचे.

गांव वालों का दावा है कि सुरक्षाबलों से भरे दो वाहन गांव से गुज़रते हुए जब मतदान केंद्र पहुंचे तो उन्होंने लड़कों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

निसार अहमद मीर के पिता और भाई


मीर के साथ ही उस दिन दौड़े आदिल अहमद बताते हैं, 'चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था और लोग दौड़ने लगे, लेकिन वो गोलियां चलाते रहे. जान बचाकर भागने वाले मीर के सिर पर गोली लगी.'

किसी नेता ने सुध नहीं ली

चुरमाजरू की तरह ही इस हादसे के बाद किसी भी नेता ने रतसुना का दौरा नहीं किया. गांव वालों का दावा है कि सुरक्षाबलों ने बिना किसी भड़कावे के ही गोलियां चलाई थीं.

हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद श्रीनगर उपचुनाव कश्मीर में पहला चुनाव था. वानी को 8 जुलाई 2016 में मारा गया था जिसके बाद घाटी में अराजकता का माहौल पैदा हो गया था. चार महीनों से ज्यादा वक्त तक कर्फ्यू रहा और मोबाइल तथा इंटरनेट सेवाएं ठप रहीं.

पिछले चुनाव में आम नागरिकों के मारे जाने का मामला इस निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए एक बड़ा मुद्दा है जिसका असर इस बार मतदान पर पड़ सकता है. 2014 के लोकसभा चुनावों में इस निर्वाचन क्षेत्र में 25 फीसदी वोटिंग रिकॉर्ड की गई थी जिसमें पीडीपी उम्मीदवार तारिक हमीद कर्रा जीते थे. इससे पहले 2009 के चुनावों में कमोबेश इतना ही मतदान दर्ज़ हुआ था.
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