OPINION | क्या जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत का नेतृत्व करने के लिए एक उपयुक्त विकल्प थे?

OPINION | क्या जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत का नेतृत्व करने के लिए एक उपयुक्त विकल्प थे?
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (PTI)

जवाहरलाल नेहरू ने एक बार डॉ. राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में उन पांच आदमियों के बारे में बात की तो जो गांधी के सबसे करीबी थे. इन दो दिग्गजों के अलावा, राजाजी, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी गांधी के भरोसेमंद साथी थे.

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(आदित्य कृष्ण)

क्या जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत का नेतृत्व करने के लिए एक उपयुक्त विकल्प थे? यह एक ऐसा सवाल है जो दशकों से भारतीय बुद्धिजीवियों को परेशान करता रहा है.पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मंच साझा करते हुए गुजरात के तत्‍कालीन मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, 'देश को हमेशा एक गिला शिकवा रहेगा, एक दर्द रहेगा... हर हिंदुस्तानी के दिल में ये दर्द रहेगा कि काश सरदार साहब हमारे पहले प्रधानमंत्री होते तो आज देश की तस्वीर भी अलग होती, तक़दीर भी अलग होती. इस बयान ने नेहरूवादियों के बीच मानो भूकंप ही ले आया था, लेकिन यह बात नई नहीं थी.

जवाहरलाल नेहरू ने एक बार डॉ. राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में उन पांच आदमियों के बारे में बात की तो जो गांधी के सबसे करीबी थे. इन दो दिग्गजों के अलावा, राजाजी, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी गांधी के भरोसेमंद साथी थे.गांधी ने निश्चित रूप से नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बनाने से पहले, उनमें से हर एक के बारे में सोचा होगा.आइए एक-एक करके इस मुद्दे का विश्लेषण करते हैं.



नरेंद्र मोदी से लगभग 40 साल पहले, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल और जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के स्वतंत्रता अभियान के सहयोगी ने भी नेहरू और पटेल के बारे में अपनी पत्रिका स्वराज्य में विवरण दिया था.राजाजी ने लिखा था, "निस्संदेह यह बेहतर होता अगर नेहरू से विदेश मंत्री बनने के लिए कहा जाता और पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता. मैं भी यह मानते हुए त्रुटि में पड़ गया था कि जवाहरलाल उन दोनों लोगों में से अधिक प्रबुद्ध व्यक्ति थे. इसलिए यह सबसे अच्छा होगा कि वह प्रधानमंत्री बने" (स्वराज्य, 27.11 1971).
हालांकि, अगर हम इतिहास के पन्नों को ध्यान से देखें, तो हम नरेंद्र मोदी और राजाजी के आकलन और दावों को पलट सकते हैं. हमारे सामने इतिहास एक विपरीत तस्वीर उभारती है.गांधी ने राजाजी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में 1927 में देखा था. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था, "मैं कहता हूं कि वह (C.R) एकमात्र संभावित उत्तराधिकारी हैं." यह वही साल था जब महात्मा गांधी और राजाजी दोनों को पता चला था कि उनके सम्मानित बच्चे, देवदास गांधी और लक्ष्मी एक-दूसरे से विवाह करना चाहते थे.दोनों पक्षों के संबंधित पिताओं ने अपने बच्चों से अपने प्यार को साबित करने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं किया, क्योंकि राजाजी परिवार के सदस्य बन जाते और राजाजी को उत्तराधिकारी बनाने का मतलब परिवार के किसी सदस्य को मशाल पारित करना था.

गांधी को इसमें संदेह था. हालांकि, भारत की बहुसंख्यकों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी पर राजाजी की खराब कमान भी एक बड़ी बाधा थी. गांधी से ज्यादा भारत की समस्याओं के बारे में कोई अन्य मानव जागरूक नहीं था और वह अनपढ़ बहुमत वाले देश में भाषा के महत्व को समझते थे.

राजेंद्र प्रसाद या राजेन बाबू के नाम से प्रसिद्ध, बिहार के परंपरावादी और सौम्य राजनीतिज्ञ थे. राजाजी के ऊपर उन्हें भाषा का तो लाभ था, लेकिन उनमें राजाजी या नेहरू के करिशमाई छवि की कमी भी थी.मौलाना आज़ाद, राजाजी या जवाहरलाल नेहरू की तरह ही एक उत्कृष्ट वक्ता थे और राजाजी और नेहरू की तरह हिंदू-मुस्लिम एकता के शानदार प्रतिक भी थे, लेकिन वे लोगों से बहुत ही अलग थलग रहते थे.


