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मानसिक सेहत से जुड़ी चिंता के बीच बच्चों के लिए वैक्सीन की मांग तेज़

कई लोगों को लगता है कि वैक्सीन लगने के बाद स्कूल खुलने से बच्चे दोबारा पटरी पर लौट पाएंगे.

Corona Vaccination: नोएडा के फोर्टिस अस्पताल के अतिरिक्त निदेशक डॉ. आशुतोष सिन्हा ने न्यूज़ 18 से बातचीत में कहा,"बच्चों के बीच अवसाद और घबराहट के केस बढ़े हैं. अक्सर परिवार को बच्चों के यह लक्षण समझ नहीं आते और वह इसे चिड़चिड़ाहट कहकर टाल देते हैं."

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    नई दिल्ली. कोविड 19 की दूसरी लहर (Covid-19 Second Wave) की वजह से भारत के कई हिस्सों में लॉकडाउन लगा है और कम उम्र की आबादी इससे ज्यादा जूझ रही है. बच्चे और किशोरों के अभिभावक, अब 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए टीके की मांग कर रहे हैं. शिशु रोग विशेषज्ञ कह रहे हैं कि एक साल से ज्यादा समय तक घर पर रहने की वजह से बच्चों में घबराहट और स्क्रीन टाइम यानी ज्यादा देर तक फोन पर रहने की आदत बढ़ गई है. कईयों का कहना है कि छात्रों का टीकाकरण हो जाए ताकि वे स्कूल और बाहर जा सकें.

    अमेरिका, कनाडा और सिंगापुर में बच्चों के लिए वैक्सीन को मंजूरी मिल गई है, वहीं भारत में बच्चों के लिए इससे संबंधित नीति पर फिलहाल बात हो रही है. तीसरी लहर से बच्चों को होने वाले नुकसान से जुड़ी रिपोर्ट की वजह से अभिभावक चिंतित हैं और हाल ही में कई युवा भारतीयों ने ट्विटर पर #SaveKidsFrom3rdWave और #VaccinateIndianKids वैक्सीन की मांग की है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी ट्वीट किया, 'आने वाले वक्त में बच्चों को कोरोना से सुरक्षित करना होगा. शिशुओं से जुड़ी सेवा और वैक्सीन से जुड़े प्रोटोकॉल की सही व्यवस्था की जानी चाहिए. भारत के भविष्य के लिए जरूरी है कि वर्तमान में मोदी ‘सिस्टम’ को नींद से जगाया जाए.'

    हालांकि अभी तक बच्चों के कोरोना से खतरे के मामले कम ही देखने को मिले हैं लेकिन लॉकडाउन में उनकी मानसिक सेहत ज्यादा चिंता का विषय बन गई है. नोएडा के फोर्टिस अस्पताल के अतिरिक्त निदेशक डॉ. आशुतोष सिन्हा ने न्यूज़ 18 से बातचीत में कहा, 'बच्चों के बीच अवसाद और घबराहट के केस बढ़े हैं. अक्सर परिवार को बच्चों के यह लक्षण समझ नहीं आते और वह इसे चिड़चिड़ाहट कहकर टाल देते हैं. मेरे पास कई मरीज आते हैं जिनके बच्चे घबराहट के शिकार हो रहे हैं. ज्यादा वक्त तक घर में रहने, फोन देखते रहने और नकारात्मक खबर सुनने की वजह से बच्चों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है.'

    कई लोगों को लगता है कि वैक्सीन लगने के बाद स्कूल खुलने से बच्चे दोबारा पटरी पर लौट पाएंगे. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि अभिभावकों के सामने सही और भरोसेमंद आंकड़े लाए जाएं.

    India Wide Parents Association की अध्यक्ष अनुभा सहाय कहती हैं, 'कई अभिभावक वैक्सीन के पक्ष में हैं लेकिन उन्हें यह आश्वासन भी चाहिए कि इसका कोई उलटा असर या साइड इफेक्ट बच्चों पर नहीं पड़ेगा. एक तरफ बच्चे ज्यादा स्क्रीनटाइम की वजह से पीड़ित हैं, वहीं दूसरी तरफ कई बच्चे हैं जो ऑनलाइन क्लास वहन नहीं कर सकते और इसकी वजह से डेढ़ साल से उन्हें काफी नुकसान हो रहा है. अगर टीकाकरण हो जाता है तो इन बच्चों को पढ़ाई में हो रहे नुकसान से बचाया जा सकता है.'

    ट्विटर पर बच्चों के टीकाकरण की मांग करने वाले अभिभावकों में से एक जगविंदर कौर, 10 साल के बच्चे की मां हैं और कहती हैं, 'अगर स्कूल खुलता है तो फायदा तो है लेकिन बतौर मां, मेरे लिए बच्चे की सुरक्षा जरूरी है. उसकी सेहत जरूरी है.'

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    पश्चिम बंगाल के एडमास यूनिवर्सिटी में वायरस विज्ञान पढ़ाने वाले डॉ. अरिंदम मित्रा कहते हैं कि अगर सरकार ज्यादातर वयस्क आबादी का टीकाकरण कर देती है तो बच्चों पर वायरस का लोड अपने आप कम हो जाएगा. इसलिए अभी 18 से ऊपर के टीकाकरण पर ही ध्यान देना चाहिए. वैक्सीन के बाद भी बच्चों को तो स्कूल इतनी जल्दी नहीं बुलाया जाएगा. मित्रा कहते हैं कि वैक्सीन के बाद भी लोगों को नियमों का पालन करना होगा. किशोरों को तो समझाया भी जा सकता है लेकिन छोटे बच्चों को अब भी सुरक्षित रखने की जरूरत है.

    सरकार ने 2020-21 के बीच में स्कूल खोले थे. विभिन्न चरण में स्कूल खोले गए और 9वीं से 12वीं तक के बच्चों की सीमित संख्या में स्कूल बुलाया गया. हालांकि 10 से कम उम्र के बच्चों के लिए तब भी स्कूल नहीं खुले थे.

    FICCI ARISE के अध्यक्ष मनित जैन कहते हैं कि ज्यादा वक्त तक बच्चों को कैंपस से दूर रखने पर उनकी मानसिक सेहत पर यकीनन असर पड़ेगा. हर बच्चे की जरूरत अलग है. जरूरी है कि बच्चों के लिए सुरक्षित वैक्सीन तैयार की जाए. लेकिन उसके असर को लेकर जरूरी है कि सरकार सही आंकड़े मुहैया करवाए.
    Published by:Ashu
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