पानी की कहानी: गांववालों ने खुद सुलझायी पानी की समस्या

पानी की सप्लाई पर आने वाले खर्चे की वसूली के लिए सोसाइटी ने अलग तरह का फॉर्मूला दिया. सोसाइटी ने कहा कि वो कनेक्शन के आधार पर पैसा नहीं वसूलेगी बल्कि जनसंख्या के आधार पर वॉटर टैक्स लेगी.

पानी की सप्लाई पर आने वाले खर्चे की वसूली के लिए सोसाइटी ने अलग तरह का फॉर्मूला दिया. सोसाइटी ने कहा कि वो कनेक्शन के आधार पर पैसा नहीं वसूलेगी बल्कि जनसंख्या के आधार पर वॉटर टैक्स लेगी.

पानी की सप्लाई पर आने वाले खर्चे की वसूली के लिए सोसाइटी ने अलग तरह का फॉर्मूला दिया. सोसाइटी ने कहा कि वो कनेक्शन के आधार पर पैसा नहीं वसूलेगी बल्कि जनसंख्या के आधार पर वॉटर टैक्स लेगी.

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महाराष्ट्र के सांगली जिले के कई गांवों में पिछले कई दशकों से पीने के पानी की गंभीर समस्या रही है. इस गंभीर समस्या के सामाधान का जिम्मा भी गांव वालों ने खुद उठाया.



गांव के ही चवन ने वॉटर स्कीम के लिए कॉर्पोरेटिव सोसाइटी की स्थापना करने का निर्णय लिया. इस सोसाइटी में आस-पास के हर गांव से दो लोग चयनित किये गये. सरपंच और वॉटर सप्लाई कमिटी का चैयरमैन दोनों ही कमेटी के कार्यकारी सदस्य थे. चवन के मुताबिक दोनों लोग दो विरोधी राजनीतिक दलों से थे.



गांव वालो की लगन और मेहनत से वॉटर स्कीम के लिए कॉर्पोरेटिव सोसाइटी की स्थापना 10 मई साल 2005 में पुणे के कमीश्नर ऑफ चैरिटी के हेडक्वार्टर में हुई. सोसाइटी ने सांगली के ही अटपाडी गांव में अपन छोटा सा ऑफिस बनाया. जिसके पास में ही सिंचाई के लिए पानी का टैंक और पम्पिंग हाउस था. जिसके जरिये गांव वालों को पानी दिया जाना था.





पानी की सप्लाई पर आने वाले खर्चे की वसूली के लिए सोसाइटी ने अलग तरह का फॉर्मूला दिया. सोसाइटी ने कहा कि वो कनेक्शन के आधार पर पैसा नहीं वसूलेगी बल्कि जनसंख्या के आधार पर वॉटर टैक्स लेगी. सोसाइटी का सुझाव ऐसा था कि जिससे न केवल पानी की सप्लाई और मेंटिनेंस का खर्चा निकाला जा सकता था बल्कि भविष्य की योजनाओं के लिए भी फंड जुटाया जा सकता था.
पानी की सप्लाई और मेंटिनेंस पर आने वाले खर्च को दो हिस्सों में बांटा गया.



1) सोसाइटी के स्तर पर गांव के अंदर मेंटिनेंस, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, पम्पिंग मशीन की देखभाल और बिजली बिल का भुगतान देखेगी.

2) ग्राम पंचायत के स्तर पर दूसरे गांवों में पानी की सप्लाई का नेटवर्क, वॉटर टैंक, कनेक्शन लगाने का खर्च.



ग्राम पंचायत को ‘3.40 रुपये प्रति व्यक्ति * गांव की कुल जनसंख्या’ के हिसाब से वॉटर टैक्स जमा करना था. ये जनसंख्या 1991 की जनगणना के हिसाब से तय की जानी थी. वॉटर टैक्स हर महीने जमा किया जाना था.



इनमें से कुछ पंचायते ऐसी थीं जो पर्याप्त वॉटर टैक्स वसूल रही थीं जो ना केवल उनके खर्चे पूरे कर रहा था बल्कि भविष्य के लिए फंड भी इकट्ठा हो रहा था.
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