नेहरू ने एक साक्षात्कार में कहा था, “वह भीड़ से डरते थे और ऊधम से दूर रहते थे. हमें जबरन उन्हे साथ ले जाना पड़ता था... वह अपने स्वयं के मामलों में ही इतना व्यस्त रहते थे कि लोग उन तक आसानी से नहीं पहुंच सकते थे. वह लोगों से अच्छी तरह से मिलते तो थे, लेकिन उनके सामने जल्दी खुलते नहीं थे. उनसे करीबी रिश्ते नहीं बनाते थे ”(पंडितजी-पोटाने विशे, रामनारायण चौधरी द्वारा संपादित और करिम्भाई वोरा, नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, 2013 द्वारा अनुवादित. पृष्ठ 55-56).

इस प्रकार अब सिर्फ सरदार बचे. उन्हें एक बार मौलाना शौकत अली ने "बर्फ में ज्वालामुखी" कहा था. वह कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े आयोजक और संचालक थे,लेकिन नेहरू की तुलना में उनकी परिस्थिति भी कुछ प्रतिकूल थी .

सरदार, नेहरू से 14 साल बड़े थे, और गांधी और पटेल दोनों हमेशा खुद को ऐसे पुरुषों के रूप में देखते थे, जो भारत को आजाद तो करेंगे पर आगे युवा पीढ़ी को इसके प्रबंधन का भार छोड़ देंगे. 1931 में कराची में पटेल में एक कांग्रेस सत्र की अध्यक्षता करते हुए, भारत के युवाओं को इस बारे में जोर भी दिया था . “गांधी अब लगभग 63 साल के हैं। मैं 56 वर्ष का हूं. क्या हम, बूढ़े, आजादी के लिए उत्सुक होंगे या आप, युवा? हम मरने से पहले भारत को स्वतंत्र देखने में रुचि रखते हैं. (पटेल ए लाइफ : राजमोहन गांधी, पृष्ठ संख्या 205).जब गांधी से एक ब्रिटिश पत्रकार ने 6 मार्च 1931 को उनसे पूछा था कि क्या वह भविष्य की सरकार के प्रधानमंत्री होंगे, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “यह युवा दिमाग और मजबूत दिलों के व्यक्ति के लिए आरक्षित होगा. (मोहनदास :राजमोहन गांधी, पृष्ठ संख्या 350).


1930 के दशक के उत्तरार्ध से और भारत छोड़ो आन्दोलन के बाद, पटेल का स्वास्थ्य प्रधानमंत्री का भार उठाने के लिए बहुत कमजोर था. गांधी और पटेल के पत्रचार से पटेल के बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में पता चलता हैं, 23 जुलाई 1946 को पटेल को एक पत्र में गांधी ने कहा, “मैं आपके स्वास्थ्य पर बिल्कुल सहमत नहीं हूं। आपको इसके बारे में कुछ करना होगा. किसी भी स्थिति में, आपको अपने स्वास्थ्य को खराब नहीं होने देना चाहिए. ”(माइ लैटर, एमके गांधी, प्रोफेसर प्रसून द्वारा संपादित, पृष्ठ संख्या 91).पटेल के पास नेहरू का व्यक्तित्व नहीं था, नेहरू एक ऐसे चेहरा थे ज़िसे पहले भारत के युवाओं ने. फिर पूरे देश की जनता ने गांधी के बाद भारत का सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया था. नेहरू ने अलग-अलग लोगों से अलग- तरह से जुड़ाव कर लिया था .


टैगोर जैसे बुद्धिजीवी के लिए, नेहरू का "युवा भारत के सिंहासन के लिए निस्संदेह दावा" था, क्योंकि उनका "दृढ़ संकल्प अदम्य था और साहस अटूट था" और उन्हें बुलंद ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए वह "नैतिक सत्य और बौद्धिक चरित्र का अटूट पालन" करते थे.

सुभास बोस ने भी इसी तरह की भावनाओं को साझा किया. अपनी आत्मकथा में, वह नेहरू की लोकप्रियता और उनकी विशिष्टता के बारे में बात करता है, "यह कहना सही होगा कि जब उनका (नेहरू का) दिमाग क्रांतिकारीयों के साथ है, पर उनका दिल महात्मा गांधी के साथ है." वह सभी महत्वपूर्ण नेताओं के बारे में बाद में बात करते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं कि इन सभी के बीच जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता सामान्य रूप से "सर्वाधिक " हैं.(द इंडियन स्ट्रगल, सुभाष चंद्र बोस, सिसीर बोस और बोस और सुगाता बोस,द्वारा संपादित,पृष्ठ संख्या 33) उन्होंने अपने 4 मार्च 1936 के पत्रचार में नेहरू से कहा था, "आज कांग्रेस के फ्रंट-रैंक के नेताओं में से आप केवल एक हैं, जिन्हें हम प्रगतिशील दिशा में कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए देख सकते हैं." (ऐ बन्च ऑफ ओल्ड लेटर, पृष्ठ संख्या 172).


