राहुल गांधी का अध्यक्ष पद छोड़ना कहीं सोचा-समझा गेम प्लान तो नहीं?

कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने के बावजूद विरोधी राहुल गांधी को अब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी समझते हैं. भले ही उन्हीं की पार्टी के लोग यह न समझ पा रहे हों कि असल में पार्टी में राहुल की हैसियत क्या है.

News18Hindi
Updated: August 29, 2019, 8:35 PM IST
राहुल गांधी का अध्यक्ष पद छोड़ना कहीं सोचा-समझा गेम प्लान तो नहीं?
राहुल गांधी
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Updated: August 29, 2019, 8:35 PM IST
(पथीकृत सेनगुप्ता)

जब राहुल गांधी बोलते हैं तो दुनिया सुनती है. और जब वह ट्वीट करते हैं तो लोग सहमत हों या न हों, दुनिया उसे रीट्वीट करती है. अगर इसका उदाहरण देखना हो तो उनका ताजा वायरल ट्वीट देखना चाहिए, जिसमें उन्होंने कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी नेताओं के बयान पर स्पष्टीकरण दिया है. उन्हें यह स्पष्टीकरण तब देना पड़ा, जब भारतीय जनता पार्टी के नेता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के बयान का दोष उनके सिर मढ़ना चाह रहे थे.

लेकिन क्यों? राहुल गांधी को लेकर इस तरह की जिद क्यों है? उन्हें महज एक कांग्रेस का सांसद क्यों नहीं मान लिया जाता.  या फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों बुरी तरह पराजित होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ना महज एक छलावा तो नहीं था? उनकी मां सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाल ली. तब यह कहा गया कि यह फौरी अरेंजमेंट है. इसके पहले 25 मई को राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से 10 अगस्त तक कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर अनिश्चितता बनी रही. सवाल यह है कि अगर सोनिया गांधी 'अंतरिम अध्यक्ष' हैं तो किसके लिए. क्या पार्टी यह सोच रही है कि माकूल वक्त पर राहुल गांधी को फिर वापस लाया जाएगा? या फिर पार्टी राहुल की बहन प्रियंका गांधी को इस कुर्सी पर लाना चाहती है. लेकिन इसके बीच में राजनीतिक माहौल की थाह ले रही है.


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कई हफ्ते तक देश ऊहापोह में बना रहा कि कांग्रेस के मन में आखिर क्या चल रहा है. क्योंकि एक के बाद एक कांग्रेसी नेता नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के युवराज से पद पर बने रहने की अपील कर रहे थे. इनमें से ज्यादातर नेता मानते थे कि पार्टी को एक बनाए रखने के लिए उन जैसा कोई व्यक्तित्व चाहिए. हालांकि इसके बावजूद राहुल लगातार मना करते रहे. यही नहीं, राहुल गांधी ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से यह भी कहा कि पार्टी का अगला अध्यक्ष पार्टी के बाहर से होना चाहिए. लेकिन उसके कुछ दिन बाद ही सोनिया गांधी ने कमान संभाल ली.

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राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत के साथ राहुल गांधी


अगर राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्र के लोग उन्हें पार्टी का शीर्ष नेता मानें तो बात एकबारगी समझ भी आती है. लेकिन वो क्या वजह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता और मीडिया के कुछ हिस्से उन्हें अध्यक्ष की तरह ले रहे हैं. अब जैसे यह बात ही लीजिए कि जब विपक्ष के नेताओं का दल कश्मीर गया तो उसका नेतृत्व वायनाड के सांसद को सौंपा गया. वे अपने पारिवारिक गढ़ अमेठी से स्मृति ईरानी के हाथों लोकसभा चुनाव हार गए, उसके बावजूद मीडिया उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का असली राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है.

अब तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर का हालिया ट्वीट ही देख लीजिए. इसमें उन्होंने राहुल के लिए चीफ शब्द का इस्तेमाल किया और कश्मीर और पाकिस्तान पर राहुल के ट्वीट का समर्थन किया.

इस तरह की और भी मिसालें मिल जाएंगी. राजनीतिक पंडितों को कयास लगाने से कोई नहीं रोक सकता. राजनीतिक पंडित भले ही कहते रहें कि कांग्रेस अपने प्रथम परिवार को नेतृत्व दिए रहना चाहती है या फिर नए लोगों को मौका देना चाहती है, लेकिन अंत में यह फैसला तो खुद पार्टी ही करेगी. वे राहुल हों या चाहे कोई और, सच्चाई यह है कि देश को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है, जो सरकार से सवाल कर सके. बस, सवाल यह है कि क्या कांग्रेस यह काम कर पाएगी?

 

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First published: August 29, 2019, 12:18 PM IST
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