क्या है डबल म्यूटेंट कोरोना वायरस, क्यों है ज्यादा जानलेवा?

वैक्सीन या टीका वायरस के किसी भी वेरिएंट के खिलाफ सुरक्षा प्रदान कर सकती है जो संक्रमित करने में बहुत ताकतवर होता है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

वैक्सीन या टीका वायरस के किसी भी वेरिएंट के खिलाफ सुरक्षा प्रदान कर सकती है जो संक्रमित करने में बहुत ताकतवर होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

इस वैश्विक महामारी के शुरूआती दिनों से ही CCMB यह पता करने में लगी रही है. यह INSACOG ( Indian SARS -CoV -2 Genomic Consortia) का महत्वपूर्ण अंग भी है जोकि 10 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का एक संघ है जो देश भर में अलग-अलग वायरस वेरिएंट की निगरानी कर रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 24, 2021, 6:17 PM IST
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नई दिल्ली. कुछ महीने पहले, जब हमने 600 भारतीय आइसोलेट्स (नमूने) का विश्लेषण किया, तो हमें 7500 वेरिएंट मिले - इसका अर्थ यह है कि अगर कोई भी वायरस मौजूद है तो हर अगले दिन उसका नया वेरिएंट होगा. दूसरी अन्य लेबोरेटरी की तरह, आणविक जीवविज्ञान केंद्र CCMB ( सेण्टर फॉर सेलुलर & मॉलिक्यूलर बायोलॉजी) भी SARS -CoV -2 वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग में लगी हुई है और इस वायरस के जीनोम में होने वाले परिवर्तनों की पहचान करने का प्रयास कर रही है. CCMB यह भी पता लगता है कि क्या वायरस के इन वेरिएंट के बारे में जानना जरूरी है और क्या यह चिंताजनक भी हैं. इस वैश्विक महामारी के शुरूआती दिनों से ही CCMB यह पता करने में लगी रही है. यह INSACOG ( Indian SARS -CoV -2 Genomic Consortia) का महत्वपूर्ण अंग भी है जोकि 10 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का एक संघ है जो देश भर में अलग-अलग वायरस वेरिएंट की निगरानी कर रहा है.

हमारा पहला प्रयास है कि हम नए वेरिएंट को ज्यादा लोगों में प्रवेश करने से रोकें. उदाहरण के तौर पर, यदि विदेश से कोई यात्री हैदराबाद आता है और कोविड -19 पॉजिटिव पाया जाता है, तो उसके वायरस के वेरिएंट का प्रकार जानने के लिए उस यात्री का नमूना (sample) जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए CCMB भेजा जाता है. इसी पर आधारित यह फैसला लिया जाता है कि उस व्यक्ति को अस्पताल भेजा जाएगा या घर पर ही क्वारंटाइन किया जाएगा. हमने सैकड़ों नमूनों में यूके वेरिएंट्स की पहचान की है-उसके बाद, व्यक्ति को एक बड़े समुदाय के साथ घुलने-मिलने और संक्रमण फैलाने से रोका गया. वास्तव में, तेलंगाना ने यूके वेरिएंट के प्रसार की रोकथाम के मामले में बहुत अच्छा काम किया है. हालांकि, हवाई अड्डों पर कई मामलों की पहचान न किए जाने के कारण वायरस का यह यूके वेरिएंट पंजाब में बड़े स्तर पर समुदायों में प्रवेश कर गया.

दूसरा, जब हमें कोई ऐसा वेरिएंट मिलता है जो चिंता का कारण हो तो हम इसका प्रयोगशाला में संवर्धन (culture) करते हैं और समझने का प्रयास करते हैं कि इस वायरस में ऐसी कोई विशेषताएं हैं जिनके बारे में हमें चिंता करने की आवश्यकता है. हम तब पूछ सकते हैं कि क्या वायरस वैक्सीन के लिए प्रतिक्रिया देगा, अगर इसमें मौजूदा वेरिएंट से ज्यादा दुबारा से संक्रमित करने की कोई प्रवृत्ति है. मौजूदा समय में हम यह अध्ययन B.1. 617 ( प्रचलित रूप में भारतीय डबल म्युटेंट) के बारे में कर रहे हैं.

आने वाले कुछ दिनों में, हमें पता चलेगा कि हमें वायरस के इस वेरिएंट के बारे में चिंता करने की आवश्यकता है या नहीं. यह कहते हुए कि इस समय यह B.1.617 की तरह नहीं दिखता है, भारी चिंता का विषय होगा क्योंकि हमें बहुत सारे पुन: संक्रमण के मामले नहीं मिले हैं जो टीका संरक्षण का एक संकेत है. टीका और वायरस की प्रसार क्षमता ( VACCINE & VIRULENCE) : वैक्सीन और वायरुलेन्स दो अलग अलग चीजें हैं. वाइरुलेन्स का अर्थ है कि वायरस फैलने में कितना समर्थ है, कितना संक्रामक है. वैक्सीन या टीका वायरस के किसी भी वेरिएंट के खिलाफ सुरक्षा प्रदान कर सकती है जो संक्रमित करने में बहुत ताकतवर होता है. इसलिए वह व्यक्ति जिसने वैक्सीन की सुरक्षा नहीं ली है उन्हें संक्रमण बहुत आसानी से हो सकता है- हालांकि वैक्सीन लिए हुए लोग भी संक्रमित हो सकते हैं, लेकिन वह लोग इस बीमारी की भयावहता और अस्पताल में भर्ती होने से बचे रहेंगें.
हम क्या परीक्षण कर रहे हैं- टीकाकरण / पूर्व संक्रमण द्वारा प्राप्त प्रतिरक्षा क्या इस वैरिएंट से हमारी रक्षा करते हैं, और यदि यह सुरक्षा नाकाफी है और यदि है तो किस हद तक. इस परीक्षण से यह पता नहीं चलेगा कि B.1.617 ज्यादा संक्रामक है या नहीं, यह डाटा महामारी विज्ञान ( एपिडेमियोलॉजी ) से पता चलेगा. लेकिन इस वायरस के साथ हमें क्या करना होगा जो हमनें दूसरे वेरिएंट के साथ किया, वह था वायरस की चेन को तोडना- मास्क लगाइये और सोशल दूरी बनाये रखिये.

वायरस के संस्करण और महामारी की लहर

विषाणु हर समय उत्परिवर्तित या म्यूटेट होते रहते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर का कोई परिणाम नहीं हैं. केवल जब उनमें से कुछ अधिक दिखाई देने लगते हैं, तो हम इसे वह वेरिएंट मानते हैं जिसके बारे में रूचि दिखाई जा सकती है या जिसकी फ़िक्र की जा सकती है. कुछ महीने पहले, जब हमने लगभग 6000 भारतीय आइसोलेट्स (नमूने) का विश्लेषण किया, तो हमें 7500 से अधिक वेरिएंट मिले-जिसका मतलब है यदि कोई भी वायरस मौजूद है तब हर अगले दिन उसका नया वेरिएंट मिलेगा ही.



हम जानते हैं कि एक ही तरीका है जिससे वेरिएंट अपने डोमेन का विस्तार करता है, हम जानते हैं और हम इसे रोक सकते हैं. उदाहरण के लिए, UK का वेरिएंट UK में एक समस्या बन गया था, और उस देश ने प्रतिबंध, तालाबंदी और टीकाकरण में तेजी लाई, और अब, ट्रांसमिशन की श्रृंखला टूट गई है. वेरिएंट अपना काम करेगा, लेकिन मानव व्यवहार सबसे बड़ा कारण है. बड़े बड़े कार्यक्रमों के एक साथ आयोजित होने के कारण जैसे -चुनाव, धार्मिक जुटान, शादियां- संक्रमण में वृद्धि अपेक्षित थी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह किस वेरिएंट के कारण हुआ.

और संक्रमण की यह लहर फिर लौटेगी. लेकिन इस लहर की तीव्रता और आकार इंसानों के व्यवहार पर निर्भर करेगी. लोगों को उम्मीद है कि वर्तमान समय में मौजूद वायरस की अधिकता के दूसरे पक्ष को देखेंगे, बशर्ते वे कोविद उपयुक्त व्यवहार का पालन करें.

