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मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने परिवार के उलट तलवार-ढाल-कवच के बजाय कलम-दवात-कागज को चुना

News18Hindi
Updated: December 27, 2019, 4:16 PM IST
मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने परिवार के उलट तलवार-ढाल-कवच के बजाय कलम-दवात-कागज को चुना
उर्दू के महान शायर मिर्जा ग़ालिब का 27 दिसंबर 1796 को आगरा में जन्‍म हुआ था.

उर्दू और फारसी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) का जन्‍म 27 दिसंबर 1796 (जन्‍म के साल को लेकर स्‍पष्‍टता नहीं है) को सैनिक पृष्‍ठभूमि वाले परिवार में हुआ था. बावजूद इसके उन्‍होंने सैनिक बनने के बजाय शायर (Poet) होना पसंद किया. फारसी को हिंदुस्‍तानी ज़बान में लोकप्रिय करने वाले ग़ालिब को उर्दू (Urdu) का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है.

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  • Last Updated: December 27, 2019, 4:16 PM IST
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अमृत चंद्र 

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना…

नई दिल्‍ली. मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां (Mirza Asad-Ullah Baig Khan) उर्फ ग़ालिब (Ghalib) ने इंसान के इंसान बने रहने की मुश्किल को अपने इस शेर से बाखूबी बयां किया है. उनका ये शेर आज के दौर में भी मौजू हैं. ग़ालिब के शेरों में जिंदगी का हर रंग देखने को मिलता है. जिंदगी का कोई जज्बात ऐसा नहीं जहां उनके शेर की पहुंच न हो. मिलने की खुशी हो या बिछड़ने का ग़म, उनकी शायरी ने इंसान के हर जज्‍बात को छुआ है. उर्दू और फारसी के महान शायर ग़ालिब का जन्‍म 27 दिसंबर 1796 (जन्‍म के साल को लेकर स्‍पष्‍टता नहीं है) को सैनिक पृष्‍ठभूमि वाले परिवार में हुआ था. ग़ालिब की पृष्ठभूमि एक तुर्क परिवार से थी. उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग खान मध्य एशिया के समरकंद से 1750 के आसपास अहमद शाह के शासन काल में भारत आए थे. उन्‍होंने दिल्ली, लाहौर और जयपुर में काम किया. आखिर में आगरा में बस गए. उनके दो बेटे मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग खान, मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग खान और तीन बेटियां थीं. ग़ालिब के पिता मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग ने इज़्ज़त-उत-निसा बेगम से निकाह किया और अपने ससुर के घर रहने लगे. उन्‍होंने पहले लखनऊ के नवाब और बाद में हैदराबाद के निज़ाम के यहां काम किया. अलवर में 1803 में एक युद्ध के दौरान उनकी मौत हो गई. उस समय ग़ालिब महज 5 साल के थे. फौजी परिवार के बाद भी ग़ालिब ने तलवार, ढाल और कवच की जगह कलम, दवात और कागज को चुना.



फारसी को हिंदुस्‍तानी ज़बान में लोकप्रिय करने वाले ग़ालिब को उर्दू का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है. ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के साथ ही हिंदुस्‍तान के दो टुकड़े हो गए और भारत-पकिस्तान में बंट गया, लेकिन ग़ालिब दोनों ही मुल्कों के बड़े शायर बनकर हमेशा जिंदा रहे. उनका विवाह 13 साल की उम्र में नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था. विवाह के बाद वह दिल्ली आ गए थे. मुग़लों की दिल्ली यानि शाहजहांनाबाद में ग़ालिब ने अपने जीवन के करीब 55 बरस बिताए. ग़ालिब का अधिकतर जीवन गली कासिम जान में बीता. दिल्ली के मौजूदा भूगोल के हिसाब से यह गली आज के चांदनी चौक से मुड़कर बल्लीमारान के भीतर जाने पर हकीम शरीफखां की मस्जिद के नजदीक है. ग़ालिब की हवेली को सरकार ने उनकी धरोहर के रूप में संजोकर रखा है. गुलज़ार ने उनके पते को अपनी शायरी में बखूबी बताया है...



बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियां
एक कुरआने सुखन का सफ्हा खुलता है
असद उल्लाह खाँ गालिब का पता मिलता है...

दिल्‍ली में मौजूद ग़ालिब की हवेली को सरकार ने उनकी धरोहर के तौर पर संरक्षित किया हुआ है.


ग़ालिब नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुगलकाल के आखिरी शासक बहादुर शाह जफर के दरबारी कवि भी रहे थे. शहंशाह बहादुर शाह जफर ने मिर्ज़ा ग़ालिब को 1850 में दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के खिताब से नवाज़ा. बाद में उन्‍हें मिर्ज़ा नोशा का खिताब भी मिला. वे शहंशाह के दरबार मे अहम दरबारियों में शुमार थे. नाम, शोहरत, रुतबा और इज्ज़त सब कुछ ग़ालिब के कदम चूम रहे थे. बाद के दौर में शराब और जुए की लत ने उनको ऐसा जकड़ा कि ताउम्र निजात न मिल सकी. जुए के चक्‍कर में एक बार उन्‍हें जेल भी जाना पड़ गया था. उन्‍हें हर वक्‍त तन्‍हा मौत का डर सताता रहता था. देश के पहले स्‍वतंत्रता संग्राम (1857) के बाद दिल्ली में हुई मारकाट के बारे में 1858 में अपने शागिर्द मुंशी हरगोपाल तफ्ता के नाम लिखी चिट्ठी में ग़ालिब ने ग़दर का हाल बयान किया. उन्‍होंने लिखा...

