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OPINION: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने गुजरात में बनाया सकारात्मक राजनीति का नया प्रस्थान बिंदु

मंडाविया को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया जाता, तो साफ़ संकेत यही जाता कि गुजरात में बीजेपी के लिए सब कुछ ठीक नहीं है.  (फाइल फोटो)

मंडाविया को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया जाता, तो साफ़ संकेत यही जाता कि गुजरात में बीजेपी के लिए सब कुछ ठीक नहीं है. (फाइल फोटो)

गुजरात में इतने बड़े स्तर पर बदलाव कर दिया गया, लेकिन असंतोष का कोई स्वर नहीं उभरा या कम से कम मीडिया के सामने मुखर नहीं हुआ. बदलाव की फुसफुसाहट तक सुनाई नहीं दी. अचानक विजय रूपाणी का इस्तीफ़ा हो गया, उन्होंने पार्टी का सच्चा सिपाही होने की दुहाई दी.

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नई दिल्ली: बनी-बनाई लीक तोड़ कर नई लकीर खींचने के लिए प्रबल इच्छाशक्ति चाहिए, अधिक साहस चाहिए. बाद में उस नई लकीर को उत्तरोत्तर बड़ी बनाने के लिए सटीक रणनीति चाहिए. इस लिहाज़ से देखें, तो भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात (Gujarat) में मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल बदलकर अपनी प्रबल इच्छाशक्ति और साहसी निर्णय ले पाने की मनोवृत्ति का परिचय तो फिर से दे ही दिया है, साथ ही यह भी जता दिया है कि पुख़्ता रणनीति बनाने में भी उसका कोई सानी नहीं है.

एक बात और पूरी तरह स्पष्ट है कि मामला चाहे असम में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने का हो या फिर उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री बदलने का या फिर कर्नाटक में अपेक्षाकृत कम उम्र के नेता को सीएम की कुर्सी पर बैठाने का, भारतीय जनता पार्टी न केवल वर्तमान को लेकर सतर्क रहती है, बल्कि भविष्य को लेकर भी पूरी तरह चौकन्नी रहती है. यदि गुजरात की बात करें, तो बीजेपी ने जो अभूतपूर्व निर्णय लिया है, उससे साफ़ है कि केंद्रीय संगठन यानी जेपी नड्डा और केंद्रीय सत्ता यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बीच पूरी तरह से तालमेल है. यही स्थिति बीजेपी को कांग्रेस समेत सभी दूसरी पार्टियों से नितांत मौलिक अंदाज़ में अलग करती है.

बदलाव के बाद भी नहीं कोई असंतोष
गुजरात में इतने बड़े स्तर पर बदलाव कर दिया गया, लेकिन असंतोष का कोई स्वर नहीं उभरा या कम से कम मीडिया के सामने मुखर नहीं हुआ. बदलाव की फुसफुसाहट तक सुनाई नहीं दी. अचानक विजय रूपाणी का इस्तीफ़ा हो गया, उन्होंने पार्टी का सच्चा सिपाही होने की दुहाई दी. मीडिया में उत्तराधिकारियों के कुछ नाम उछले, लेकिन कोई क़यास सही साबित नहीं हुआ. तमाम टीवी न्यूज़ चैनलों ने हाल ही में केंद्र में स्वास्थ्य मंत्री बनाए गए मनसुख मंडाविया का नाम भी ज़ोर-शोर से उछाल कर गुजरात के मामले में बीजेपी के बैकफुट पर होने का या फिर अपनी राजनैतिक सोच के दिवालिएपन का संकेत दिया.

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मंडाविया को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया जाता, तो साफ़ संकेत यही जाता कि गुजरात में बीजेपी के लिए सब कुछ ठीक नहीं है. ऐसा नहीं होता, तो हाल ही में गुजरात से केंद्र में लाए गए मंडाविया को वापस गुजरात मजबूरी में भेजना क्यों पड़ता. तमाम राजनैतिक अटकलों के उलट अंतत: भूपेंद्र पटेल के सिर पर सीएम का ताज पहनाने का निर्णय हो गया. इसके साथ ही बीजेपी ने साफ़ कर दिया कि न केवल गुजरात में सब कुछ ठीक है, बल्कि उसके पास मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने या फिर किसी और स्तर पर ज़िम्मेदारी संभालने के लिए बहुत से सक्षम और समर्पित नेता हैं.

