रेप से बचाने को चाचा ने मां और बहन को मार दिया, 1947 के कबायली हमले में बचे शख्स ने बताई भयावहता

80 साल के सच्चन सिंह को 1947 में हुए उस हमले का एक-एक मंजर याद है
80 साल के सच्चन सिंह को 1947 में हुए उस हमले का एक-एक मंजर याद है

सच्चन सिंह और कई अन्य लोगों के इस खौफनाक मंजर को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर कन्वेंशन सेंटर में "22 अक्टूबर, 1947 की यादें' पर दो दिवसीय संगोष्ठी में दुनिया के साथ साझा किया जाएगा.

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  • Last Updated: October 21, 2020, 8:00 PM IST
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(अरुणिमा)

नई दिल्ली. 22 अक्टूबर, 1947 यानि देश की आजादी के दो महीने बाद उस वक्त के अविभाजित जम्मू-कश्मीर (Undivided Jammu-Kashmir) के मुजफ्फराबाद जिले के कोटली गांव में पाकिस्तान (Pakistan) समर्थित उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत (North West Frontier Province) से कबायलियों (Tribal Militia) ने जोरदार हमला किया था. इस हमले में स्थानीय निवासी सच्चन सिंह (Sachchan Singh) अपने परिवार को अपनी आंखों के सामने खोया था. हमले में वह भाग्यवश बच निकले. सच्चन और उनकी दादी उम्र भर उस काले दिन को नहीं भूल सकते. उनकी दादी अब इस दुनिया से अलविदा कह चुकी हैं. उस वक्त सच्चन सिंह की उम्र केवल सात वर्ष थी. आज सच्चन सिंह 80 साल के हैं. वह अब कई दशकों से जम्मू की नानकनगर कॉलोनी में रह रहे हैं. बता दें कि श्रीनगर में '22 अक्टूबर, 1947 की यादें' पर दो दिवसीय संगोष्ठी में दुनिया के साथ इस घटना को साझा किया जाएगा. आइए सच्चन सिंह से जानते हैं इस खौफनाक मंजर के बारे में.

गोली लगने से लहुलुहान हो गए थे सच्चन सिंह के चाचा
सच्चन सिंह ने उस मनहूस दिन को याद करते हुए न्यूज 18 को बताया. 'हमारा घर पहाड़ियों पर था. हमले के वक्त में मैं बाहर निकला और देखा कि शोर कहां से आ रहा है. हमारे घर के बाहर एक खुला मैदान था जहां मेरे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने, जो भी उनके पास हथियार थे, उनके साथ अपनी पॉजिशन ले ली थी. वे हमलावरों पर जवाबी गोलीबारी कर रहे थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा था इतने में अचानक मेरे अंकल गोली लगने से लहुलुहान हो गए.'
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मां-बहन पर चाचा ने ही चलाई गोली- सच्चन सिंह
बता दें कि हमले की एक रात पहले ही सच्चन की मां, बड़ा भाई और छोटी बहन श्रीनगर के लिए निकले थे. सच्चन सिंह किसी तरह से वहां से अपनी जान बचा कर निकल आए लेकिन उनकी मां और बहन इस हमले का शिकार हो गईं. सच्चन सिंह ने बताया कि उनके चाचा को उनकी मां और बहन को पाकिस्तान समर्थित हमलावरों द्वारा बलात्कार करने और दर्दनाक मौत से बचाने के लिए मजबूरन गोली चलानी पड़ी.

मुझे कमर पर लादकर हमलावरों से बचकर दौड़ रही थी दादी- सच्चन
सच्चन ने इस खौफनाक मंजर पर आगे बताते हैं कि 'हमले में मेरे पैर में गोली लगने से मैं घायल हो गया था, दादी ने अपना दुपट्टा फाड़कर मेरे घाव पर बांधा और मुझे कमर पर लादकर अपने गांव की ओर चल दी. हम कैसे न कैसे झेलम पुल तक पहुंचे, वहां दूसरी तरफ सड़क पर बस इंतजार में खड़ी थी लेकिन हमलावर हमारा पीछा कर रहे थे और जैसे ही हम पुल पार कर रहे थे कि उस पार खड़े लोगों ने हमलावरों को आते देख रस्सी के पुल को काटना शुरू कर दिया. लेकिन मेरी दादी ने हार नहीं मानी, वह मुझे कमर पर लादकर तेजी से दौड़ती रही और कुछ ही क्षणों में दादी ने पुल को पार कर मेरी और अपनी जान बचाई.'

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सरकार की मदद नाकाफी
सिंह ने कहा, 'हमने इस डरावने और दर्दनाक मंजर में अपना सब कुछ खो दिया है. लेकिन इस दर्द से उबरने के बदले में सरकार ने शिक्षा, नौकरी और संपत्ति की पर्याप्त क्षतिपूर्ति नहीं की. सहायता के रूप में प्रति परिवार 30 लाख रुपये की सिफारिश की गई थी, लेकिन हमें केवल 5 लाख रुपये ही मिले थे.'

बता दें कि सच्चन सिंह और कई अन्य लोगों के इस खौफनाक मंजर को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर कन्वेंशन सेंटर में "22 अक्टूबर, 1947 की यादें' पर दो दिवसीय संगोष्ठी में दुनिया के साथ साझा किया जाएगा.
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