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वैक्सीन मिक्सिंग: दशकों पुराना तरीका, जिससे है बड़े फायदे की उम्मीद; जानें इसके बारे में सबकुछ

जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में खून के थक्कों की शिकायत के चलते एस्ट्राजेनेका के इस्तेमाल को रोक दिया गया है. (सांकेतिक तस्वीर)

Vaccine Mixing: कोविड-19 (Covid-19) टीकों को बीते 6 महीनों में फास्ट ट्रैक ट्रायल्स के बाद पाबंदियों के साथ आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति मिली है. वहीं, मिक्स एंड मैच की जांच कुछ महीनों पहले ही शुरू हुई है.

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    नई दिल्ली. भारत में 'वैक्सीन मिक्स एंड मैच' (Vaccine mix and match) के उपाय पर विचार किया जा रहा है. इसका मतलब होता है कि व्यक्ति को टीके की पहली खुराक बाद दूसरे डोज में कोई अन्य वैक्सीन दी जाएगी. वैज्ञानिक भाषा में इसे 'हेटरोलोगस' इम्युनाइजेशन कहा जाता है. हालांकि, इसके परिणामों को लेकर अभी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है, लेकिन दुनिया के कई देशों में इस तरीके पर काम किया जा रहा है. फिलहाल, देश में कोविशील्ड (Covishield), कोवैक्सीन (Covaxin) और स्पूतनिक V (Sputnik V) का इस्तेमाल किया जा रहा है. अब समझते हैं इस उपाय से जुड़े कुछ आम सवालों के जवाब.

    वैक्सीन को मिलाने की जरूरत क्यों पड़ी?
    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि दूसरे डोज में अलग वैक्सीन लेने से इम्यून प्रतिक्रिया बेहतर हो सकती है. खासतौर से कोविशील्ड/एस्ट्राजेनेका जैसी वायरल वेक्टर वैक्सीन के मामले में यह ऐसा होने की संभावा ज्यादा हो सकती है. अलग-अलग तकनीक की वैक्सीन का मिश्रण करने और मिलाने से इम्यून सिस्टम को बेहतर प्रतिक्रिया देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है.

    जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में खून के थक्कों की शिकायत के चलते एस्ट्राजेनेका के इस्तेमाल को रोक दिया गया है. ऐसे में वैक्सीन मिक्सिंग और मैचिंग से सुरक्षा के साथ इम्युनाइजेशन प्रक्रिया हो सकती है. इसके अलावा देश में जारी वैक्सीन की तेज मांग और कम सप्लाई के बीच की खाई को पाटने में भी मदद मिल सकती है.



    वैक्सीन मिक्सिंग को लेकर डर
    कोविड-19 टीकों को बीते 6 महीनों में फास्ट ट्रैक ट्रायल्स के बाद पाबंदियों के साथ आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति मिली है. वहीं, मिक्स एंड मैच की जांच कुछ महीनों पहले ही शुरू हुई है. ऐसे में वैक्सीन को मिलाना कितना सुरक्षित और असरदार है. इन सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं. साथ ही कोवैक्सीन जैसी कई वैक्सीन की अभी तक मिक्स और मैच तरीके से जांच नहीं की गई है. हालांकि, 20 मई को पूर्वी उत्तर प्रदेश से एक मामला सामने आया था, जहां कोविशील्ड का पहला डोज दिए जाने के बाद दूसरे डोज में कोवैक्सीन दे दी गई थी.

    कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने वैक्सीन मिक्स एंड मैच के मामले में जटिलताओं का जिक्र किया है. इनमें वैक्सीन की शेल्फ लाइफ, शिपमेंट और स्टोरेज की शर्तें समेत कई बातें शामिल हैं. Com-COV ट्रायल्स जैसी स्टडीज बताती हैं कि एस्ट्राजेनेका और फाइजर के टीकों को साथ लगाने से साइड इफेक्ट्स बढ़ सकते हैं. हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक अच्छी खबर यह है कि वैक्सीन की मिक्सिंग और मैचिंग से जुड़ा कोई बड़ा जोखिम सामने नहीं आया है.

    यह भी पढ़ें: भारत बायोटेक और सीरम से वैक्सीन की कीमतों पर फिर बातचीत कर सकती है केंद्र सरकार

    क्या इससे पहले भी वैक्सीन मिलाई गई हैं?
    वैक्सीन की मिक्सिंग और मैचिंग तरीके का परीक्षण दशकों से किया जा रहा है. हालांकि, ज्यादातर संयोजनों को शुरुआत में एक जैसी तकनीक वाली वैक्सीन तक सीमित रखा गया था. भारत में रोटावायरस वैक्सीन को मिलाने की प्रक्रिया का इस्तेमाल और जांच हो चुकी है.

    हाल ही में हुए ज्यादातर टेस्ट में एस्ट्राजेनेका और mRNA वैक्सीन को मिलाया गया था. कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में युवा आबादी को एस्ट्राजेनेका के विकल्प के रूप में फाइजर या मॉडर्ना दी जा रही है. स्पेन और दक्षिण कोरिया इन टीकों को मिलाने पर विचार कर रहे हैं. रूस और चीन भी इस तरह की तैयारी में लगे हुए हैं. रूप में एस्ट्राजेनेका और स्पूतनिक V वैक्सीन के कॉम्बिनेशन की जांच पर विचार किया जा रहा है. सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने जनवरी में अमेरिका में फाइजर और मॉडर्ना के टीकों को मिलाने की अनुमति दे दी थी.