एक और बात गांधी जानते थे कि पटेल दूसरा स्थान ग्रहण कर लेंगे पर, उन्हें यह भी पता था कि नेहरू का विद्रोही स्वभाव और अपार लोकप्रियता उन्हें दुसरा स्थान ग्रहण करना मुश्किल बना देती. महात्मा ने एक बार कहा था कि जवाहर दूसरा स्थान नहीं लेगा. (राजमोहन गांधी द्वारा द गुड बोट्मन , पृष्ठ संख्या 379).

नेहरू का सेक्युलर आउटलुक सरदार पटेल को अल्पसंख्यक समाज और उसमें भी विशेष रूप से मुसलमान समाज हिंदू की तरह देखता था और नेहरू के वही सभी अल्पसंख्यक समाज एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में देखता था.

विभाजन के बाद इन समाजों को पटेल की तुलना में नेहरू पर अधिक भरोसा था, हालांकि गांधी जानते थे कि "सरदार के पास सभी को समायोजित करने के लिए पर्याप्त दिल है" (पटेल ए लाइफ,राजमोहन गांधी ,पृष्ठ संख्या 465). उन्हें यह भी पता था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के सवाल पर नेहरू की प्रतिबद्धता दूसरों की तुलना में कहीं अधिक थी.

पटेल की तुलना में वैश्विक मामलों में नेहरू की बेहतर पकड़ थी. इसे स्वीकार करते हुए, पटेल ने कहा, "पंडित नेहरू ने हमेशा यह विचार रखा था कि भारतीय समस्या विश्व समस्या का एक हिस्सा है, लेकिन ऐसे समय में एकमात्र उचित व्यक्ति जो भारतीय आकांक्षाओं का प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व कर सकता था. वह थे पंडित जवाहरलाल नेहरू (नेहरू / पटेल एग्रीमेंट विथ डिफरन्स 1933__1950 नीरजा सिंह पृष्ठ संख्या, 26_27 द्वारा संपादित).

यह कहकर कि गांधी ने नेहरू के उत्तराधिकार के पक्ष में विभिन्न अप्रत्यक्ष संदर्भों पर जोर दिया था. 13 साल पहले जब गांधी ने महसूस किया कि वह बूढ़े हो रहे हैं, तो उन्होंने कहा था , "मुझे बुढ़ापा आ रहा है" (नवजीवन, 15 दिसंबर 1929, महात्मा गांधी के संग्रहित कार्य, खंड 48, पृष्ठ संख्या 92). ग्यारह दिन बाद जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुना गया और गांधी के शब्दों से स्पष्ट होता है कि उन्होंने उस समय से नेहरू को उत्तराधिकारी के रूप में देखा था. उसने उसे अपने प्रभाव में संवारना शुरू कर दिया था, ताकि उसके उत्तराधिकारी का अपना मन हो और फिर भी उसे जड़ों से अलग न किया जाए.

इस प्रकार गांधी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बहादुरी में उन्हें पार नहीं किया जाना है. देश के प्रति प्रेम में उसे कौन उकसा सकता है? वह क्रिस्टल के रूप में शुद्ध है; वह संदेह से परे सच्चा है. वह शूरवीर हैं, मयूर हैं, संत हैं. द नेशन उसके हाथों में सुरक्षित है." (यंग इंडिया, यूथ ऑन ट्रायल, 3 अक्टूबर, 1929).


गांधी के खिलाफ एक आरोप यह है कि उन्होंने भारत पर जवाहरलाल नेहरू को बढ़ावा दिया. यह भ्रामक है. अपनी व्यक्तिगत पसंद के अलावा, नेहरू ने लोगों के दिलों का पुरस्कार भी 'जीता' था. अगस्त 1929 को मोतीलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में गांधी ने वादा किया था, "मैं देश पर उसको कभी जबरदस्ती नहीं रखूंगा" (मेरे पत्र, एमके गांधी, प्रोफेसर प्रसून द्वारा संपादित, पृष्ठ संख्या 40).

