OPINION: गणतंत्र दिवस पर उत्पात: नए ट्रैक्टरों पर बैठे हिंसक प्रदर्शनकारी किसान तो कतई नहीं थे

उन्होंने कहा कि तिरंगा सबसे ऊपर है और वे कभी किसी को इसका अपमान नहीं करने देंगे. (फाइल फोटो- पीटीआई)

उन्होंने कहा कि तिरंगा सबसे ऊपर है और वे कभी किसी को इसका अपमान नहीं करने देंगे. (फाइल फोटो- पीटीआई)

हमने देखा कि प्रदर्शनकारी लाल किले (Red Fort) में घुस रहे हैं और निर्धारित रूट से अलग जा रहे हैं. इसके बाद लाल किले पर निशान साहिब लहराए जाने की घटना हुई. प्रदर्शनकारी ये भूल गए कि उन्होंने लाल किले की इमारत को नुकसान पहुंचाने के अलावा निशान साहिब को भी सम्मान नहीं दिया.

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  • Last Updated: January 29, 2021, 9:00 PM IST
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देशरतन निगम

नई दिल्ली.
देश के सुप्रीम कोर्ट और संविधान ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की छूट दी लेकिन गणतंत्र दिवस (Republic Day) पर देश की राजधानी के हिंसक दृश्य (Violent Scene) शर्मनाक थे. हमने देखा कि प्रदर्शनकारी लाल किले में घुस रहे हैं और निर्धारित रूट से अलग जा रहे हैं. इसके बाद लाल किले पर निशान साहिब लहराए जाने की घटना हुई. प्रदर्शनकारी ये भूल गए कि उन्होंने लाल किले की इमारत को नुकसान पहुंचाने के अलावा निशान साहिब को भी सम्मान नहीं दिया.

बड़ी संख्या में किसान संगठन कर रहे नए कानून का समर्थन

ये किसानों के प्रदर्शन का तरीका नहीं है और न ही ये प्रदर्शनकारी किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं. देश के सैकड़ों किसान संगठनों में से सिर्फ 40 प्रदर्शन कर रहे हैं. उनमें से भी कुछ जून 2020 में बनाए गए हैं. भारतीय किसान संघ समेत कई संगठन नए कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं. इसलिए सच्चाई इस किसान आंदोलन से बिल्कुल अलग है.
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कई राउंड की हुई बातचीत लेकिन बिंदुवार चर्चा के बजाए सिर्फ कानून वापसी पर जोर

किसान आंदोलन चलते हुए तकरीबन तीन महीने का समय होने वाला है. इस बीच केंद्र की मोदी सरकार लगातार कहती रही है कि ये सुधार काफी समय से लंबित थे. ये जल्दबाजी में नहीं बल्कि लंबे समय के सोच-विचार के बाद बनाए गए हैं. 40 किसान संगठन प्रदर्शन तो कर रहे हैं लेकिन उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया. सरकार के साथ कई राउंड की बातचीत हुई लेकिन सब व्यर्थ रहा क्योंकि किसान नेताओं की तरफ से लगातार सिर्फ कानून वापसी की बात हुई. इसके बाद विशाल ट्रैक्टर रैली हुई जिसमें ऐसे लोगों ने हिंसा की जो किसी भी रूप में किसानों के प्रतिनिधि नहीं हैं.



कोई प्रदर्शन हिंसक होता है तो जिन्होंने प्रदर्शन बुलाया उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है

हमारे लोकतंत्र में सरकार कानून वापस नहीं ले सकती. ये अधिकार संसद के पास है कि वो कानून वापस ले सके. सरकार सिर्फ एक्सक्यूटिंग एजेंसी है. अगर आपको सरकार के काम पसंद नहीं हैं तो अगले चुनाव में आप उस पार्टी को वोट नहीं देकर अपना गुस्सा जाहिर कर सकते हैं. रही बात विरोध प्रदर्शन की तो कानून इसके लिए बिल्कुल साफ है. अगर कोई प्रदर्शन हिंसक होता है तो जिन नेताओं ने प्रदर्शन बुलाया उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.) 

(सुप्रीम कोर्ट के वकील देशरतन निगम का ये पूरा लेख अंग्रेजी में है. इसे यहां क्लिक कर मूलस्वरूप में पढ़ा जा सकता है.)
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