वीजी सिद्धार्थ की आत्महत्या : देश में डिप्रेशन से मर रहे हैं लाखों लोग

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में 20 में से एक व्यक्ति अवसाद से पीड़ित है. इससे बुरा क्या होगा कि लोग चुपचाप अवसाद से मर रहे हैं.


Updated: August 1, 2019, 12:40 PM IST
वीजी सिद्धार्थ की आत्महत्या : देश में डिप्रेशन से मर रहे हैं लाखों लोग
वीजी सिद्धार्थ

Updated: August 1, 2019, 12:40 PM IST
एक अमीर आदमी, एक सफल उद्यमी के तौर पर वीजी सिद्धार्थ ने एक बड़ा व्यावसायिक साम्राज्य स्थापित किया और जब चीजें अलग होती दिखाई दीं तो अपनी जिंदगी को लेकर एक बड़ा और कठोर फैसला ले लिया. उनकी मृत्यु के बाद संवेदनाओं का सिलसिला शुरू हो चुका है. कई बड़ी हस्तियों ने इस मौत के पीछे की वजह कर-आतंकवाद को बताया है. साथ ही देश में व्यापार के लिए सही वातावरण के अभाव पर खेद जताया है.

विजय माल्या ने ट्विटर पर लिखा कि सरकारी एजेंसियां और बैंक किसी को भी इस स्थिति तक आने को मजबूर कर सकते हैं. लेकिन कैफे कॉफी डे के भविष्य के बारे में आलोचनाओं, जांचों और चर्चा के बीच एक और कहानी है, जिस पर अब तक चर्चा नहीं हुई है. ये कहानी एक महामारी की है जिसने इस देश को जकड़ लिया है. लेकिन अभी तक इसकी चीखें सुर्खियों में अपनी सही जगह नहीं बना पाई हैं.

वर्ष 2016 में 1.3 लाख ने की आत्महत्या
वीजी सिद्धार्थ देश के कई लोगों में से एक हैं, जिन्होंने खुद की जान ले ली. आत्महत्या कर ली. द लांसेट द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा 2.3 लाख का है. आधिकारिक तौर पर, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने वर्ष 2016 में 1.3 लाख का आंकड़ा दिया है. देश में आत्महत्या के कई मामलों की रिपोर्ट भी नहीं हो पाती है.

ब्रिटिश जर्नल द लांसेट आत्महत्याओं के मामलों पर एक पेपर प्रकाशित करता है. द लांसेट का कहना है, "भारत में आत्महत्याएं एक सार्वजनिक स्वास्थ्य त्रासदी हैं, जिससे निपटने के लिए एक प्रभावशाली योजना की जरूरत है".

सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत
द लांसेट पब्लिक हेल्थ में राखी डंडोना और उनके सहयोगियों द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है, "इस तरह के आंकड़े गैल्वनाइजिंग होने चाहिए, फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय धीमा है. हालांकि भारत में हर साल एड्स से संबंधित मौतों और मातृ मृत्यु की तुलना में काफी ज्यादा मौत आत्महत्याओं से होती हैं. आत्महत्याओं की रोकथाम के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अभी तक काफी कम ध्यान आकर्षित किया है."
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ज्यादातर लोगों को मनोवैज्ञानिक दिक्कतें
फोर्टिस हेल्थकेयर में मानसिक स्वास्थ्य विभाग के निदेशक और जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख कहते हैं, "हमें इस बात को समझने की ज़रूरत है कि आज आत्महत्या दुनिया में शीर्ष हत्यारों में से एक बन गई है, ज्यादातर लोगों के पास मनोवैज्ञानिक दिक्कतें हैं, लेकिन हमेशा एक केस नहीं हो सकता है."

डॉ. पारिख कहते हैं कि यह एक मिथक है कि जो लोग अच्छी तरह से नहीं हैं, वे कमजोर ही होंगे. सभी मनुष्य समान रूप से कमजोर हैं. हर किसी का अपना संघर्ष होता है. डॉ. पारिख कहते हैं, "कॉर्पोरेट भारत को मानसिक स्वास्थ्य परिणामों को देखने और समझने की जरूरत है. अक्सर नेतृत्व की भूमिकाओं में रह रहे लोग इसके बारे में बात नहीं करेंगे और मदद नहीं लेंगे. समस्या के तह तक पहुंचना महत्वपूर्ण है"

अवसाद को शुरुआत में पहचानना होगा
दिल्ली सरकार द्वारा संचालित इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज के निदेशक वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. निमेश देसाई कहते हैं कि आत्महत्या के व्यवहार के पीछे काफी हद तक व्यक्ति का अवसाद में होना होता है. समस्या को शुरू में ही पहचानने और उसके समाधान पर ध्यान देने से मदद मिलेगी.

