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सावरकर के आलोचकों ने आधे-अधूरे सच बेचे!

सावरकर के आलोचकों ने आधे-अधूरे सच बेचे!

वीर सावरकर (फ़ाइल फोटो)

वीर सावरकर (फ़ाइल फोटो)

सामाजिक बेड़ियों को हटाने के लिए सावरकर के देशवासियों के आह्वान और अस्पृश्यता निवारण के लिए उनके कार्य से डॉ. अंबेडकर तक प्रेरित हुए. फिर भी उन्हें सांप्रदायिक, फासीवादी, नाजियों और हिटलर के हमदर्द के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उनके आलोचक, विशेषकर विदेशी लेखक, उन्हें नीचा दिखाने के लिए उनके भाषणों को मनमाने ढंग से उद्धृत करते हैं.

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भारतीय राजनीति में हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक केंद्रीय तत्व बन जाने और भारतीय जनता पार्टी के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल के रूप में उभरने के साथ ही विविध प्रश्नों पर विनायक दामोदर सावरकर के विचार सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आते रहे हैं.

दुर्भाग्य से, सावरकर के साथ अन्याय करते हुए, विपक्ष और इतिहास-लेखकों ने जानबूझकर सावरकर को संदर्भ से बाहर उद्धरित करने के लिए बौद्धिक बेईमानी का सहारा लिया है. प्रसिद्ध लेखक और पद्म पुरस्कार से सम्मानित धनंजय कीर उन्हें सामाजिक क्रांतिकारी कहते हैं. डॉ बीआर अंबेडकर की जीवनी में उन्होंने समाज सुधारक और सामाजिक क्रांतिकारी के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया है. कीर कहते हैं कि सुधारक केवल पुराने निर्माण की मरम्मत करता है जबकि क्रांतिकारी ढांचे को पूरी तरह से नष्ट करके नया ढांचा बनाता है: ‘सावरकर केवल समाज सुधारक नहीं थे. वह एक कार्योन्मुखी सामाजिक क्रांतिकारी थे.’

सामाजिक बेड़ियों को हटाने के लिए सावरकर के देशवासियों के आह्वान और अस्पृश्यता निवारण के लिए उनके कार्य से डॉ. अंबेडकर तक प्रेरित हुए. फिर भी उन्हें सांप्रदायिक, फासीवादी, नाजियों और हिटलर के हमदर्द के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उनके आलोचक, विशेषकर विदेशी लेखक, उन्हें नीचा दिखाने के लिए उनके भाषणों को मनमाने ढंग से उद्धृत करते हैं. इसका एक उदाहरण इतालवी विद्वान मार्जिया कासोलारी. उन्होंने सावरकर को गलत तरीके से उद्धृत किया और विशेष रूप से अपने लेख ‘1930 के अभिलेखीय साक्ष्य में हिंदुत्व का विदेशी गठजोड़’ में अर्धसत्य प्रस्तुत किए.


इस लेख में उन्होंने पुणे में 1 अगस्त 1938 को बीस हजार की एक सभा को संबोधित करते हुए सावरकर के एक भाषण का हवाला दिया (जो 'वीर सावरकर्स व्हर्लविंड प्रोपगेण्डा' पुस्तक में प्रकाशित हुआ) था, "हमारी विदेश नीति "वादों" पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. जर्मनी को नाज़ीवाद और इटली को फ़ासीवाद का सहारा लेने का पूरा अधिकार है और घटनाओं ने यह उचित ठहराया है कि "वादों" और शासनों के यह रूप, वहां की स्थितियों में, उनके लिए अनिवार्य और फायदेमंद थे. बोल्शेविज़्म रूस और ब्रिटेन में लागू लोकतंत्र का स्वरूप ब्रिटेन के अनुकूल हो सकता है... जर्मनी और जापान या इटली या रूस को शासन की कोई विशेष पद्धति चुनने के लिए निर्देशित करनेवाले हम कौन होते हैं? वह भी इसलिए कि हमें उस पद्धति के प्रति अकादमिक आकर्षण है? उन्होंने आगे कहा, ‘निश्चित रूप से हिटलर पंडित नेहरू से बेहतर जानता है कि जर्मनी के लिए सबसे अच्छा क्या है. मात्र यह तथ्य कि नाजी या फासीवादी जादुई छड़ी के स्पर्श से जर्मनी और इटली इतने आश्चर्यजनक रूप से ठीक हो गए हैं और इतने शक्तिशाली हो गए हैं जितने पहले कभी नहीं थे, यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वे राजनीतिक "वाद" उनके स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे अनुकूल टॉनिक थे. भारत अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार शासन की विशेष पद्धति को चुन या अस्वीकार कर सकता है.