शुभचिंतकों के मन में होगी टीस
लेकिन यह भी स्वाभाविक है कि जिसकी कुर्सी जाती है, उसके मन में, उसके शुभचिंतकों के मन में टीस होती ही होगी. लेकिन बीजेपी के अंदर अनुशासन इतना है कि कुर्सी से उतरे नेता हाय-तौबा नहीं मचाते. असंतोष की भावना प्राकृतिक है, मानवीय स्वभाव में होती ही है, लेकिन बीजेपी कार्यकर्ता अक्सर उसे प्रकट नहीं करते, तो इसका एक मुख्य कारण है उन्हें लगातार मिलने वाला प्रशिक्षण. असम हो, उत्तराखंड हो या कर्नाटक हो, सभी राज्यों में बीजेपी में अंदरूनी शक्ति हस्तांतरण या सत्ता परिवर्तन पूरी सहजता से हुआ.

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भारतीय जनता पार्टी ने जो प्रयोग गुजरात में किया है, उसे लेकर कांग्रेस समेत सभी राजनैतिक पार्टियों ने उसे घेरने की कोशिश की है. लेकिन इस तरह की कोशिशें खिसियानी बिल्ली के खंभा नोंचने जैसे प्रयास ही कहे जाएंगे. कोई भी राजनैतिक दल चुनाव लड़ने, अपने उम्मीदवारों को जिताने और आख़िरकार सत्ता पाने के उद्देश्य से ही बनाया जाता है. पांच साल का कार्यकाल लंबा होता है. ऐसे में जब अचानक वैश्विक स्तर पर कोविड-19 जैसी अभूतपूर्व बीमारी से मुठभेड़ करनी पड़ जाए, तो पूरी ईमानदारी से काम करने के बावजूद अलोकप्रिय होने का ख़तरा पैदा हो ही सकता है. संकट काल में निशाने पर सत्ता पक्ष ही होता है, विपक्ष नहीं. विपक्ष तो सरकार का सहयोग करने की बजाए उस पर निशाना साधने में ही लगा होता है. ऐसे में अगले चुनाव से कुछ पहले सत्तारूढ़ पार्टी अपनी सरकार का पूरा चेहरा बदलने का निर्णय लेती है, तो इसे साहसी निर्णय ही कहना चाहिए.
गुजरात में एंटी इनकमबेंसी की आशंका

गुजरात में चुनाव 2022 के आख़िर में होने हैं. भारतीय जनता पार्टी वहां ढाई दशक से अधिक समय से राज कर रही है, इस नाते एंटी इंकमबेंसी यानी सत्ता विरोधी प्रबल लहर की स्वाभाविक आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. आमतौर पर किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन को पहले ही कार्यकाल के बाद होने वाले चुनाव में इनकमबेंसी फ़ैक्टर झेलना पड़ता है, क्योंकि पांच साल में आप अपने सभी वोटरों की उम्मीदों पर शत-प्रतिशत खरे नहीं उतर सकते. गुजरात में तो बीजेपी लंबे समय से सत्ता में है, तो अगले चुनाव में उसे विपक्ष को वॉक-ओवर क्यों दे देना चाहिए?

अगला या कहें कि हर चुनाव जीतने के लिए बीजेपी को पूरी शक्ति झोंकनी होगी और इस लिहाज़ से कोई भी लॉजिकल पॉज़िटिव एक्सपेरीमेंट उसे या किसी भी राजनैतिक पार्टी को करना ही चाहिए. इसमें आलोचना योग्य तर्क क्या है? पिछले दिनों गुजरात में निकाय चुनावों में भी बीजेपी ने नए चेहरे आगे करने की रणनीति अपनाई थी. जो नतीजे उसे हासिल हुए, उन्हें देखते हुए भी राज्य सरकार के चेहरे में आमूल-चूल परिवर्तन के निर्णय की रूपरेखा तब से ही बन रही थी. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि विजय रूपाणी सरकार को हटाने का निर्णय बीजेपी ने आनन-फानन में लिया. इसकी भनक रूपाणी को भी रही होगी, बल्कि हो सकता है कि उन्हें बहुत पहले ही पार्टी के फ़ैसले की जानकारी दे दी गई हो.

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गुजरात का प्रयोग नई राह बनाने वाला
बहरहाल…. बीजेपी का 2021 गुजरात प्रयोग देश में भविष्य की राजनीति की नई राह बनाने वाला प्रयोग साबित हो सकता है. ज़ाहिर है कि बीजेपी अपनी राजनैतिक प्रयोगशाला में तैयार किए गए फ़ॉर्मूले पर आगे भी अमल करेगी. दूसरी पार्टियों को भी इस दृष्टि से सोचने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार की अंतर्कलह कुछ यही संकेत दे रही है. वहां ढाई-ढाई साल के दो मुख्यमंत्रियों वाला फ़ॉर्मूला दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के आंगन में उलझा ही पड़ा है. पंजाब में कांग्रेस अहंकारों के बेहद उलझे हुए समीकरण को फ़ौरी तौर पर भले ही सुलझा लेने के भ्रम में हो, लेकिन असल वस्तुस्थिति तो चुनाव के दौरान और उसके बाद सामने आएगी.

इसमें कोई बुराई नहीं है कि अगर कोई मुख्यमंत्री जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा है, जनता शिकायतें कर रही है, तो उसे बदल दिया जाए. इसे किसी पार्टी की कमज़ोरी नहीं, बल्कि रणनैतिक ताक़त माना जाना चाहिए. बहरहाल, अब यह तय है कि बीजेपी का प्रयोग 2021 दूसरे राज्यों में भी कई स्तरों पर अंगीकार किया जाएगा. संभव है कि सिर्फ़ पांच साल की सत्ता के बाद ही एंटी इनकमबेंसी को निष्प्रभावी बनाने के लिए अब कम से कम बीजेपी साफ़-सुथरी छवि वाले बिल्कुल नए उम्मीदवार मैदान में उतारने का प्रयोग सभी राज्यों में बड़े पैमाने पर शुरू करे. ऐसा हुआ, तो बहुत से ऊर्जावान युवाओं को राजनीति में आगे बढ़ने के अवसर मिलने लगेंगे और यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए नए सिरे से जीवनदायिनी साबित होगी.

कांग्रेस ने धारणा बदलने की कोशिश की
प्रसंगवश यह भी जान लें कि पंजाब में कांग्रेस ने पहली बार सीएम पद पर किसी दलित को बैठाने का निर्णय कर अपने पक्ष में नया विमर्श दोबारा खड़ा करने का प्रयास किया है. लेकिन इस विमर्श से उसे कोई फ़ायदा इसलिए नहीं मिलने वाला, क्योंकि पंजाब में उसके अंदरूनी झगड़े की प्रवृत्ति आख़िरी तौर पर विखंडनकारी ही साबित होती नज़र आ रही है. वैसे लगता तो नहीं, लेकिन कांग्रेस अगर पंजाब का किला फिर से फ़तह करती है, तो भी कांग्रेस वहां से वंचित वर्ग की हितैषी पार्टी होने का संदेश देश भर में नहीं दे पाएगी. जिस तरह मनमोहन सिंह ‘एक्सीडेंटल पीएम’ थे, उसी तरह चरणजीत चन्नी ‘एक्सीडेंटल सीएम’ हैं, यह बात राजनैतिक चेतना से भरपूर लोग अच्छी तरह समझते हैं.

