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OPINION : नए-नवेले ट्रैक्टरों पर सवार होकर दिल्ली में उपद्रव मचाने वाले नहीं कहे जा सकते किसान

यह किसानों के विरोध करने का तरीका नहीं है और न ही यह सभी किसानों का नेतृत्व करता है. सैकड़ों किसान संगठनों में से केवल 40 ही इस दौरान शामिल हुए. खास बात है कि इनमें से भी कुछ तो जून 2020 में गठित हुए हैं.  (फोटो: AP)
यह किसानों के विरोध करने का तरीका नहीं है और न ही यह सभी किसानों का नेतृत्व करता है. सैकड़ों किसान संगठनों में से केवल 40 ही इस दौरान शामिल हुए. खास बात है कि इनमें से भी कुछ तो जून 2020 में गठित हुए हैं. (फोटो: AP)

Delhi Violence: नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) ने इन कानूनों को बहुप्रतीक्षित सुधार के तौर पर पेश किया और साथ ही समाधान निकालने के लिए भी तैयार हुई. वहीं, इन कानूनों का वादा करने वाली सभी पार्टियां अब इनका विरोध कर रही हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2021, 1:15 PM IST
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देश रत्न निगम


नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) और भारतीय संविधान (Indian Constitution) शांतिपूर्ण प्रदर्शन (Peaceful Protest) करने की अनुमति देता है, लेकिन ट्रैक्टर रैली (Tractor Rally) के दौरान जो हिंसक नजारा देखने को मिला, वह काफी शर्मनाक था. हमने देखा कि किसान तय रास्ते से हटकर लाल किले में प्रवेश कर रहे हैं और केसरिया ध्वज लहरा रहे हैं. हालांकि, प्रदर्शनकारियों को यह एहसास नहीं था कि उन्होंने लाल किले को अपमानित नहीं किया है, बल्कि पवित्र और सम्मानीय केसरिया ध्वज (निशान साहिब) को भी अपवित्र किया है.

यह किसानों के विरोध करने का तरीका नहीं है और न ही यह सभी किसानों का नेतृत्व करता है. सैकड़ों किसान संगठनों में से केवल 40 ही इस दौरान शामिल हुए. खास बात है कि इनमें से भी कुछ तो जून 2020 में गठित हुए हैं. सैकड़ों किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय किसान संघ कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं. ये प्रदर्शन करीब 3 महीनों से तीन कृषि कानूनों (New Farm Laws) के खिलाफ चल रहे हैं. इन कानूनों में खामियां गिनाए बगैर किसान इन कानूनों को वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार ने इन कानूनों को बहुप्रतीक्षित सुधार के तौर पर पेश किया और साथ ही समाधान निकालने के लिए भी तैयार हुई. वहीं, इन कानूनों का वादा करने वाली सभी पार्टियां अब इनका विरोध कर रही हैं. ऐसे में किसानों और उनके नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की गठित कमेटी या किसी भी कमेटी के साथ बात करने से इनकार कर दिया है. कई दौर की बातचीत के बाद भी कथित किसान नेता नहीं माने हैं. दिल्ली में हिंसा भड़काने वाली ट्रैक्टर रैली का नेतृत्व ऐसे लोग कर रहे थे, जिनकी आप किसान के तौर पर कल्पना भी नहीं कर सकते.



क्या किसान इसी तरह बर्ताव करते हैं? मेरा अनुभव और मुलाकातें कुछ और ही बताती हैं. प्रदर्शन में नेताओं के तौर पर देखे जा रहे लोग किसान नहीं हैं, बल्कि करोड़पति या किसी विचारधारा से प्रेरित हैं. आप इस दौरान योगेंद्र यादव या दर्शन पाल सिंह की मौजूदगी को कैसे समझाओगे? नए ट्रैक्टरों पर मौजूद अभद्र भाषाएं बोलते हुए हथियारबंद प्रदर्शनकारी किसान तो नहीं हो सकते. यह देश को विश्व स्तर पर नीचा दिखाने का प्रयास था.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे किसानों और मजदूरों को भड़का रहे हैं. इसकी जांच होनी चाहिए. वो कह रहे हैं कि किसान चीन से निपट सकते हैं और हमें सेना की जरूरत नहीं है. प्रदर्शनों में जो थोड़ी पवित्रता थी, अब वह भी खो गई है. किसानों ने इस बात को भुला दिया कि सरकार बात करने के लिए तैयार थी. अब इस तोड़-फोड़ के बाद हो सकता है कि उन्हें सरकार के साथ समझौते का मौका न मिले. खास बात है कि सरकार भी किसानों को कृषि कानूनों को लेकर रियायतें देने लगी थी. मुझे इस बात पर भी संदेह होता है कि क्यों कुछ किसान विद्युत सब्सिडी के जरिए सीधे फायदे की बात का विरोध करेंगे. इससे भ्रष्टाचार कम होता है.

हमारे लोकतंत्र में सरकार कानून को रद्द नहीं कर सकती. यह ताकत संसद के पास है. सरकार को लेकर केवल यह किया जा सकता है कि अगर आपको सत्ता पसंद नहीं है, तो अगले चुनाव में उनके लिए मतदान न करें. अब कथित किसान नेताओं को इस बात की चिंता होगी कि सरकार से दोबारा बातचीत कैसे शुरू करें. प्रदर्शन को लेकर कानून साफ है. अगर प्रदर्शन हिंसक होते हैं, तो जिन नेताओं ने प्रदर्शन का आह्वान किया था, तो वे ही सरकारी या निजी संपत्ति के नुकसान के लिए जिम्मेदार होंगे.

विरोधी पार्टियों के पाखंड का पर्दाफाश हुआ है. एक हाथ में तिरंगा और दूसरे हाथ में संविधान रखने के बाद भी वे हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं. किसी ने भी गंभीरता से हिंसा का विरोध नहीं किया. अब सभी राजनीतिक दलों के यह कहने का समय है कि हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और लोकतंत्र को हराने के लिए उपद्रव को अनुमति नहीं दी जाएगी.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, ये उनके निजी विचार हैं)
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