Delhi Violence : दुख की घड़ी में हिंदू-मुस्लिम नहीं, इंसानियत के साथ खड़ा है हर इंसान

Delhi Violence : दुख की घड़ी में हिंदू-मुस्लिम नहीं, इंसानियत के साथ खड़ा है हर इंसान
दिल्ली में कई जगहों पर हालात तनावपूर्ण हैं,

delhi violence: उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के नाम पर हुई हिंसा में अब तक 34 लोगों की मौत हो चुकी है. 200 से ज्यादा घायल बताए जा रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 27, 2020, 11:53 AM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से (North-east Delhi) के दो मोहल्लों जाफराबाद और मौजपुर के बीच की दूरी मुश्किल से एक किलोमीटर है, लेकिन इस फासले को तय करना फिलहाल भयावह है. यह वह इलाका है, जहां रविवार को पहले दौर में हिंसा भड़की थी. हिंसा का सिलसिला अगले तीन दिनों में आसपास के कम से कम सात इलाकों तक फैल गया. हालांकि, दुख की इस घड़ी में लोग हिंदू-मुस्लिम के साथ नहीं, बल्कि इंसानियत के साथ खड़े हैं.

दिलशाद गार्डन स्थित गुरु तेग बहादुर (जीटीबी) अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती मरीजों के बीच पांच से छह परिवार (जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों थे) मुर्दाघर के बाहर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं. इनमें राहुल सोलंकी का परिवार भी है. 26 साल के राहुल सोलंकी की हिंसा के दौरान उपद्रवी की गोली लगने से मौत हो गई. लाश लेने के लिए उनके परिवार के लोग मुर्दाघर के बाहर लगी बेंच के एक किनारे बैठे थे. उससे कुछ कदम की दूरी पर 64 वर्षीय सादरुद्दीन गुमसुम बैठे हुए थे, जिनके 32 साल के बेटे मोहम्मद फुरकान को हिंसा के दौरान कई चोटें आई हैं.

बुधवार को इन परिवारों के सदस्यों और उनके जैसे अन्य लोगों में असंतोष और बेचैनी की भावना पैदा हो गई थी, जो अपने प्रियजनों के शव लेने के लिए सोमवार शाम से इंतजार कर रहे थे. उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी से शुरू हुई इस हिंसा में घायल हुए अब तक 200 लोगों को जीटीबी अस्पताल लाया जा चुका है, इनमें से 25 को मृत घोषित कर दिया गया.



हालांकि, हिंसा में मारे गए किसी का भी बुधवार शाम तक पोस्टमार्टम नहीं हो पाया. जीटीबी अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट सुनील कुमार गौतम बताते हैं, 'पोस्टमार्टम में इसलिए देरी हो रही हैं, क्योंकि मेडिकल बोर्ड बनाने का अनुरोध पुलिस विभाग से नहीं मिला था. आज अधिकारियों की ओर से अनुरोध मिल गया है.' गौतम बताते हैं, 'अस्पताल में भर्ती 30-35 फीसदी केस गोली में घायल के हैं, जबकि 60 फीसदी मामले किसी हथियार से जख्मी और बाकी आग में झुलसने के हैं.'



बीते दो दिनों ने राहुल सोलंकी के परिवार के सदस्य मुर्दाघर के बाहर से नहीं हटे हैं. शाहबाज आलम (26) भी इनके साथ अपने दोस्त का शव लेने का इंतजार कर रहे हैं. राहुल का शव लेने के लिए उनकी एक और दोस्त श्वेता चौहान भी आई हैं. वह हिंसा को याद करते हुए सिहर उठती हैं और बताती हैं, 'ये हिंसा और ये पागलपन रुकना चाहिए. सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए अब तक कुछ नहीं कर पाई है. हालात इतने खराब हो गए हैं कि मैं अपने घर करावल नगर नहीं जा पा रही हूं.'


वहीं, मोहम्मद फुरकान के पिता सादरुद्दीन कहते हैं, 'मैं इस शहर में करीब 40 साल से रह रहा हूं. मैंने सिख दंगों को बड़े करीब से देखा है. मुझे याद है कि हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उस दौरान कई सिखों की जान बचाई थी. ऐसे वक्त में लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं. हालांकि, ये दुखद है कि मदद करने वालों की संख्या उपद्रवियों से कम ही होती है.'

बहरहाल, जीटीबी अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट सुनील कुमार गौतम ने News18 को बताया कि बुधवार शाम तक जीटीबी अस्पताल में कुल पांच पोस्टमार्टम हो चुके हैं. राहुल सोलंकी का शव उनके परिवार को सौंप दिया गया है. हालांकि, बाकी लोगों को अभी कितना इंतजार करना होगा, ये कहना मुश्किल है.

(रौनक कुमार गुंजन के इनपुट के साथ)

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