अपना शहर चुनें

States

दुर्भाग्य: 1973 में देश के लिए जान गवांने वाले बहादुर जवान को 47 साल बाद BSF ने दिया शहीद का दर्जा

1993 में बलिदान देने वाले जवान को बीएसएफ ने 47 साल बाद शहीद माना है.
1993 में बलिदान देने वाले जवान को बीएसएफ ने 47 साल बाद शहीद माना है.

साल 1973 में भारत-पाकिस्तान (India-Pakistan) की रेतीली सरहद पर देश के लिए शहादत (Martyrdom) देने वाले जवान को बीएसएफ (BSF) ने 47 साल बाद शहीद माना है. बीएसएफ ने शहीद के परिजनों को ऑपरेशनल कैज्यूल्टी प्रमाण पत्र दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 21, 2020, 8:09 PM IST
  • Share this:
बाड़मेर. साल 1973 में भारत-पाकिस्तान (India-Pakistan) की रेतीली सरहद पर देश की सीमा की रक्षा करते हुए अपनी जान न्यौछावर करने वाले जवान को 47 वर्ष बाद शहीद (martyr) का दर्जा मिला है. सीमा सुरक्षा बल (BSF) के इस जवान के परिवार को यह गौरव बीएसएफ ने जारी किया है. बीएसएफ ने इस जवान के परिवार को हाल ही में ऑपरेशनल कैज्यूल्टी प्रमाण पत्र(Operational casualty certificate) जारी किया है. इस जवान ने सरहदी बाड़मेर में ड्यूटी के दौरान अदम्य साहस का परिचय दिया था. उसी बाड़मेर में शहीद के परिवार का सम्मान किया गया और इस जांबाज को बाड़मेर के शहीदों की सूची में शामिल किया गया है.

बीएसएफ ने वर्ष 1973 में राजस्थान सेक्टर में सीमा की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले अपने एक जवान के ऑपरेशनल कैज्यूल्टी प्रमाण पत्र 47 वर्ष पश्चात जारी किया है. बीएसएफ ने अब स्वीकार किया है कि जोधपुर के ओसियां तहसील के तापू गांव निवासी गोविन्द सिंह ने सरहदी बाड़मेर में देश के सीमा की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया है. गोविन्द सिंह के परिजन लंबे अरसे से प्रयासरत थे कि बीएसएफ यह स्वीकार करे कि उन्होंने देश की सीमा की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे हैं. अब बीएसएफ के डीजी राकेश अस्थाना ने स्वयं पत्र लिखकर गोविन्द सिंह की पत्नी अमान कंवर, पुत्र भंवर सिंह और उम्मेद सिंह को इस बारे में जानकारी दी है.

आपके लिये इसका मतलब: न्यू ईयर पर नहीं चला पायेंगे पटाखे, आप भी सावधानी बरतें



परिजनों को यह पत्र मिलते ही उनके चेहरे खिल उठे हैं. उन्हें इस बात का संतोष है कि उनके पति/पिता ने देश हित में अपने प्राणों का त्याग किया था, उसे अब कहीं जाकर सरकारी स्तर पर मान्यता मिली है. बाड़मेर में वीर गति को प्राप्त करने वाले गोविंद सिंह को बाड़मेर के शहीदों की सूची में शामिल किया है.
क्या है गोविंद सिंह के सहादत की कहानी
आरक्षक गोविन्द सिंह वर्ष 1957 में बीएसएफ में भर्ती हुए थे. वर्ष 1973 में वे राजस्थान सीमा पर तैनात थे. उस समय तक पाकिस्तान का बंटवारा हो चुका था. ऐसे में बांग्लादेश के कई लोग राजस्थान होकर पाकिस्तान जाने की फिराक में रहते थे. सीमा पर तब तक तारबंदी भी नहीं हुई थी. 20 मई 1973 को एक शरणार्थी परिवार के दस सदस्य अपने तीन मवेशी के साथ सीमा पर स्थित पिलर संख्या 920 के पास से पाकिस्तान सीमा में घुसने लगे. उस समय आरक्षक गोविन्द सिंह ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन वे जबरन पाकिस्तानी की सीमा में प्रवेश कर गए.

Rajasthan: इंजीनियरिंग कॉलेजों पर धड़ाधड़ लग रहे हैं ताले, ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं स्टूडेंट्स

पाकिस्तान में प्रवेश करने के बाद वहां के सुरक्षा बलों ने गोलियां दागनी शुरू कर दी. उस समय सीमा पर कोई ऐसा स्थान नहीं था कि जिसके पीछे पोजिशन लेकर जवाबी हमला किया जा सके. ऐसे में आरक्षक गोविन्द सिंह और अन्य आरक्षक अनजाने में पाकिस्तानी सीमा में दाखिल हो गए और एक स्थान पर पोजिशन ले जवाबी हमला बोल दिया.

पाकिस्तानी सेना ने धोखे से किया था हमला
गोलीबारी बंद होने के बाद पोस्ट कमांडर ने सभी आरक्षकों को वापस लौटने का आदेश दिया. वापस लौटते समय सभी जवान खुले में थे. उसी समय पाकिस्तान ने एक बार फिर से गोलीबारी शुरू कर दी. इस दौरान दो गोली लगने से गोविन्द सिंह वहीं पर वीर गति को प्राप्त हो गये थे.

देश की सीमा की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सेना के जवानों को ऑपरेशनल कैज्यूल्टी प्रमाण पत्र जारी किया जाता है, लेकिन बीएसएफ व अन्य अर्द्ध सैन्य बलों में यह प्रमाण पत्र देने की परम्परा नहीं रही है. अब इस परम्परा में बदलाव किया गया है. इस प्रमाण पत्र के आधार पर वीरगति को प्राप्त हुए जवान के परिजनों को कुछ विशेष सुविधाएं केन्द्र और राज्य सरकारों की तरफ से दी जाती हैं.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज