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'आर्यन आक्रमण हटे, पढ़ाई जाए सरस्‍वती सभ्‍यता': स्‍कूली किताबों में गैर ऐतिहासिक संदर्भों पर बोले सहस्‍त्रबुद्धे

बीजेपी सांसद और संसद में मिनिस्‍ट्री ऑफ एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विनय सहस्‍त्रबुद्धे ने की बात. (File Pic)
बीजेपी सांसद और संसद में मिनिस्‍ट्री ऑफ एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विनय सहस्‍त्रबुद्धे ने की बात. (File Pic)

बीजेपी सांसद और संसद में मिनिस्‍ट्री ऑफ एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विनय सहस्‍त्रबुद्धे की यह भी योजना है कि दूसरे देशों की यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को भारतीय छात्र-छात्राओं और भारतीय छात्र-छात्राओं को उनसे मिलवाया जाए ताकि दो लोकतांत्रिक परंपरा समूहों को एक-दूसरे के करीब लाया जा सके.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 24, 2021, 3:43 PM IST
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(इरम आगा)

नई दिल्‍ली. भारत के स्‍कूलों की पाठ्यपुस्‍तकों (Indian Education System) में देश को पहली प्राथमिकता दी जाई जानी चाहिए. 1975 के आपातकाल और 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बारे में भी इनमें जरूर बताया जाना चाहिए. यह कहना है बीजेपी सांसद और संसद में मिनिस्‍ट्री ऑफ एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विनय सहस्‍त्रबुद्धे का. इंडियन काउंसिल कल्‍चरल रिलेशंस (आईसीसीआर) के प्रमुख होने के तौर पर सहस्‍त्रबुद्धे की यह भी योजना है कि दूसरे देशों की यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को भारतीय छात्र-छात्राओं और भारतीय छात्र-छात्राओं को उनसे मिलवाया जाए ताकि दो लोकतांत्रिक परंपरा समूहों को एक-दूसरे के करीब लाया जा सके. वह बेहतर इतिहास को छात्र-छात्राओं तक पहुंचाने के लिए एनसीईआरटी और आईसीएचआर के संयुक्‍त रूप से काम करने को लेकर भी प्रस्‍ताव दे रहे हैं. न्‍यूज18 के साथ उन्‍होंने इंटरव्‍यू में भारत में एजुकेशन सेक्‍टर के विकास और स्‍कूली पुस्‍तकों से गैर ऐतिहासिक सामग्री हटाने को लेकर बात की...

सवाल: संसद में शिक्षा मंत्रालय समिति के प्रमुख के नाते क्या आप हमें बता सकते हैं कि आपकी प्राथमिकता सूची में शिक्षा के कौन से मुद्दे हैं?



जवाब: जैसा कि अक्‍सर होता है अध्यक्ष संसदीय या स्थायी समितियों के एजेंडे के बारे में निर्णय लेने वाला व्‍यक्ति नहीं होता है. जब हमने पाठ्यपुस्तकों पर चर्चा करने का निर्णय लिया तो संसदीय समिति ने सुझावों को आमंत्रित करते हुए हमारे हैंडल से ट्वीट किया था. यह लोकतांत्रिक तरीके से किया गया था. इस अभ्यास को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कार्यान्वयन के साथ समयबद्ध किया गया है. इसमें सरकार द्वारा कई सुधार किए गए हैं. देश में बहुत सारे सोशल वर्क कॉलेज हैं, लेकिन वे किस तरह के सामाजिक कार्यकर्ताओं को बना रहे हैं? वे कहां जाते हैं और उन्हें किस तरह के करियर के अवसर मिलते हैं? ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है. अगर आप 100 सोशल वर्क कॉलेज को खोलने की अनुमति देते हैं तो यह सामाजिक कार्य के प्रति संपूर्ण दृष्टिकोण को कमजोर करने वाला है. हम इस पर आगामी बैठकों में चर्चा करेंगे.
फिर अन्य चीजें हैं जो महत्वपूर्ण हैं जैसे कि कला, फाइन आर्ट्स के बारे में सीखने के लिए मानकों की शुरुआत करना. भारतीय कॉलेजों में कला और शिल्प के बीच विभाजन हैं. जो भारतीय प्रकृति से अलग हैं. यदि मधुबनी चित्रकार एक कलाकार है, तो तांबे के बर्तन पर एक डिजाइनर काम क्यों नहीं कर सकता है? उन्हें कलाकार क्यों नहीं माना जाता? कला और शिल्प के बीच इस विभाजन को लेकर गहन विश्लेषण की आवश्यकता है.

हम परीक्षा सुधारों पर भी चर्चा करेंगे क्योंकि कक्षा 10 और 12 की परीक्षाओं की तारीखों की घोषणा कर दी गई है. इसलिए हम एक क्वेश्चन बैंक के साथ आने का प्रस्ताव कर रहे हैं. एक प्रश्न बैंक में तीन प्रकार के प्रश्न हो सकते हैं और प्रत्येक प्रकार में 25 प्रश्न होंगे, जो छात्र द्वारा तैयार की जाने वाली चुनौती की व्यापक रूपरेखा प्रदान कर सकते हैं.

सवाल: हर बार जब केंद्र या राज्य सरकार में कोई बदलाव होता है, तो पाठ्यपुस्तक के बदलाव का महत्व बढ़ जाता है. वास्तव में आपके नेतृत्व वाले शिक्षा पैनल ने पाठ्यपुस्तकों में गैर ऐतिहासिक संदर्भों या तथ्‍यों का मुद्दा भी उठाया है. क्या आप इन संदर्भों की व्याख्या कर सकते हैं?

जवाब: जब हम 'गैर ऐतिहासिक संदर्भ' कहते हैं तो हमारा मतलब है कि इतिहासकारों का एक समूह था, जो आर्यन आक्रमण सिद्धांत में विश्वास करता था, लेकिन इन्‍हें इतिहासकारों और यहां तक ​​कि बीआर आंबेडकर जैसे बड़े राजनेताओं द्वारा चुनौती दी गई हैं. इसे खारिज कर दिया गया है. जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, 1995 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को स्वदेशी लोगों के वर्ष के रूप में मनाया गया था. राव की सरकार आश्वस्त नहीं थी और इस विचार को खारिज कर दिया गया कि भारत में सभी स्वदेशी हैं और यहां कोई भी गैर-स्वदेशी लोग नहीं हैं. हमें इसका निरीक्षण क्यों करना चाहिए?

हमने पाया है कि आर्यन आक्रमण सिद्धांत और कुछ और संबंधित मुद्दे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं. हमें इस पर संदर्भों को हटाना होगा. सरस्वती सभ्यता के विषय पर शोध किया गया है, जिसे पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जाना है. हमारी सभ्यता मोहनजो दारो से शुरू नहीं हुई थी. यह बहुत पहले थी, जिसका अध्ययन इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने किया है. हमें इसे शामिल करना होगा.

उत्तर-पूर्व के इतिहास और वहां आजादी के संघर्ष पर बहुत कुछ नहीं लिखा गया है. नागा स्वतंत्रता सेनानी रानी गाइदिनलियू के बारे में कितने जानते होंगे? या जिसने कनकलता के बारे में पढ़ा है जिसने अंग्रेजों को मार डाला और लड़ते हुए मर गया? हमारा देश ही पहले स्थान पर है और पाठ्य पुस्तकों को प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है. इमरजेंसी और पोखरण जैसी घटनाओं को पाठ्यपुस्तकों में विधिवत रूप से प्रस्तुत किया जाना है. सभी सुझावों का अध्ययन करने के बाद रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा.

हम यह भी सिफारिश करेंगे कि भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) को पाठ्यपुस्तक लेखन संबंधी मुद्दे के लिए राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) से परामर्श करना चाहिए. यह महत्वपूर्ण है ताकि हम कुछ विशेष प्रकार के इतिहासकारों पर निर्भर न हों क्योंकि एक विशेष समूह का इतिहास लेखन में वर्चस्व है. (यह अंग्रेजी की खबर का अनुवाद है. इसकी मूल खबर पढ़ने के लिए आप यहां Click कर सकते हैं.)
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