हालांकि सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब भारत में इस वायरस का सबसे बड़ा संग्रह है. ज्यादा से ज्यादा लोगों का संक्रमित होना मतलब वायरस के पास उत्परिवर्तित (mutate) होने के ज्यादा अवसर होना. लाखों वेरिएंट्स में से, एक घातक वैरिएंट हो सकता है जो टीकों के लिए प्रतिरोधी है. इसलिए, वायरस के प्रसार को रोकना महत्वपूर्ण है.

सही वायरस की सिक्वेंसिंग

ध्यांन देने लायक दो बातें हैं: कितने सैंपल की सिक्वेंसिंग की जानी चाहिए और इन सैंपल को कैसे चुना जाए ?

सामान्यतया, पांच प्रतिशत एक अच्छा नंबर है लेकिन यदि कुल नमूनों ( एक दिन में आने वाले मामलों की संख्या) में से हम 2 -3 प्रतिशत की सिक्वेंसिंग करें, तब वेरिएंट की जल्द पहचान करने के लिए हम अच्छी स्थिति में होंगें. इस स्तर पर सिक्वेंसिंग करने के लिए हमारे पास क्षमता है बशर्ते नमूने प्रयोगशाला में पहुंचें, जो लाने का एक मुद्दा है. अस्पताल पहले ही अपनी क्षमता पार कर चुके हैं और सैंपल को इकठ्ठा करना, सुरक्षित रखना, और उन्हें राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में भेजना अस्पतालों के लिए अतिरिक्त भार है जो लोगों का जीवन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

दूसरा हिस्सा है कि सिक्वेंसिंग के लिए सैंपल को कैसे चुना जाए. हम एक ही इलाके से बहुत सारे नमूने नहीं ले सकते. यह नमूने अलग अलग भौगोलिक स्थानों से लिए जाने चाहिए- यह केवल शहरों से ही नहीं आने चाहिए, बल्कि छोटे कस्बों से भी आने चाहिए क्योंकि चिंताजनक वेरिएंट कहीं भी हो सकता है. ऐसे नमूने जो प्रासंगिक हैं वह हवाई अड्डों, सुपर स्प्रेडर आयोजनों और पुनः संक्रमण के मामलों से आने चाहिए.

ऐसा कहते हुए हम इस दिशा में काम कर रहे हैं -हमने डबल म्युटेंट को पहचान लिया है. लेकिन, निश्चित रूप से, हमें इसे बड़े पैमाने पर करना चाहिए क्योंकि यह हमें जल्दी से एक नए संस्करण का पता लगाने में मदद करेगा, हम इसे प्रारंभिक अवस्था में ख़त्म कर सकते हैं और इसे फैलने से रोक सकते हैं.

B.1.617 और टीका प्रभावकारिता

B.1.617 वेरिएंट सात से आठ राज्यों में फ़ैल चूका है. विदर्भ के अतिरिक्त, हमने इसे उस नमूने में भी पाया जो नागपुर से सीक्वेंस किया गया था. यह तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी पाया गया, लेकिन इन राज्यों में इस वेरिएंट से प्रभावित मामले दो प्रतिशत से भी कम आये.

B.1.617 पर हमारे अध्ययन के एक हिस्से के रूप में, हम हवाई अड्डों, अस्पताल से नमूनों का अनुक्रमण (सिक्वेंसिंग) कर रहे हैं, साथ ही इस संक्रमण के व्यवहार को समझने के लिए पुन: संक्रमण के मामलों को भी देखते हैं, यदि यह कोई नया गुण प्रदर्शित कर रहा है या इसका नया रूप किसी दूसरे प्रकार के वेरिएंट से मिलता जुलता है.

हम अनेकोंअनेक मरीजों के नमूनों का संवर्धन कर रहे हैं, हम वायरस के साथ सेल को संक्रमित करेंगे और साथ ही दूसरे मरीज से सीरम जोड़ेंगे जो संक्रमण से उबर चुके हैं या जिन्होंने टीका की दोनों खुराक ली है. यदि सीरम मिलाने के साथ ही वायरस की वृद्धि रूक जाती है, इसका अर्थ है कि वैक्सीन काम कर रही है. आने वाले एक या दो हफ़्तों में हमें परिणाम पता चल जायेंगें.
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