अंग्रेज की कौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से कत्ल हुए,
उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शागिर्द।
हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूंगा
तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।।

नई दिल्ली के अंग्रेजों की राजधानी बनने से पहले ही 15 फरवरी 1869 को इस महान शायर ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उर्दू शायरी के इस शायर की मज़ार दिल्ली में ही है. दिल्ली के निज़ामुद्दीन में ग़ालिब की मज़ार हजरत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह के पास ही है. ग़ालिब की सात औलादें हुईं, लेकिन कोई भी जीवित नहीं रह सकी. इस गम से उबरने के लिए उन्होंने शराब का दामन थाम लिया. उनकी शायरी में ये गम भी मिलता है. वहीं, एक किस्‍सा ऐसा भी है जब उन्‍होंने स्‍वाभिमान से समझौता नहीं किया. उन्हें दिल्ली के कॉलेज में फारसी पढ़ाने के लिए बुलवाया गया. वह पालकी में सवार होकर कॉलेज पहुंचे, लेकिन दरवाजे पर कोई उन्‍हें लेने नहीं आया. ग़ालिब अंदर नहीं गए और कहा कि साहब मेरे स्वागत के लिए बाहर नहीं आए, इसलिए मैं भी अंदर नहीं जाऊंगा. मैं ये नौकरी अपने खानदान की इज्ज़त बढ़ाने के लिए करना चाहता था न कि घटाने के लिए. उन्‍होंने लिखा...

था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता।
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।

कुछ इस तरह मै ने ज़िन्दगी को आसान कर लिया
किसी से मांग ली माफी किसी को माफ कर दिया।

दिल्ली के निज़ामुद्दीन में ग़ालिब की मज़ार हजरत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह के पास ही है.


 

ग़ालिब के चाचा ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में थे. उन्हीं की पेंशन से पूरे परिवार का गुजारा होता था. उस जमाने में पेंशन बहुत कम होती थी, सो बचपन किल्लत में शुरू क्या हुआ और ताउम्र बना ही रहा. ग़ालिब अपनी पूरी पेंशन शराब पर खर्च देते थे. कभी-कभी इंसान के सामने अभाव और संघर्ष की दीवार खड़ी हो जाती है. उस दीवार में जो दरार पैदा कर दे उसे ही ग़ालिब कहते हैं. उन्होंने दर्द को भी सुकून का लिबास पहनाकर जिंदगी को जिया. उनकी शायरी ने दिल की हर सतह को छुआ. उनकी शायरी ऐसी है कि वो दर्द को कम नहीं करती, बल्कि इतना बढ़ा देती है कि दर्द का अहसास ही खत्‍म हो जाता है. जिंदगी ने उनकी राह में हर कदम पर कांटे ही बिछाए, लेकिन ग़ालिब ने हर दर्द का जवाब अपनी शायरी से मुस्‍कराकर दिया. उन्‍होंने लिखा...

बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले
निकलना ख़ुल्द से आदम का, सुनते आए थे लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर, तेरे कूचे से हम निकले
मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़, जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं, जिस क़ाफ़िर पे दम निकले...

ग़ालिब अपनी पूरी पेंशन शराब पर खर्च देते थे.


ग़ालिब के बारे में कहा जाता है कि उन्‍हें आम खाने का बहुत शौक था. एक बार मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फर और उनके कुछ साथियों के साथ ग़ालिब बाग-ए-हयात बख्श व किला-ए-मुबारक (लाल किला) में टहल रहे थे. वहां अलग-अलग किस्म के आम के पेड़ थे, जो सिर्फ़ बादशाह, शहज़ादों के लिए थे. ग़ालिब चलते-चलते हर आम को बड़े ध्यान से देख रहे थे. इस पर बादशाह ने उनसे पूछा, 'आप हर आम को इतने गौर से क्यों देख रहे हैं?' ग़ालिब ने कहा, ' एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर उसे खाने वाले का नाम लिखा होता है. मैं अपने दादा, वालिद और अपना नाम इन आमों पर तलाश रहा हूं.' बादशाह मुस्कुराए और उन्होंने शाम तक मिर्ज़ा ग़ालिब के घर आम भिजवा दिए.

ऐसे ही एक बार वह अपने दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान के साथ अपने घर के बरामदे में बैठे थे. उनके दोस्त को आम बिलकुल पसंद नहीं थे. वहां से एक गधा-गाड़ी गुजरी. गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूंघा और अपना मुंह हटा लिया. हकीम साहब ने तुरंत ग़ालिब से कहा, 'देखो, गधा भी आम नहीं खाता!' इस पर ग़ालिब ने कहा, 'इसमें कोई शक नहीं कि गधे आम नहीं खाते!' शायद ग़ालिब को अहसास था कि उनकी मौत के बाद उनके बारे में क्‍या कहा जाएगा. उन्‍होंने लिखा...

हुई मुद्दत के 'ग़ालिब' मर गया, पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना, कि यूं होता तो क्या होता?

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First published: December 27, 2019, 3:12 PM IST
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