अखिलेश से क्यों दूर हुए नरेश अग्रवाल? ये है INSIDE STORY

राजनीति में कभी भी कोई असंभावना संभावना में बदल जाती है. और हुआ भी वहीं नरेश अग्रवाल पीछे छूट गए और जया बच्चन को राज्यसभा में तीसरा टर्म मिल गया.

News18Hindi
Updated: March 13, 2018, 3:53 PM IST
अखिलेश से क्यों दूर हुए नरेश अग्रवाल? ये है INSIDE STORY
राजनीति में कभी भी कोई असंभावना संभावना में बदल जाती है. और हुआ भी वहीं नरेश अग्रवाल पीछे छूट गए और जया बच्चन को राज्यसभा में तीसरा टर्म मिल गया.
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Updated: March 13, 2018, 3:53 PM IST
सुमित पांडे
नरेश अग्रवाल ने पिछले महीने तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद को फोन किया. वो इस बात की पुष्टि करना चाहते थे कि क्या जया बच्चन को पश्चिम बंगाल से राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया जा रहा है या नहीं? दरअसल उत्तर प्रदेश में सामाजवादी पार्टी एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए नरेश अग्रवाल के मुकाबले जया बच्चन को तरजीह दे रही थी. हालांकि मीडिया में ऐसी भी खबरें थी कि पश्चिम बंगाल से जया बच्चन को राज्यसभा भेजा जा सकता है. लिहाजा नरेश अग्रवाल ने तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद को फोन करके कहा, 'मेरा तो 99.9 परसेंट हो गया है'. राजनीति में असंभावित जैसी लगने वाली बातें भी संभाव हो जाती हैं और हुआ भी यहीं, नरेश अग्रवाल पीछे छूट गए और जया बच्चन को राज्यसभा में तीसरा टर्म मिल गया.

स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेता एससी अग्रवाल के बेटे नरेश अग्रवाल ने पहली बार 80 के दशक में उत्तर प्रदेश के हरदोई में अपना पहला विधानसभा चुनाव जीता था. उन दिनों नरेश अग्रवाल, प्रमोद तिवारी और जगदंबिका पाल की गिनती कांग्रेस के युवा और आक्रमक नेताओं के तौर पर होती थी. ऐसे नेता जो प्रदेश की राजनीति में जगह बनाने के लिए बेताव थे.

उत्तर प्रदेश में मंडल-कमंडल युग में कांग्रेस के पतन के बाद नरेश अग्रवाल और जगदंबिका पाल ने अपना पाला बदल लिया. इन दोनों ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नाम से एक अलग पार्टी बना ली. लोकतांत्रिक कांग्रेस के करीब तीन दर्जन विधायकों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में कल्याण सिंह की अल्पमत सरकार को समर्थन दे दिया. इस दौरान अग्रवाल और पाल का उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनने का सपना भी पूरा हो गया.

कुछ ही महीने बाद पाल ने खुद मुख्यमंत्री बनने की कोशिश की, लेकिन 24 घंटे के अंदर ही संख्या बल न होने के चलते जगदंबिका पाल की उम्मीदें टूट गई. नरेश अग्रवाल भी कल्याण सिंह सरकार में लौट आए. उन दिनों नरेश अग्रवाल शायद मुख्यमंत्री के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे ताकतवर नेता थे. वो उन दिनों बीजेपी के साथ गठबंधन कर सांसदों को राज्यसभा में भेजते थे. लोकतांत्रिक कांग्रेस के कोटे से पहली बार राजीव शुक्ला को राज्यसभा भेजा गया था.

जब 2002 में राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने नरेश अग्रवाल को हटा दिया. नरेश अग्रवाल ने इसके बाद बसपा का दामन थाम लिया. बसपा ने उन्हें राज्य सभा भेज दिया. इस बीच हरदोई में प्रदेश की राजनीति के लिए उन्होंने अपने बेटे नितिन को तैयार करना शुरू कर दिया. 2012 के यूपी चुनाव से पहले, अग्रवाल ने फिर से पाला बदला और वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. नरेश अग्रवाल को समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर से राज्यसभा भेज दिया, जबकि उन्होंने अपने बेटे नितिन को अखिलेश यादव की सरकार में मंत्री का पद दिला दिया.

पिछले साल जब समाजवादी पार्टी में कब्जे को लेकर पार्टी में झगड़ा हुआ, तो नरेश अग्रवाल ने अखिलेश यादव का साथ दिया था. इसके अलवा वो इस दौरान मुलायम सिंह के चचेरे भाई राम गोपाल यादव के करीबी सहयोगी के तौर पर सामने आए.
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ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फिर क्यों समाजवादी पार्टी ने जया बच्चन को राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया? जबकि नरेश अग्रवाल जो कि परिवारिक झगड़े के दौरान भी अखिलेश के साथ थे वो पीछे छूट गए?

सूत्रों का कहना है कि जब शिवपाल यादव को दरकिनार किया गया और फिर अमर सिंह को भी निष्कासित कर दिया गया तो सपा के लिए रामगोपाल यादव बड़े नेता के तौर पर सामने आए. दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में अग्रवाल को रामगोपाल के काफी करीबी माना जाता रहा है. पिछले साल रामगोपाल के जन्मदिन पर नरेश अग्रवाल ने दिल्ली के एक फाइवस्टार होटल में पार्टी भी दी थी. इस पार्टी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ सरकार और विपक्ष के कई बड़े नेता भी आए थे.

राज्यसभा के लिए किसको नॉमिनेट किया जाए, इसे लेकर अखिलेश और मुलायम सिंह के बीच जमकर मंत्रणा हुई. जहां अखिलेश और मुलायम ने पार्टी में असंतुलन को पाटने के लिए नरेश अग्रवाल का पत्ता साफ कर दिया. सूत्रों का कहना है कि, नरेश अग्रवाल को रामगोपाल के समर्थन के चलते पूरी उम्मीद थी कि उन्हें ही राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. समाजवादी पार्टी ने नरेश अग्रवाल के मुकाबले जया बच्चन को तरजीह दी. समाजवादी पार्टी ने इस खबर को नरेश अग्रवाल तक पहुंचाने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक पार्टी सांसद को ज़िम्मेदारी दी.

नरेश अग्रवाल इस फैसले को सुनकर हैरान रह गए, लगभग 10 मिनट के लिए वो चुप हो गए. इसके बाद उन्होंने विचार करने के बाद आगे बढ़ने का फैसला किया और बीजेपी का दामन थाम लिया. कई साल पहले इस संवाददाता के साथ बातचीत में अग्रवाल ने उस दिन को याद किया था, जब उन्हें राजनाथ सिंह ने 2002 के चुनावों से पहले यूपी सरकार से बर्खास्त कर दिया था.

एक ताकतवर मंत्री के तौर पर लखनऊ में टॉनी मॉल एवेन्यू में उनके घर पर कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ रहती थी. लेकिन अगले दिन सरकार से बाहर होते ही उनके घर के बाहर सन्नाटा पसर गया था. उस दिन को याद करते हुए उन्होंने कहा था ''मैं इतना अकेला हो गया था कि मुझे अपने दोस्तों को हरदोई से कुछ दिन यहां मेरे साथ आकर रूकने के लिए कहना पड़ा था.''

एक बार फिर से नरेश अग्रवाल के लिए निराशा का दौर आया, तो उन्होंने एक हफ्ते के अंदर ही बीजपी का दामन थाम लिया.
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