हम उपयोग कम बर्बाद ज्‍यादा करते हैं 'पानी'

जलपुरुष राजेंद्र सिंह कहते हैं कि भारत में धरती के अंदर और बाहर की जलग्रहण शक्ति को समझकर छोटी-छोटी जल संरचनाओं का निर्माण होना चाहिए. धरती के पेट को जल से भरना जरूरी है ताकि नदियां भी सदानीरा बनें.

Priya Gautam | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 12:32 PM IST
हम उपयोग कम बर्बाद ज्‍यादा करते हैं 'पानी'
प्रतिकात्मक तस्वीर
Priya Gautam | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 12:32 PM IST
आज जिस पानी के लिए चारों ओर हाहाकार मचा है. आने वाले दिनों में शायद मार-काट भी मचे. उस पानी को लेकर हम सब कितने लापरवाह हैं इस बात का शायद ही किसी को अंदाजा हो. लेकिन यह सच है कि जितने पानी से हमारी रोजाना की जरूरतें पूरी होती हैं, उससे ज्‍यादा पानी हम बर्बाद कर देते हैं.  पानी की भंडारण क्षमता को लेकर सामने आई रिपोर्ट इस मामले में सबको आईना दिखा रही है.

हाल ही में कोटा से सांसद ओम कृष्‍ण बिरला ने लोकसभा में एक रिपोर्ट का हवाला दिया. यह कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटी की रिपोर्ट है. जिसके मुताबिक हमारी सालाना आवश्‍यकताओं के मुकाबले पानी की बर्बादी का ग्राफ ज्यादा ऊंचा है. रिपोर्ट कहती है-

भारत में सालाना लगभग 2,600 अरब घन मीटर (बीसीएम) बारिश होती है, जबकि सभी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगभग 1,100 बीसीएम की जरूरत है. इसके अलावा भारत में पानी के भंडारण और संचयन की क्षमता 253 बीसीएम है. तो बाकी पानी कहां जाता है ? बता दें कि बरसात का बाकी पानी बर्बाद हो जाता है.


2600 अरब घन मीटर (बिलियन क्‍यूबिक मीटर) जलराशि में से 1353 बीसीएम पानी को घटा दिया जाए तो 1247 बीएमसी पानी बर्बाद हो जाता है जो कि सालाना जरूरत 1100 बीएमसी से ज्‍यादा है. ऐसे में चिंता की बात है कि देशभर में बर्षा का पानी भूजल के रूप में इकठ्ठा नहीं हो पा रहा बल्कि इस्‍तेमाल से भी ज्‍यादा मात्रा में बर्बाद हो रहा है.

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रेमन मैग्‍सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं कि भारत में जल संचयन केवल बांध और तालाबों में ही नहीं होता था, बल्कि पेड़ों की जड़ों, घास, पौधों से भी भूजल रीचार्ज होता है. वहीं भूजल के छोटो-छोटे प्राकृतिक भंडार भी पानी को पकड़ के रखते हैं. लेकिन जो सबसे बड़ी चीज है वह ये है कि भारत में जल संचयन के लिए बांधों की नहीं छोटी-छाेटी जल इकाइयों की जरूरत है.

जलपुरुष राजेंद्र सिंह कहते हैं कि भारत में धरती के अंदर और बाहर की जलग्रहण शक्ति को समझकर छोटी-छोटी जल संरचनाओं का निर्माण होना चाहिए. धरती के पेट को जल से भरना जरूरी है ताकि नदियां भी सदानीरा बनें. सरकारों को सामुदायिक जल प्रबंधन को बढ़ावा देने की जरूरत है. देशभर में तालाब, बाबड़ी, कूंए, झीलों के पुनर्भरण की जरूरत है ताकि पानी का प्रबंधन ठीक से हो.


बारिश के पानी के लिए सरकारों ने राजस्‍थान में तो कुछ काम कराया है लेकिन वहां बारिश कम होती है. अन्‍य राज्‍यों से जैसे झारखंड आदि राज्‍यों में तालाबों के निर्माण की जरूरत है.