सावरकर ने कहा कि वहां की परिस्थितियों में, यह उनके लिए उपयुक्त हो सकता है, लेकिन उन्होंने कहीं भी नाजियों या हिटलर की प्रशंसा नहीं की. वास्तव में उन्होंने बोल्शेविज़्म और लोकतंत्र का भी हवाला दिया क्योंकि ये चार शासन प्रणालियां प्रसिद्ध थीं और दुनिया के कुछ देशों में काम भी कर रही थीं, इसलिए उन्होंने भारत की विदेश नीति पर बोलते हुए केवल उन सभी का नाम लिया. यह याद रखना चाहिए कि भाषण का विषय भारत की विदेश नीति था, भारत को कौन सी नीति अपनानी चाहिए नहीं था. उन्होंने कभी नाज़ीवाद या फासीवाद की पैरवी नहीं की. वह केवल तत्कालीन संसार के कुछ तथ्य बता रहे थे. उन्होंने न तो नाज़ीवाद या फासीवाद का समर्थन किया और न ही कभी कहा कि भारत को इसे अपनाना चाहिए या यह भारत के लिए भी फायदेमंद होगा. तथ्य बताने और उनकी वकालत करने में बहुत बड़ा अंतर है.

आजादी के बाद से ही हमारे साम्यवादी सोवियत रूस, लोकतान्त्रिक अमेरिका, ब्रिटेन सहित कुछ राजशाहियों और यहां तक कि कई तानाशाही व्यवस्थाओं के साथ भी, अच्छे संबंध रहे हैं; अरब, इज़राइल और यहां तक कि फिलिस्तीन से भी हमारे मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं. लेकिन इससे हमारे देश की घरेलू शासन प्रणाली के बारे में हमारी पसंद कभी प्रभावित नहीं हुई.


इसी सिद्धांत को सावरकर ने उपरोक्त भाषण में प्रस्तुत किया, "राजनीति का समुचित सिद्धांत बताता है कि शासन या राजनीतिक "वाद" का कोई भी रूप सभी परिस्थितियों में सभी लोगों के लिए समान रूप से एकदम ही अच्छा या बुरा नहीं होता. महत्वपूर्ण रूप से, उन्होंने आगे कहा, "विदेशों के साथ भारत का संबंध विदेशों की सरकार की पसंद के बजाय हमारे अपने राष्ट्रीय हित और सुरक्षा नीतियों पर निर्भर करता है."

सावरकर का निम्नलिखित कथन किसी भी किस्म का संदेह दूर कर देता है, "... हमारे लिए व्यावहारिक राजनीति की सबसे सही नीति उन लोगों/देशों से मित्रता करना है जिनमें अपने किसी भी "वाद" के बावजूद हमारे देश के हित की पूर्ति करने की संभावना है, उनसे मित्रता केवल तब तक रखी जाए जब तक यह उसके उद्देश्य की पूर्ति करते हों.”

भारत के ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के तुरंत बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, "...हमारी विदेश नीति के उद्देश्य विश्वशांति की रक्षा और मानवीय स्वतंत्रता का विस्तार हैं.“ उन्होंने आज के आदर्शवाद को कल के यथार्थवाद के रूप में देखा और उस दौर की द्विध्रुवीय दुनिया में एक गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी. एक तरह से भारत की विदेश नीति के संदर्भ में नेहरू 'व्यावहारिकता' की नीति अपना रहे थे.


लेकिन सावरकर के प्रति घृणा के तीव्र भाव ने इस भावना को कुचल दिया. 2003 में भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने महात्मा गांधी के चित्र के ठीक सामने संसद के केंद्रीय हॉल में सावरकर का चित्र स्थापित किया. यह भारतीय संसद का एकमात्र समारोह था जिसका कांग्रेस और सभी विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया. कांग्रेस और वामपंथी लंबे समय से सावरकर के आलोचक रहे हैं.
2004 में, वाम दलों द्वारा समर्थित कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अंडमान की ऐतिहासिक सेलुलर जेल से सावरकर का विवरण देनेवाली पट्टिका को हटा दिया; याद रहे कि वह लंबे समय यहां बंदी बना कर रखे गए थे.

अब समय आ गया है कि रिकॉर्ड दुरुस्त कर लिया जाए. हाल ही में, एक प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका ने अपने पृष्ठों पर अर्धसत्यों और निराधार दावों पर आधारित एक लेख के माध्यम से सावरकर को गलत तरीके से चित्रित करने के लिए माफी मांगी. क्या हम आशा रख सकते हैं कि कांग्रेस, वामपंथी और कुछ इतिहासकार भी कुछ इसी तरह अपनी बौद्धिक ईमानदारी प्रदर्शित करने का नैतिक साहस जुटा लेंगे?

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

Tags: Veer savarkar

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