देश में शैक्षिक असमानता की बात करती है 'विजन ऑफ एजुकेशन इन इंडिया', सीएसडी ने लॉन्‍च की किताब

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Updated: September 2, 2019, 8:18 PM IST
देश में शैक्षिक असमानता की बात करती है 'विजन ऑफ एजुकेशन इन इंडिया', सीएसडी ने लॉन्‍च की किताब
सामाजिक विकास परिषद (CSD) ने सोमवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किताब 'विजन ऑफ एजुकेशन इन इंडिया' को लॉन्‍च किया.

आकार बुक्‍स द्वारा प्रकाशित किताब 'विजन ऑफ एजुकेशन इन इंडिया' नेशनल बिल्डिंग मैट्रिक्‍स, लोकतांत्रिक प्रक्रिया, शक्ति, सामाजिक व आर्थिक बंटवारे और सामाजिक ताने-बाने के आधार पर देश के शिक्षा क्षेत्र की समीक्षा की वकालत करती है.

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असमानता (Inequality) एक ऐसा तथ्‍य है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) का कोई क्षेत्र अछूता नहीं है. शिक्षा क्षेत्र (Education Sector) भी इस मामले में अपवाद नहीं है. भारतीय शिक्षा क्षेत्र में असमानता लगातार बढ़ रही है, जबकि उम्‍मीद की जा रही थी कि इसमें सुधार होगा. हालांकि, हमारे देश में दशकों बाद इस समय एक नई शिक्षा नीति (Education policy) का मसौदा तैयार किया जा रहा है. एक मजबूत नीति बनाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में गहरे उतरने की दरकार है. यहां पर 'विजन ऑफ एजुकेशन इन इंडिया' (Vision of Education in India) जैसी किताब प्रासंगिक है. इस किताब का संपादन सामाजिक विकास परिषद (CSD) के अध्‍यक्ष व शिक्षाविद् प्रोफेसर मुचकंद दुबे और सीएसडी में सहायक प्रोफेसर डॉ. सुसमिता मित्रा ने किया है.

किताब के विमोचन के बाद शिक्षाविदों ने चर्चा में लिया हिस्‍सा
सीएसडी ने सोमवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में इस किताब को लॉन्‍च किया. इसके बाद किताब के संपादकों के साथ ही दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय (Delhi University) के सेंट्रल इंस्‍टीट्यूट ऑफ एजुकेशन में प्रोफेसर श्‍यान मेनन, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्‍लानिंग एंड एडमिनिशट्रेशन (NUEPA) के शिक्षा नीति विभाग के प्रमुख प्रोफेसर अविनाश कुमार सिंह, टाटा ट्रस्‍ट (Tata trust) में पॉलिसी एंड एडवोकेसी की प्रमुख शिरीनवकील मिलर, जामिया मिलिया इस्‍लामिया के सेंटर फॉर स्‍टडी ऑफ सोशल एक्‍सक्‍लूजन एंड इंक्‍लूसिव पॉलिसी में असिस्‍टेंट प्रोफेसर डॉ. हेम बोरकर ने पैनल डिस्‍कशन में चर्चा की. पैनल डिस्‍कशन की अध्‍यक्षता सीएसडी में प्रोफेसर आर. गोविंद ने की.

देश के शिक्षा क्षेत्र की समीक्षा की वकालत करती है किताब

आकार बुक्‍स द्वारा प्रकाशित यह किताब नेशनल बिल्डिंग मैट्रिक्‍स, लोकतांत्रिक प्रक्रिया, पहचान, शक्ति, सामाजिक व आर्थिक बंटवारे और सामाजिक तानेबाने के आधार पर देश के शिक्षा क्षेत्र की समीक्षा की वकालत करती है. साथ ही कहती है कि यह समीक्षा वैश्‍वीकरण और नव-उदारवाद के पैमाने पर की जाए. पांच खंडों में बंटी इस किताब में 15 विशेषज्ञों, लीडिंग एकेडमिक्‍स व एक्टिविस्‍ट्स ने योगदान दिया है. इनमें मेधा पाटकर, प्रभात पटनायक, जेएनयू में अर्थशास्‍त्र के प्रोफेसर एमेरिट्स, हैदराबाद विश्‍वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर जी. हरगोपाल, एनयूईपीए के पूर्व कुलपति जेबीजी तिलक और किताब के संपादक शामिल हैं.

आजादी के बाद हमारी शिक्षा नीति और पद्धति में हुआ बदलाव
किताब में प्राचीन काल से शिक्षा को लेकर दूरदर्शिता की यात्रा का जिक्र किया गया है. शिक्षा को लेकर दूरदर्शिता बौद्ध काल में अपने चरम पर थी. इसके बाद उपनिवेश काल में इसमें आमूल-चूल बदलाव हुआ. आजादी के बाद हमारी शिक्षा नीति और पद्धति में काफी बदलाव हुआ. इस दौरान हमारी शिक्षा नीति पर वैश्‍वीकरण और नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों का काफी असर पड़ा. भारत जैसे बहुलवादी समाज में हर किसी की जरूरत और महत्‍वाकांक्षाओं को संतुष्‍ट कने वाली किसी एक शिक्षा नीति को चुनना करीब-करीब असभव है. किताब के विमोचन के दौरान प्रोफेसर मेनन ने योगदान करने वाले और संपादकों की तारीफ करते हुए कहा कि यह किताब सरकारी नीतियों और दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है.
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First published: September 2, 2019, 8:15 PM IST
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