उत्तर प्रदेश में मोदी ने यूं तोड़ा यादव-जाटव समीकरण, मुस्लिमों को जोड़ा साथ

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: May 28, 2019, 6:32 PM IST
उत्तर प्रदेश में मोदी ने यूं तोड़ा यादव-जाटव समीकरण, मुस्लिमों को जोड़ा साथ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे मायावती और अखिलेश की जोड़ी नाकाम साबित हुई.

उत्तर प्रदेश में जातिगत राजनीति के अंत की शुरुआत हो चुकी है. पिछले तीन चुनावों में मतदाताओं ने हर बार जाति के बाहर जा कर पहले से ज़्यादा वोट करना शुरू किया है.

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यूपी के बारे में अंग्रेज़ी झाड़ पत्रकार सदा कहते पाए जाते थे “पीपल इन यूपी डोंट कास्ट देयर वोट, दे वोट देयर कास्ट”. सही भी लगता था. पर इस चुनाव में ये विशेषज्ञ और विश्लेषण दोनों साफ़ हो गए. पेटी खुली तो हर दूसरे यूपी वाले का वोट भारतीय जनता पार्टी को जाता दिखा. भाजपा ने 2014 के प्रदर्शन को दोहराया. भाजपा ने 62 सीटें जीतीं और एनडीए के ही अपना दल ने 2 सीटें जीतीं. यानी 2014 की तुलना में 9 सीटें कम हुईं, लेकिन वोट शेयर करीब 7 फीसदी बढ़ा. पिछली लोकसभा में बीजेपी के यूपी में 42.3 फीसदी वोट थे. इस बार पार्टी को 49.6 फीसदी वोट मिले हैं.



जो बुरी तरह पिटे उनमें सपा- बसपा और आरएलडी के गठबंधन समेत कांग्रेस और उनकी नई नायिका प्रियंका गांधी थीं. प्रियंका के हल्ले के बावजूद पार्टी का वोट पिछली बार से एक फीसदी कम ही हो गया.

राजा मिले सिपाही नहीं

25 साल तक एक दूसरे से सांप-नेवले सा रिश्ता निभाने वाले दल सपा-बसपा मिलकर चुनाव लड़े. चौधरी अजित सिंह अपनी राष्ट्रीय लोक दल लेकर साथ आ गए. मोर्चाबंदी थी केवल भाजपा के खिलाफ.

बसपा की जड़ में मौजूद जाटव और सपा के मूल सिपाही यादव पिछले 25 साल से आपस में मर और मार रहे थे. अपने नेताओं की बात सिपाहियों के गले नहीं उतरी. मायावती और अखिलेश के कहे मुताबिक इनके कोर वोटर्स में से कुछ ने पुराने दुश्मन की जगह बीजेपी को वोट डाल दिया या घर बैठ गए. कम ही वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हुए.


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कानपुर के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स के ओपिनियिन पोल ने जब यादवों से पूछा कि जिन सीटों पर सपा की जगह बसपा का उम्मीदवार है वहां वो किसको वोट करेंगे? तो सिर्फ 50 फीसदी यादवों ने बसपा कहा. करीब 25 फीसदी बोले भाजपा. बाकी ने अलग उत्तर दिये.

यही सवाल दलितों से पूछा गया कि जहां बसपा की जगह सपा का उम्मीदवार है तो वहां वे किसे वोट करेंगे? लगभग 58 फीसदी दलितों ने कहा कि वह बहन जी की बात मानेंगे. 20 फीसदी दलित वोटर बोले भाजपा.

यानी दोनों पार्टियों के कोर वोट का चौथाई हिस्सा भाजपा और नरेंद्र मोदी को सरक गया.

 जाति जाते जाते चली गई!


उत्तर प्रदेश में जातिगत राजनीति के अंत की शुरुआत हो चुकी है. पिछले तीन चुनावों में मतदाताओं ने हर बार जाति के बाहर जाकर पहले से ज़्यादा वोट करना शुरू किया है.

लंबे समय तक ओबीसी सपा से बंधा रहा और दलित, बसपा से. साल  2014 और 2017 के चुनावों में जाटवों और यादवों से इतर ओबीसी और दलित जातियों ने भाजपा की तरफ सरकना शुरू कर दिया.

ओबीसी में यादवों के अलावा 70 से ज़्यादा पिछड़ी जातियां हैं. इसी तरह से दलितों में जाटवों के अलावा 60 से ज़्यादा जातियां हैं. यादवों और जाटवों को मिलती अनवरत मलाई से चिढ़े इन लोगों ने आखिरकार भाजपा का हाथ थाम लिया. यादव-जाटव का एक-चौथाई और बाकी जातियों के लगभग पूरे वोट ने भाजपा को फिर से चैम्पियन बना गया. भाजपा का अपना सवर्ण वोट उसके पास था ही इस नए वोट को अमित शाह और मोदी ने सहेजा और तिनके-तिनके जोड़ कर किला बना लिया.