एक अन्य पहलू आत्महत्या पर जिम्मेदार रिपोर्टिंग है. डॉ. पारिख कहते हैं, "यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि पत्रकारों को यह महसूस करना चाहिए कि दूसरे लोग देख रहे हैं. रिपोर्ट में इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया है कि आत्महत्याओं को कैसे रोका जाना चाहिए. यह गैर-सनसनीखेज होना चाहिए. उपलब्ध हेल्पलाइन नंबरों को उजागर करना चाहिए."

मीडिया कवरेज में सावधानी जरूरी
आत्महत्या का मीडिया और ऑनलाइन कवरेज का कॉपी-कैट व्यवहार लोगों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है. वहीं मनोचिकित्सक से मदद मांगने वाले व्यवहार से सकारात्मक प्रोत्साहन मिल सकता है.

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2016 के अनुसार, भारत में, आत्महत्या के जोखिम वाले लोगों में 80 प्रतिशत किसी भी स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राप्त नहीं करते हैं. एक गैर-लाभकारी संगठन के मुताबिक, "आत्महत्या पर आपकी रिपोर्ट किसी और के लिए जीवन या मृत्यु का विषय हो सकती है" इनका कहना है कि लोगों के मानसिक स्वास्थ्य सुविधा तब पहुंचने से ही इस समस्या का समाधान हो सकता है.

रीच कहते हैं कि कई अध्ययनों से पता चलता है कि जिस तरह से समाचार में आत्महत्या को कवर किया जाता है, वो कुछ कमजोर पाठकों की आत्महत्या का प्रयास करने की संभावना को बढ़ा सकता है, इसलिए, कॉपी-कैट आत्महत्याओं के जोखिम को कम करने के लिए भ्रामक खबरों से बचें. खासकर सनसनीखेज और ग्लैमरस सुर्खियों से और आत्महत्या के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ग्राफिक्स विवरण से हमें बचने की जरूरत है. पत्रकारों के पास संसाधन नियमावली होनी चाहिए, जिससे उन्हें पता हो कि किस संवेदनशीलता के साथ इन मामलों को कवर करना है.

रासायनिक असंतुलन है मानसिक बीमारी की वजह
डॉ. सोनिया लाल गुप्ता ने बताया, "लोगों को किसी भी मानसिक बीमारी को समझने की जरूरत है क्योंकि इसका एक वजह रासायनिक असंतुलन भी है. जैसे शरीर में इंसुलिन के असंतुलन से मधुमेह होता है."

डॉ. सोनिया गुप्ता का यह भी कहना है कि सरकार को इस दिशा में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. उन्होंने कहा, "मानसिक स्वास्थ्य पर बजट बढ़ाने की जरूरत है. वर्तमान में, यह स्वास्थ्य का एक बहुत छोटा हिस्सा है. इसके बारे में जागरूकता बढ़ाने और कार्यक्रमों को चलाने की भी जरूरत है ताकि लोगों को पता चले कि चिंता और अवसाद होना सामान्य है. यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि सभी डॉक्टर अवसाद के रोगियों की जांच शुरू कर दें ताकि इसे समय पर पहचाना और इलाज किया जा सके."

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में 20 में से एक व्यक्ति अवसाद से पीड़ित है. इससे बुरा क्या होगा कि लोग चुपचाप अवसाद से मर रहे हैं.

सामाजिक दबाव, रिश्‍तों में तनाव, उदासी, डिप्रेशन, वित्तीय संकट और परिवार के तनाव का  उपाय आत्महत्या नहीं है. Hindi.News18.com पर आप ‘डिप्रेशन और आत्महत्या’ से बचाव के लिए हर दिन ‘जीवन संवाद’ पढ़ सकते हैं. 

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First published: August 1, 2019, 11:56 AM IST
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