विजय दिवस पर विशेष: कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं?

विजय दिवस पर विशेष: कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं?
photo Getty images

ये आज से 44 सालों पहले की बात है, जब ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था। पूर्वी पाकिस्तान के कमांडर जनरल नियाजी को जब आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़कर सुनाई जा रही थी,

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नई दिल्ली। ये आज से 44 सालों पहले की बात है, जब ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था। पूर्वी पाकिस्तान के कमांडर जनरल नियाजी को जब आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़कर सुनाई जा रही थी, तब उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में अपनी ओर देख रहे वरिष्ठ भारतीय सैन्य अधिकारी से कहा था, कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं? और ये उनके आत्मसमर्पण से पहले आखिरी शब्द थे। उसके बाद जो हुआ, वो समूची दुनिया जानती है।

भारत के सामने पाकिस्तान घुटने टेक चुका था। भारत ने दिखा दिया था, कि कम तैयारी के बावजूद कैसे उसने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था, वो भी तब-जब पाकिस्तानी सैनिकों को आखिरी दम पर जंग लड़ने का आदेश मिला हुआ था।

ये प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी, जो पाकिस्तान पर पहले ही हमला कर देना चाहती थी। क्योंकि पाकिस्तानी सेना आज के बांग्लादेश और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान पर जुल्म ढा रही थी। वो भी सिर्फ इसलिए, क्योंकि वो पश्चिमी पाकिस्तान के मुकाबले बंगालियों यानि पूर्वी पाकिस्तानियों को कमतर मानते थे। और व्यापक जनादेश के बावजूद शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में सरकार नहीं बनने दिया था। उन्हें लगता था कि ऐसा करने से पाकिस्तान के बड़े हिस्से यानि पश्चिमी पाकिस्तान का अपमान होगा। उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में उपजे विद्रोह को दबाने के लिए भरसक कोशिश कर ली। विजय दिवस से 14 दिन पहले यानि 3 दिसंबर को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कलकत्ता में जनसभा को संबोधित कर रही थी, तभी पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध हवाई हमले की शुरुआत करते हुए पश्चिमी भारत के अधिकतर लड़ाकू हवाई पट्टियों को बर्बाद कर दिया था।



पाकिस्तानी एयरफोर्स ने शाम को 5 बजकर 40 मिनट पर अपने अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों सैबर जेट्स और स्टार फाइटर्स की मदद से पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों को तबाह कर दिया। और उसी समय इंदिरा गांधी जनसभा रोक कर दिल्ली की ओर रवाना हो गई। ऐहतिहातन उनके विमान को लखनऊ होते हुए दिल्ली पहुंचाया गया, जहां वो रात में पहुंची और मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद पाकिस्तान पर जवाबी हमले का आदेश दे दिया। आज का दिन बांग्लादेश में मुक्ति दिवस के तौर पर मनाया जाता है। जिसकी शुरुआत खुद पाकिस्तानी फौजी तानाशाह याहिया खान के उस आदेश के बाद हुई थी, जिसमें उन्होंने 25 मार्च 1971 को पूर्वी बांग्लादेश के जन विद्रोह को दबाने की कमान पूरी तरह से सेना को दे दी थी। और इसका निर्णायक मोड पाकिस्तान की ही गलती से आया, जब पाकिस्तान ने शाम ढलते ही 3 दिसंबर को भारतीय वायुसैनिक अड्डों पर हमला किया।



भारतीय सेना ने हमले के आदेश के बाद पूर्वी पाकिस्तान यानि आज के बांग्लादेश को पूरब की तरफ से घेरना शुरू किया, साथ ही उत्तर की ओर से भी हमला शुरू हुआ। जबकि उत्तर की तरफ से हम अपेक्षाकृत बैकफुट पर थे। ये वो लड़ाई थी, जिसमें भारतीय नौसेना ने भी पाकिस्तानी मजबूत नौसेना को मात दी, भारतीय सेना ने कराची में धुएं का बादल बना दिया। तेल डिपो को आग में झोंक दिया। उसकी पनडुब्बी को मार गिराया। पश्चिमी मोर्चे पर भारत ने दबाव बनाया, तो पूरब में पाकिस्तान तिलमिलाने लगा। यूं तो लड़ाई 3 दिसंबर की जगह 23 नवंबर से ही शुरू हो चुकी थी, पर आधिकारिक ऐलान इंदिरा गांधी ने 3 दिसंबर को किया था। इस दौरान हिली की लड़ाई सबसे खौफनाक रही, जिसपर फतह हासिल कर भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना को दो हिस्सों में बांट दिया, और 16 दिसंबर की सुबह 9 बजे ढाका में प्रवेश किया। जहां दोपहर के समय जनरल नियाजी ने पिस्तौल समर्पित कर पाकिस्तानी सेना के समर्पण को स्वीकार किया।

उस समय भारतीय सेना की पूर्वी कमान के स्टाफ़ ऑफ़िसर लेफ़्टिनेंट जनरल जेएफ़आर जैकब सबसे पहले ढाका पहुंचने वाले अधिकारी रहे। जिन्हें बांग्ला मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों ने पाकिस्तानी समझकर घेर लिया। उन्होंने अपने बारे में बताया, तब उन्हें रास्ता दिया गया। उन्होंने ही नियाजी को आत्मसमर्पण की शर्तें सुनाई। जिसमें ये शर्त थी कि पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण को करेगी ही, पर वो न सिर्फ भारतीय सेना के सामने होगा, बल्कि बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी के सामने भी होगा। इसी समय नियाजी ने कहा था, कि कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूं? पर, दोपहर होते-होते सबकुछ साफ हो चुका था। नियाजी के पास अकेले ढाका में 26 हजार 400 सैनिक थे। पर, उन्हें सिर्फ 3000 भारतीय सैनिकों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। विजय दिवस भारत के लिए स्वर्णिम दिन है।

ये वो दिन है, जब दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश का उदय हुआ। ये वो दिन है, जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान को एक बार फिर से घुटने टेकने पर मजबूर किया। ये वो दिन था, जब बंगालियों को पाकिस्तानियों के अत्याचारों से आजादी मिली। ये वो दिन था, जब भारतीय सेना ने साबित किया कि तैयारी के बगैर भी कोई भी लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। क्योंकि पहले प्रधानमंत्री के सामने जनरल मानेकशॉ ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमले से इनकार कर दिया था, वजह थी अपर्याप्त तैयारी। पर पाकिस्तानी हमले के तुरंत बाद भारतीय सेना ने जिस द्रुत गति से आगे बढ़कर महज 14 दिनों में पाकिस्तानी सेना को धूल चटाई, वो आज वीरगाथा बन चुकी थी। ये वो जीत थी, जिसने इंदिरा को दुनिया की सबसे मजबूत नेताओं में जगह बनाकर दी। इसी जीत की तारीफ में बाद में देश के प्रधानमंत्री बनें और उस समय धुर विरोधी रहे अटल बिहारी वाजपेई ने संसद में इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपाधि दी।

(इनपुट-भारतरक्षक.कॉम से भी)
First published: December 16, 2015, 10:39 AM IST
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