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"अब सुनाये कोई वही आवाज़", कितना अखरेगा ओम प्रभाकर का जाना...

हिंदी व उर्दू के कवि ओम प्रभाकर नहीं रहे. (न्यूज़18 इमेज)
हिंदी व उर्दू के कवि ओम प्रभाकर नहीं रहे. (न्यूज़18 इमेज)

1941 में मध्य प्रदेश के भिंड में ओमनारायण अवस्थी का जन्म हुआ था, जिन्हें बाद में ओम प्रभाकर के नाम से पहचान मिली. हिंदी और उर्दू पर अधिकार रखने वाले प्रभाकर की पहली रचना धर्मयुग (Dharmyug) में 1958 में छपी थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 23, 2021, 11:03 PM IST
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शाम के साहिल से उठकर चल दिये
दिन समेटा, रात के घर चल दिये..
पहले हिन्दी और फिर उर्दू की कविता में अपना एक अनोखा हस्ताक्षर बनाने वाले महत्वपूर्ण 80 वर्षीय कवि श्री ओम प्रभाकर का निधन 23 फरवरी 2021 की शाम करीब 5.30 बजे हो गया. पिछले कुछ समय से वह रोगों से तो कम लेकिन आयु के चलते स्वाभाविक शारीरिक कष्टों से जूझ रहे थे. ओम प्रभाकर अपने पीछे अगली दो पीढ़ियों का भरा पूरा परिवार छोड़ गये हैं. ओम प्रभाकर का कवि साहित्य और साहित्य प्रेमियों के जगत में लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा.

1958 में जब श्री सत्यकाम विद्यालंकार प्रसिद्ध साहित्यिक व सामाजिक पत्रिका 'धर्मयुग' के संपादक हुआ करते थे, तब प्रभाकर की पहली कविता इस ऐतिहासिक पत्र में छपी थी. उसी साल उनकी पहली कहानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका युग चेतना में प्रकाशित हुई थी, जिसके संपादक मंडल में भवानीप्रसाद मिश्र, कुंवर नारायण, कृष्णनारायण कक्कड़ और रघुवीर सहाय शामिल थे. इसके बाद तो प्रभाकर का रचनाकर्म हिन्दी कविता और नवगीत में इतिहास रचने वाला रहा.
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करीब दो दशक पहले से उनका रुझान ​उर्दू साहित्य की तरफ इस तरह हुआ कि उन्होंने बाकायदा उर्दू ज़बान और शायरी के शास्त्र को सीखने के बाद ग़ज़लें और नज़्में कहीं तो उर्दू की कहानियों का हिंदी में अनुवाद भी किया. शबख़ून, नया वरक, इन्तख़ाब, आगाज़, जदीद फिक्रो ​फ़न, आजकल जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रभाकर की उर्दू शायरी और लेख आदि छपते रहे. यही नहीं, 'तिनके में आशियाना' के नाम से उनकी ग़ज़लों का संग्रह भी 2007 में प्रकाशित हुआ.

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80 वर्ष की उम्र में कवि ओम प्रभाकर का देहावसान देवास में हुआ.


केदारनाथ सिंह, परमानंद श्रीवास्तव, माहेश्वर तिवारी और प्रोफेसर नईम की पीढ़ी के रचनाकारों में शुमार प्रभाकर ने हिंदी कविता और नवगीत में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. करीब तीन दर्जन महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक गीत संकलनों व दस्तावेज़ों में उनका नाम और काव्य शुमार किया गया. हिंदी कविता और नवगीत पर उन्होंने कई वृहद और महत्वपूर्ण आलेख भी लिखे. उनके रचना संसार पर नज़र डालें तो एक बेहद अहम और समृद्ध रचनाकार से परिचय होता है:

1966 में प्रकाशित अज्ञेय का कथा साहित्य एक तरफ प्रभाकर की समीक्षा व आलोचना दृष्टि का सबूत देता है, 1973 में प्रकाशित छंद कविता संग्रह पुष्पचरित उनकी काव्य लय का. 1981 में कंकाल राग शीर्षक से कविता संग्रह तो उसी साल 'एक परत उखड़ी माटी' शीर्षक से कहानी संग्रह उन्हें रचनाकार के रूप में चर्चित करते हैं. इसके बाद आधा दर्जन से ज़्यादा और कृतियां प्रभाकर ने सौंपी.


5 अगस्त 1941 को मध्य प्रदेश के भिंड में ओमनारायण अवस्थी का जन्म हुआ था, जिन्हें बाद में ओम प्रभाकर के नाम से प​हचान मिली. एमए और पीएचडी की उपाधियां रखने वाले प्रभाकर कविता - 64 के संपादन के लिए भी जाने गए तो उनके रचना संसार का अनुवाद बांग्ला, उर्दू, गुजराती, अंग्रेज़ी, गुरुमुखी के साथ ही ब्रेल लिपि में भी होता रहा. मप्र साहित्य परिषद की सामान्य सभा के सदस्य और आकाशवाणी भोपाल की सलाहकार समिति में रहने वाले प्रभाकर ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से रिटायर हुए थे. इससे पहले वह भिंड स्थित शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय एवं शोध केंद्र के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे थे.

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प्रभाकर के निधन की सूचना देते हुए उनके पुत्र और वरिष्ठ पत्रकार ईशान अवस्थी ने बताया कि ओम प्रभाकर की अंत्येष्टि देवास में 24 फरवरी को संपन्न होगी. महामारी के समय में नियमों के पालन के चलते सीमित लोगों के बीच अंतिम कार्यक्रम होगा. वहीं, प्रभाकर के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी और साहित्य सागर, भोपाल, मध्य प्रदेश लेखक संघ, मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी एवं साहित्य परिषद से जुड़े वरिष्ठ साहित्यकारों ने श्रद्धांजलि अर्पित की.

ओम प्रभाकर की कुछ यादगार रचनाएं :

ग़ज़ल

कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़
अब सुनाए कोई वही आवाज़।

ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी तुझमें
काँपते लब, छुई-मुई आवाज़।

शाम की छत पे कितनी रौशन थी
तेरी आँखों की सुरमई आवाज़।

जिस्म पर लम्स चाँदनी शब का
लिखता रहता था मख़मली आवाज़।

ऎसा सुनते हैं, पहले आती थी
तेरे हँसने की नुक़रई आवाज़।

अब इसी शोर को निचोड़ूँगा
मैं पियूँगा छनी हुई आवाज़।

नवगीत

हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढे़ंगें
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में

या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे
हम जहाँ हैं वहीं से
आगे बढे़ंगे

यह हमारी नियति है
चलना पडे़गा
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पडे़गा

जो लडा़ई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लडे़ंगे
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढे़ंगे.

बाल कविता

बच्चे ने खोली अलमारी,
अलमारीसे निकला बस्ता-
बच्चे ने फिर बस्ता खोला,
बस्ते से निकली इक पुस्तक-
फिर बच्चे ने खोली पुस्तक,
पुस्तक से निकला इक पाठ-
फिर बच्चे ने खोला पाठ,
और पाठ से निकली रोटी -
निकली और बाहर को भागी,
उसके पीछे बच्चा दौड़ा-
आगे रोटी, पीछे बच्चा
पीछे बच्चा, आगे रोटी,
दौड़ अभी भी जारी है...
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