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UP Elections 2022: अखिलेश-प्रियंका क्या यूपी विधानसभा चुनाव में झुका पाएंगे बीजेपी का बुलंद झंडा?

योगी आदित्यनाथ के खिलाफ विपक्ष की मुहिम
योगी आदित्यनाथ के खिलाफ विपक्ष की मुहिम

UP Assembly Election 2022: हाल के दिनों में प्रियंका गांधी ने राज्य में प्रवासी मजदूर, काननू व्यवस्था और खराब शासन का मुद्दा उठाया था, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखा. इसके अलावा साल 2020 में समाजवादी पार्टी भी गायब रही. जबकि बीएसपी का रुख बीजेपी के खिलाफ बेहद नरम रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 17, 2021, 11:56 AM IST
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(प्रांशु मिश्रा)

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2022) में अब सिर्फ एक साल का वक्त रह गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) को पूरी उम्मीद है कि बीजेपी एक बार फिर से सत्ता में लौटेगी. एक ऐसी कामयाबी जो पिछले 30 सालों में कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं दोहरा कर सकी है. बता दें कि पिछले तीन दशकों में यहां किसी भी पार्टी की लगातार दो बार सरकार नहीं बनी है. लेकिन बीजेपी और योगी आदित्यनाथ इस धारणा और परंपरा को बदलना चाहते हैं. कामयाबी दोहराने के पीछे की वजह है राज्य में बीजेपी का दबदबा और कमज़ोर विपक्ष.

चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी दल भी एक्शन में दिख रहे हैं. समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव बीजेपी को घरने का प्लान तैयार कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने भी योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मोर्चा खोलने का प्लान तैयार किया है. लेकिन सवाल वही है कि क्या विपक्षी पार्टियां राज्य में अपनी तस्वीर बदल सकती हैं या फिर विपक्ष ने राज्य में बीजेपी को चुनौती देने में देर कर दी.



कौन देगा योगी को चुनौती?
अगले दो महीने में सीएम योगी आदित्यनाथ के सत्ता में चार साल पूरे हो जाएंगे. अगर हाल के इतिहास को देखा जाए तो फिर कभी भी विपक्ष किसी भी राज्य में इतना कमज़ोर नहीं दिखा है, जैसा उत्तर प्रदेश में है. वो सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ जनता के बीच कोई लहर पैदा नहीं कर सके हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है उत्तर प्रदेश में 2019 के चुनाव में बीजेपी का शानदार प्रदर्शन, जबकि बीजेपी को घेरने के लिए समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने गठबंधन भी किया था.

प्रियंका की चुनौती
हाल के दिनों में प्रियंका गांधी ने राज्य में प्रवासी मजदूर, काननू व्यवस्था और खराब शासन का मुद्दा उठाया है, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखा. प्रियंका पार्टी के संगठनात्मक कामों में सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं. राज्य में वो ज्यादातर वक्त गायब रहीं.

SP और BSP का प्लान
इसके अलावा साल 2020 में समाजवादी पार्टी भी गायब रही, जबकि बीएसपी का रुख बीजेपी के खिलाफ बेहद नरम रहा. हालांकि अब अखिलेश यादव एक्शन में दिख रहे हैं. उन्होंने किसान आंदोलन में सरकार को घेरने की कोशिश की है. उन्होंने नए कृषि कानूनों को किसानों के खिलाफ बताया है. अखिलेश जिलों का दौरा कर रहे हैं, पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिल रहे हैं. पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण सत्र भी शुरू किया है, जहां हाल ही में चित्रकूट में आयोजित एक ऐसे शिविर में अखिलेश ने खुद हिस्सा लिया था.

समाजवादी पार्टी के विधायक सुनील सिंह साजन ने कहा, 'ट्रेनिंग कैंप एक अनूठा तंत्र है, जहां पार्टी नेतृत्व को जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करने, व्यापक रणनीति तैयार करने में मदद मिलती है. विधानसभा चुनाव तक, ये शिविर चुनावी रणनीति पर केंद्रित हैं और आगे की चुनौती के लिए कैडर तैयार कर रहे हैं .'

सवाल ये है क्या इसका फायदा पार्टी को मिलेगा? वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, 'समाजवादी पार्टी शुरू से ही संघर्ष की पार्टी रही है. उनकी ये विशेषता पिछले कुछ वर्षों में खो गई है. इससे पार्टी कैडर कमजोर हुआ है.' वह कहते हैं, 'जब पार्टी सत्ता में थी, तब अखिलेश को नेतृत्व विरासत में मिला था, उन्हें सत्ता से बाहर होने और इंतजार में सीएम की तरह व्यवहार करने की जरूरत है. भाजपा जैसी मजबूत पार्टी के खिलाफ, उसे संघर्ष तेज करने की जरूरत है.'

क्या SP को मिलेगा फायदा?
कांग्रेस के लिए चुनौती एक संगठन बनाने की है, जो अपने नेता प्रियंका गांधी की लोकप्रियता को भुना सके. पार्टी जो राज्य में तीस साल से अधिक समय से सत्ता से बाहर है, उनकी हाल तक ब्लॉक स्तर पर कोई संगठनात्मक समितियां नहीं थीं. साठ हजार से अधिक न्याय पंचायतों पर संगठन दूर का सपना था. पिछले एक साल में कड़ी मेहनत के परिणामस्वरूप अब राज्य के 800 से अधिक ब्लॉकों में पार्टी समितियों का गठन हुआ है. पार्टी नेतृत्व का दावा है कि उनके पास 15 हजार से अधिक न्याय पंचायतों में एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा है और संख्या केवल बढ़ रही है.

कांग्रेस की तैयारी
कांग्रेस के राज्य मीडिया संयोजक लल्लन कुमार ने कहा, 'हमारी पार्टी के पास अब एक कुशल और उत्तरदायी जन-आधारित संगठन है. नई ताकत को उन सफल अभियानों से आंका जाना चाहिए जो हाल के महीनों में पार्टी के नेतृत्व में हुए. प्रवासी मजदूरों के मुद्दे से लेकर किसानों, कानून-व्यवस्था और बेरोजगारी तक किसी अन्य दल ने सरकार को चुनौती नहीं दी या पुलिस की क्रूरता का सामना नहीं किया.'

कितनी तैयार हैं प्रियंका?
संगठनात्मक बदलाव के बाद बड़े नेताओं का कहना है कि प्रियंका गांधी अब उत्तर प्रदेश में सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं. एक वरिष्ठ नेता ने News18 को बताया, 'प्रियंका का चुनावी अभियान मध्य जनवरी के कुछ समय बाद शुरू होगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से शुरू होगा. गांधी गाजियाबाद और मेरठ जैसे जिलों के गांवों में पंचायत स्तर की बैठकों में भाग लेने से शुरू करेंगी.'

AIMIM और AAP जैसी छोटी पार्टियां भी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार है. भाजपा 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से अपनी जाति और धर्म आधारित वोट बैंक पर मजबूत पकड़ बनाए हुए है.
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