गांधी ने 1929 में ऐसा नहीं किया और उन्होंने निश्चित रूप से 1946 में ऐसा नहीं किया, जब बहूत से प्रांतीय कार्यसमिति सरदार पटेल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे. इसका उत्तर एक पटेल समर्थक नेता डीपी मिश्रा द्वारा दिया गया है, जिन्होंने लिखा था, "जब हम महाकोशल (सी.पी. के हिंदी क्षेत्र) के सदस्य थे तो पीसीसी ने उन्हें (पटेल) कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू की जगह पसंद किया था, हमारा कोई इरादा नहीं था, नेहरू को भविष्य के प्रीमियर से वंचित करना उम्र में छोटे व्यक्ति (नेहरू) को पहले ही तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय में खड़ा किया गया था और इसलिए हमने यह उचित समझा कि उम्र में बड़े आदमी (पटेल) के पास कम से कम दूसरा मौका होना चाहिए.

ज़हां तक मुक्त भारत के प्रीमियर का संबंध था, हमारे पास हमेशा एक अस्पष्ट विचार था कि महात्मा द्वारा उनके उत्तराधिकारी के रूप में घोषित किए जाने के बाद, नेहरू स्वतंत्रता की सुबह में उस पद की गरिमा बढ़ाने के लिए बाध्य थे. इसलिए, जब पटेल महात्मा के कहने पर प्रतियोगिता से हट गए, तो हमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई." (राजमोहन गांधी द्वारा पटेल ए लाइफ, पृष्ठ संख्या 372).

इसलिए गांधी ने लोगों की इच्छा का पालन किया और किसी को पटेल से ज्यादा इसकी जानकारी नहीं थी. गांधी ने 1934 में अपने पटेल के साथ पत्राचार में कहा था, "जवाहरलाल ... भविष्य में संगठन के सबसे सही सहायक होने के लिए बाध्य हैं" (पटेल ए लाइफ, राजमोहन गांधी, पृष्ठ संख्या 247). जब उन्हें नेहरू द्वारा "भारत के पहले कैबिनेट में सबसे मजबूत स्तंभ" के रूप में आमंत्रित किया गया, तो सरदार ने 3 अगस्त 1947 को नेहरू को एक पत्र में लिखा, "एक दूसरे के लिए हमारा लगाव और स्नेह और एक अखंड अवधि के लिए हमारा कॉमरेडशिप."


लगभग 30 साल तक कोई औपचारिकता नहीं मानता. मेरी सेवाएं आपके निपटान में होंगी, मुझे आशा है, मेरे जीवन के बाकी हिस्सों के लिए और आपके पास मेरे लिए निर्विवाद निष्ठा और वफादारी होगी, जिसके लिए भारत में किसी भी व्यक्ति ने उतना बलिदान नहीं किया है जितना आपने किया है. हमारा संयोजन अटूट है और इसमें हमारी ताकत निहित है. ”(नेहरू / पटेलएग्रीमेंट मी डिफरन्स 1933__1950,पृष्ठ संख्या, 16,नीरजा सिंह द्वारा संपादित).

सरदार ने कई मौकों पर स्पष्ट रूप से कहा था कि उस समय भारत का नेतृत्व करने वाले सबसे बेहतर व्यक्ति नेहरू ही थे .
"इस लिहाज़ से यह ज़रूरी था कि आज़ादी के ठीक पहले के धुंधलके में वे हमें राह दिखाने वाले प्रकाश बने। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब भारत को एक के बाद एक संकट से गुज़रना पड़ा तब उन्हें ही हमारी आस्था का रक्षक हमारे श्रेष्ठतम योद्धाओं का नेता होना था। मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता कि हमारे अस्तित्व के पिछले वर्षों के कठिन वक्त में देश के लिए उन्होंने कैसी कड़ी मेहनत की है."(नेहरू अभिनंदन ग्रन्थ, 14 अक्टूबर 1949).

एक अन्य अवसर पर, उन्होंने महात्मा गांधी के निर्णय को सही ठहराया. गांधी ने पंडित नेहरू को अपना उत्तराधिकारी और उत्तराधिकारी नामित किया. "गांधीजी की मृत्यु के बाद से हमने महसूस किया है कि हमारे नेताओं का निर्णय सही था" (पटेल ए लाइफ: राजमोहन गांधी, पृष्ठ संख्या 490).

गांधी और नेहरू की तरह पटेल भी उल्लेखनीय और साथ-साथ त्रुटिपूर्ण थे, लेकिन चापलूसी उसकी कमजोरी नहीं थी. वह कुदाल को कुदाल पुकारने के लिए जाने जाते थे, वे कथनों में असंपृक्त थे, और शब्दों में कुंद थे. कई बार गांधी को अपने बचाव में आना पड़ा, "सरदार के पास भाषण का एक कुंदापन है जो कभी-कभी अनजाने में चोट पहुंचाता है" (पटेल ए लाइफ, पृष्ठ संख्या 465).