Churu Police, water reservoir
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जहां एक ओर जलपुरुष छोटी-छोटी जल इकाइयों को बढ़ाने की बात कह रहे हैं, वहीं जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट चौंकाती है कि जल की 6607 यूनिट में से 1071 यूनिट का सबसे ज्‍यादा दोहन (over exploited) हुआ है. ऐसे में न केवल नए तालाबों के निर्माण की जरूरत है बल्कि जो पुराने हैं उनमें भी पानी के संचयन को बढ़ाने की जरूरत है.

बता दें कि केंद्र सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 2012-13 में 52.30 करोड़, 2013-14 में 48.26 करोड़, 14-15 में 41.77 करोड़ और 15-16 में 31.85 करोड़ रुपये जारी किए हैं. यह पैसा NLCP/NPCA के तहत सिर्फ जम्‍मू-कश्‍मीर, महाराष्‍ट्र, मध्‍य प्रदेश्‍ा, राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश, नगालेंड और पश्चिम बंगाल के लिए जारी हुआ है.

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वहीं जल मंत्रालय की ओर से बताया गया कि सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड की ओर से 2013 में भारत में कृत्रिम तरीके से भूजल बढ़ाने के लिए मास्‍टर प्‍लान तैयार किया गया है. जिस पर काम चल रहा है. इसकी अनुमानित लागत 79,178 करोड़ रुपये आंकी गई है. इसके तहत देशभर में 1.11 करोड़ रेन वाटर हार्वेस्टिंग और कृत्रिम रीचार्ज स्‍ट्रक्‍चर बनाने की योजना है.

हालांकि दिल्‍ली वॉटर बॉडीज को बचाने के लिए काम कर रहे दीवान सिं‍ह कहते हैं रेन वाटर हार्वेस्टिंग (कृत्रिम तरीका) सफल नहीं है. इसमें बहुत धीमे-धीमे और कम मात्रा में पानी रीचार्ज होता है. इससे अच्‍छा हो कि प्राकृतिक वाटर बॉडीज को बचाया जाए और उनमें जल संचयन किया जाए.

सांकेतिक तस्वीर


सिंह कहते हैं कि दिल्‍ली में करीब 650 वाटर बॉडीज हैं लेकिन फंक्‍शनल सिर्फ कुछ ही हैं. पानी के स्‍त्रोत सूख रहे हैं. भूजल और नीचे चला गया है. पहले प्राकृतिक संसाधन समाज के भरोसे होते थे, लेकिन अब वे सरकारों के हाथ में हैं. एेसे में लोगों ने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्‍मदारी समझना छोड़ दिया वहीं सरकारें कुछ करती नहीं हैं. पानी के लिए प्राकृतिक स्‍त्रोतों को बचाना होगा.

जलाशयों में घट गया दो फीसदी जल

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय की ओर से दिसंबर 2017 में जारी आंकड़े भी चिंता की लकीरें पैदा कर रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक देश के 91 जलाशयों में जल संग्रहण की क्षमता में दो फीसदी की कमी आई है. इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो पूरे देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 (बीसीएम) का लगभग 62 प्रतिशत है.



खास बात है कि इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं.

झीलों का पुनरुद्धार

एनपीसीए (NLPC और NWPC ) के तहत 65 करोड़ 50 लाख रुपये केंद्र सरकार ने वित्‍तीय वर्ष 12-13 में जारी किए हैं. केंद्र ने केंद्र और राज्‍यों के अधीन 900 करोड़ की योजना 12वीं पंचवर्षीय योजना में तैयार की है. जिसका मकसद झील आदि गीली भूमि को बचाना है.

जबकि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि एनपीसीए के तहत 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में जरूरत की तुलना में कम बजट जारी किया गया, जिसके चलते काम पूरे नहीं हुए. हालांकि वर्ष 2015-16 में दो झीलों के संरक्षण की योजना बनाई गई थी लेकिन तीन झीलों को संरक्षित किया गया.
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