विधानसभा और लोकसभा चुनाव में फर्क
पिछले कुछ समय से वोटर ने बता दिया है कि वो लोकसभा के लिए देश के मुद्दों को देख कर वोट डालता है और विधानसभा के लिए गांव घर के मुद्दों को देख कर.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे और पाकिस्तान पर हुए एयर स्ट्राइक ने उनको हीरो बना दिया. जनता को भी पता था कि अगर वो सपा और बसपा को वोट देती है तो उनकी सरकार तो बननी नहीं है. यही वजह है कि सपा और बसपा को 2017 के विधानसभा चुनाव से भी काफी कम वोट मिले.

इसी चक्कर में पार्टियों और भटके पत्रकारों को लगा कि दो दुबे मिलकर छब्बे ना सही एक चौबे बन जाएंगे लेकिन हो गए ठन ठन गोपाल.  बुआ भतीजे किसी तरह लाज ही बचा पाए.



कागज़ पर बने आंकड़ों के महल को वोटरों ने तोड़ दिया. कहां तो रालोद सोने पर सुहागा बनने वाली थी और बन गई नीम पर करेला.

गठबंधन होने के बावजूद बसपा को 19.26, सपा को 17.96 प्रतिशत और आरएलडी को 1.67 प्रतिशत मत मिले. अगर आप तीनों ही पार्टियों का वोट प्रतिशत जोड़ दें (38.89%) तो भी बीजेपी के 2017 के वोट प्रतिशत(41.35) के बराबर नहीं होता है.

एक से दस तक मोदी फिर सब चिल्लर

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स ने जब यूपी में पूछा कि उन्हें कौन सा नेता सबसे ज्यादा पसंद है तो करीब 59 फीसदी बोले नरेंद्र मोदी, आठ फीसदी बोले राहुल गांधी, 10 फीसदी बोले मायावती और 14 फीसदी ने अखिलेश यादव कहा.



भ्रष्टाचार से नहीं भ्रष्टाचारी से दिक्कत
राहुल लाख बोले चौकीदार चोर है पर जनता ने तवज्जो नहीं दी. उसके हिसाब से हुआ चाहे जो हो मोदी की नीयत साफ़ है. रहा विकास तो वो उम्र की तरह हर बार कुछ ना कुछ बढ़ ही जाता है.

गांव देहात में बड़े बूढ़े कहते हैं, 'हुईहै वही जो राम रची राखा' पिछले पांच साल में पूरी तरह से भाजपा और सरकार ने हर पल हर तरह से कहा “हुईहै वही जो मोदी रची राखा, देने वाला तो मोदी है पार्टी सांसद, विधायक तो बस निमित्त मात्र है.”  जनता ने भी यही माना.

गैस की टंकी हो या शौचालय सब मिला मोदी से. जो नहीं हुआ उसकी वजह मोदी नहीं नीचे के लोग थे. सो गुस्सा उन पर. उसपर भी जनता समझ गई कि अगर उसने सांसद पर गुस्सा उतारा तो मोदी को कष्ट होगा सो गुस्सा थूक कर उसने भरपूर वोट डाला.

सांसदों को मंदिर के पंडितों की तरह भोग में सांसदी मिल गई.

हिंदुत्व और मुसलमान

Data Source - CSDS


केदारनाथ में मोदी की लहराती शॉल पर बहुत सारे लोग खिसियाए लेकिन गांव देहात कस्बे गली नुक्कड़ में घुसा रचा बसा आदमी भाव विभोर हो गया. उसने रोजा इफ्तार करते प्रधानमंत्री देखा था पर गंगा में डुबकी मारता प्रधानमंत्री पहली बार नज़र आया.



अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाइम ने हाल ही में ‘मोदी-डिवाइडर इन चीफ’ हेडलाइन से एक लेख छापा. दुनिया भर में बहुत लोग कहते हैं कि मोदी और मुसलमान का रिश्ता दूध और नीबू का है. CSDS के आंकड़े बताते हैं कि मोदी ने यहां पर भी ये दूध सड़ाया नहीं बल्कि कुछ पनीर बना लिया.



साल 2004 में जहां चार फीसदी मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया, वहीं 2014 में ये बढ़कर नौ फीसदी हो गया.  CSDS के 2019 के NES प्री पोल सर्वे के मुताबिक आज भी 26 फीसदी मुसलमान ऐसे हैं जो मोदी को एक मौका और देना चाहते हैं. हालांकि यूपी में ऐसे लोगों की तादाद 14 फीसदी है. आंकड़ा छोटा है, लेकिन अखलाक़ जैसे हादसों को याद करें तो ये आंकड़ा किसी जादू से कम नहीं है.

और मोदी के दोस्त हों या दुश्मन... हर कोई यह बात तो मानता है कि वो जादूगर है.

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First published: May 28, 2019, 4:35 PM IST
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