'क्या करते भूखे मरते': घर लौटे प्रवासियों ने बताई दर्द भरी दास्तां

'क्या करते भूखे मरते': घर लौटे प्रवासियों ने बताई दर्द भरी दास्तां
Image for representation. (Image: AP)

कोरोना वायरस (Coronavirus) की वजह से लागू लॉकडाउन (Lockdown In India) के चलते बड़े शहरों में काम करने वालों पर कहर टूट पड़ा रहा है.

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विवके त्रिवेदी
भोपाल. 
कोरोना वायरस (Coronavirus) की वजह से लागू लॉकडाउन (Lockdown In India) के चलते बड़े शहरों में काम करने वालों पर कहर टूट पड़ा रहा है. एक ओर जहां काम मिलना बंद हो गया तो वहीं बचत का पैसा भी खर्च होने लगा. इसके बाद सिर्फ एक ही रास्ता बचा और वह था घर वापसी का. कुछ ऐसा ही मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के पन्ना (Panna) की रहने वाली 45 वर्षीय श्याम बाई के साथ. 8 साल पहले अपने पति को खो चुकी श्यामबाई 18 साल के बेटे लोकेंद्र को साथ लेकर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) स्थित कानपुर (Kanpur) गईं ताकि वहां काम मिल सके. लॉकडाउन के बाद यहां उन्हें मजदूरी नहीं दी गई. ठेकेदार ने पांच लोगों के एक समूह के लिए 8,000 रुपये दिए, जिसमें वह और उनका बेटा भी शामिल था. 1600 रुपए के साथ माँ-बेटे ने तीन अन्य लोगों के साथ पैदल यात्रा शुरू की और एक ट्रक चालक से लिफ्ट ली, जिसने प्रत्येक से 350 रुपये लिए और उन्हें लगभग 200 किमी के बाद उतार दिया.

वे फिर से पैदल जाने लगे और बाद में एक पिक-अप वैन ने उन्हें लिफ्ट दी और बाद में सतना की एक बस ने उन्हें पन्ना पहुंचने में मदद की. जहां उनकी मेडिकल जांच की गई. उन्होंने बताया कि यात्रा के दौरान वे लगभग 140 किमी तक पैदल चले.

अपने पैतृक गांव में आने के बाद उन्हें 14 दिन ग्राम पंचायत भवन में क्वारंटीन में बिताने पड़े, जहां उन्हें भोजन नहीं दिया जाता था और उन्हें घर से भोजन करना पड़ता था. श्यामबाई ने News18 को फोन पर बताया 'क्या करे भुखे मरते? तो घर से खाना मंगा के खाते थे नहीं तो मर जाते.' महिला को लॉकडाउन के बीच घर वापस जाना पड़ा, क्योंकि उसने चार बच्चों को घर छोड़ दिया था.



उनकी वापसी पर उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिली और राशन कार्ड के माध्यम से मासिक रूप से दिए जाने वाले 35 किलोग्राम गेहूं पर ही घर चला. लोकेंद्र ने परिवार के लिए कुछ नकदी कमाने के लिए नौकरियां कीं क्योंकि उनकी मां ने दावा किया कि कानपुर में मिली 20,000 रुपये मजदूरी अभी तक उनके बैंक खातों में नहीं पहुंची है. श्यामबाई ने कहा 'कोई काम या मदद आसपास नहीं है. मुझे अंदाजा नहीं है कि भविष्य में क्या करेंगे.'



मजदूरी के 44,000 रुपये का इंतजार
यही चिंता निवाड़ी जिले के ग्राम गिदाखिनी के एक भूमिहीन मजदूर 63 वर्षीय जयराम अहिरवार की है, जो हरियाणा के सोनीपत से लॉकडाउन की वजह से लौटे. हरियाणा में एक कंस्ट्रक्शन वर्कर के तौर पर काम करने वाले बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, ' जो कमाया था वह सब खर्च हो गया क्योंकि हमें वापस आने के लिए गाड़ी का इंतजाम करना था.' उनका 10 लोगों का परिवार भारी आर्थिक तंगी में है क्योंकि अहिरवार और उनके दो बेटों के पास कोई काम नहीं है और कोई सरकारी सहायता नहीं होने के कारण, उन्हें स्थानीय दुकानदारों से उधार लेकर परिवार चलाना पड़ा. बूढ़े व्यक्ति को अपने ठेकेदार से मजदूरी के 44,000 रुपये का इंतजार है.

अहिरवार ने कहा, 'सरकारी सहायता के नाम पर, हमें डेढ़ महीने पहले 5 किलो गेहूं मिला, उन्होंने दावा किया कि उन्हें सरकार से मदद की जरूरत है. गाँव के लगभग 45 और लोग जो काम बाहर गये थे वे वापस आ गए हैं और इसी तरह की कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं.'

ऐसा ही कुछ स्थानीय मनीराम अहिरवार के साथ हुआ. पत्नी पूनम के साथ हरियाणा के कापसहेड़ा में काम करने वाले दंपति के पास सिर्फ 900 रुपए बचे थे. अभी उन्हें कॉन्ट्रैक्टर से 22,000 रुपए की मजदूरी का इंतजार है. दंपति को उम्मीद है कि बुवाई के समय उन्हें कुछ काम मिल जाए ताकि वह पांच लोगों के परिवार का भरण पोषण कर सकें.
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