प्रबुद्ध लोग अच्छी तरह समझते हैं कि गुजरात में बीजेपी सरकार में आमूल-चूल बदलाव और पंजाब में कांग्रेस सरकार में हुए बदलाव में मौलिक अंतर है. दोनों घटनाओं की कोई तुलना नहीं की जा सकती. एक दौर था, जब देश भर में कांग्रेस का ही दबदबा था, तब हम जानते हैं कि पार्टी का जो भी मुख्यमंत्री राजनैतिक तौर पर शक्तिशाली होता दिखता था, उसे बदल दिया जाता था. कांग्रेस आई के इकलौते नेतृत्व को किसी दूसरे का राजनैतिक क़द बढ़ना अच्छा नहीं लगता था. उस दौर में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों को केंद्रीय नेतृत्व की चप्पलें ढोते तक देखा गया था.

कांग्रेस को बड़े पैमाने पर चिंतन की जरूरत
भविष्य की राजनीति की बात करें, तो कांग्रेस को बड़े पैमाने पर चिंतन की आवश्यकता है. तभी उसका वजूद बचा रह सकता है. आज की स्थिति में कांग्रेस विभिन्न कारणों से वैसे ही बहुत कमज़ोर है. पंजाब में जो चल रहा है, सबके सामने है.

वर्ष 2023 में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकारों में शामिल नेता आपस में ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. किसी समूह या समुच्चय के बीच आपसी या अंदरूनी लड़ाई उसे कमज़ोर ही करती है, यह कहने के लिए किसी बड़ी दलील की ज़रूरत नहीं है. वर्ष 2019 में जून-जुलाई में अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफ़े के बाद से कांग्रेस पूर्णकालिक अध्यक्ष तक नियुक्त नहीं कर पा रही है. ऐसे में अगर कांग्रेस सिर्फ़ मोदी-विरोध के उड़न खटोले पर सवार होकर ही आगे बढ़ना चाहती है, तो निकट भविष्य में तो उसे मंज़िल मिलती दिखाई नहीं देती.

हर स्तर पर है बीजेपी का नियंत्रण
भारतीय जनता पार्टी की बात करें, तो स्पष्ट है कि वह कड़े निर्णय इसलिए ही कर पा रही है, क्योंकि नेतृत्व का पूरा नियंत्रण पार्टी पर बिल्कुल नीचे तक है. कांग्रेस ज़रूरी फ़ैसले नहीं कर पा रही है, तो साफ़ है कि उसका केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल शक्ति विहीन है. कांग्रेस को ख़ुद मज़बूत होना पड़ेगा. बीजेपी और दूसरे अवरोधों के ख़िलाफ़ सिर्फ़ और सिर्फ़ दुष्प्रचार अभियान चलाकर ही बात नहीं बनेगी. लोग सही तथ्यों और आभासी या हवा-हवाई बातों में फ़र्क़ अच्छी तरह समझने लगे हैं. लोकतंत्र में हर पार्टी अपना तंत्र तभी मज़बूत कर पाएगी, जब वह लोक पर पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ ध्यान देगी.

बड़े और कड़े फ़ैसले तभी लिए जा सकते हैं, जब वैसा करने लायक पर्याप्त शक्ति हो. लोकतंत्र में शक्ति तभी मिलती है, जब जनता साथ दे. जनता साथ तभी देती है, जब उसे अपने और राष्ट्र के हितों के अनुरूप काम होने का भरोसा हो. भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अगर संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए को निष्प्रभावी बना पाई, तो यह काम देश के नागरिकों से मिली शक्ति और भरोसे के आधार पर ही हो पाया. तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने जैसे बहुत से अभूतपूर्व निर्णय मोदी सरकार कर पाई, तो यह सकारात्मक जनाधार के कारण ही संभव हो पाया.

स्पष्ट है कि जो पार्टी देश हित में कड़े निर्णय करने का माद्दा रखती है, वह पार्टी संगठन हित में भी बड़े निर्णय कर सकती है. यही साबित करते हुए गुजरात में चुनाव से क़रीब एक साल पहले पूरी सरकार का चेहरा बदल कर बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में नई राजनीति का एक और चुनौतीपूर्ण प्रस्थान बिंदु निर्धारित कर दिया है. ( डिसक्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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