इसलिए नेहरू के लिए बोले गए शब्द भारत के लोगों के साथ-साथ उनके अपने दिल के विचार थे, जो जवाहरलाल नेहरू को गांधी के बाद भारत के नेता के रूप में देखते थे. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र में गांधी ने सरदार के नाम का ही नहीं, बल्कि राजाजी के नाम का भी लिया था. राजाजी ने भी महसूस किया था कि नेहरू ही भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे, हालांकि, गांधी की तरह वह भी संयुक्त नेहरू-पटेल नेतृत्व की वकालत करते थे.

29 अक्टूबर 1948 को सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में, राजाजी ने स्पष्ट किया कि “हमारे प्रधान मंत्री (जवाहरलाल नेहरू) दुनिया के राजनेताओं द्वारा बहुत प्रशंसा पाते हैं और वह इस भूमि के भी प्रिय हैं. उनकी उद्देश्य की ईमानदारी का विरोध कौन कर सकता है? वह हमारे लिए ताकत का प्रतीक है. आप और वह विदेश और आंतरिक सभी कठिनाइयों को दूर कर सकते हैं. भगवान की कृपा आप दोनों पर हो, ताकि भारत मजबूत और खुशहाल हो सके और शांति के लिए एक शक्ति बन सके." (सरदार पटेल सेलेक्ट कॉरेस्पोंडेंस, 1945__1950, खंड 2, विद्या शंकर द्वारा संपादित, पृष्ठ संख्या 368).

भारत के गवर्नर-जनरल के रूप में अपने अंतिम भाषण में, राजाजी ने फिर से संयुक्त नेहरू-पटेल नेतृत्व की वकालत की और दोनों पुरुषों की ताकत को रेखांकित किया, "प्रधान मंत्री और उनके पहले सहयोगी, उप प्रधान मंत्री, एक साथ एक ऐसा अधिकार बनाते हैं जो भारत को हर दृष्टि से समृद्ध बनाता है ... एक सार्वभौमिक प्रेम मीलता हैं, दुसरे को सार्वभौमिक विश्वास" (राजाजी ए लाइफ: राजमोहन गांधी, पृष्ठ संख्या 312). राजाजी का भी मानना ​​था कि नेहरू को ही प्रधानमंत्री बनना चाहिए था. 1971 में, नेहरू की बेटी, इंदिरा गांधी के विरोध के कारण, राजाजी इतिहास में वापस जाते हैं और नेहरू पर पटेल को पसंद किया.

नेहरू से आर्थिक विषय पर गेहरे मतभेद के बावजूद, उन्होंने नेहरू के प्रधान मंत्री रहते हुए ऐसा कभी नहीं कहा था. राजाजी ने नेहरू को एक भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी, "मुझसे ग्यारह साल छोटा, राष्ट्र के लिए ग्यारह गुना अधिक महत्वपूर्ण, ग्यारह सौ गुना अधिक राष्ट्र का अधिक प्रिय, श्री नेहरू अचानक हमारे बीच से चले गए ..... मैं इन सभी 10 वर्षों में श्री नेहरू से लड़ रहा हूं, जिन्हें मैं सार्वजनिक नीतियों में दोष मानता हूं. लेकिन मैं जानता था कि वह अकेले ही उन्हें सही कर सकते थे.... कोई और नहीं...और वह चले गए...मुझे मेरी लड़ाई में पहले की तुलना में कमजोर छोड़ रहा है. एक प्यारा दोस्त चला गया है, हम सभी के बीच सबसे सभ्य व्यक्ति है. हमारे बीच बहुत से लोग अभी तक सभ्य नहीं हैं...(राजाजी ए लाइफ: राजमोहन गांधी, पृष्ठ संख्या, 407).

इसलिए, यह स्पष्ट है कि नेहरू न केवल महात्मा गांधी की पसंद थे, बल्कि रवींद्रनाथ टैगोर, भगत सिंह और सुभाष बोस की भी पसंद थे. उन सभी ने उसे भाग्य के साथ हमारे प्रयास को आकार देने के रूप में देखा. और उस निर्णय का समर्थन सरदार पटेल और राजाजी ने किया और निश्चित रूप से सबसे ज्यादा भारत के लोगों ने नेहरू पर हमला उन सभी पर हमला हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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