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हम धर्म की राह पर चले, मर्म को जाने दिया

News18Hindi
Updated: October 17, 2019, 7:06 PM IST
हम धर्म की राह पर चले, मर्म को जाने दिया
हम धर्म की राह पर चले, मर्म को जाने दिया

अक्टूबर का महीना भारत के लिए खास है. इसी महीने में महात्मा गांधी का जन्म हुआ था और लोकनायक जयप्रकाश का भी. भारतीय राजनीति और समाज पर इन दोनों शख्सीयतों का प्रभाव आज भी साफ तौर पर महसूसा जा सकता है.

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  • Last Updated: October 17, 2019, 7:06 PM IST
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अनुराग अन्वेषी

भारतीय राजनीति का काला अध्याय है आपातकाल. अगर लोकनायक जयप्रकाश न होते तो शायद इंदिरा गांधी की तानाशाही को रोकना नामुमकिन था. आपातकाल के खिलाफ बिगुल बजाने से पहले जेपी सर्वोदय और भू-दान आंदोलन की सीमित सफलता से दुखी थे. वे लोकतंत्र को दोषमुक्त बनाना चाहते थे. धन, बल और चुनाव के बढ़ते खर्च कम करना चाहते थे. उनका सपना एक ऐसा समाज बनाने का था जिसमें नर-नारी के बीच समानता हो और जाति का भेदभाव न हो.

ऐसे में जब गुजरात और उसके बाद बिहार से उनके सामने नेतृत्व संभालने का प्रस्ताव आया तो उनकी उम्मीद फिर जगी और उन्होंने सप्त क्रांति छेड़ी. इस सप्त क्रांति आंदोलन का मकसद क्या था? दरअसल, सप्त क्रांति में सात क्रांतियां जुड़ी थीं - राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति. सप्त क्रांति के दस्तावेज से गुजरते हुए जेपी में गांधी के तत्व दिखने लगते हैं.

गांधी भी एक ऐसा समाज-देश चाहते थे जो तमाम तरह की वर्जनाओं से मुक्त हो. जहां स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर काम करें. जिस तरह गांधी मानते थे कि नैसर्गिक चीजों के साथ कम से कम छेड़छाड़ हो, उनका दोहन इस तरह हो कि उनका अस्तित्व बचा रहे, इसी तर्ज पर जेपी ने भी आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक जागरूकता की बात कही थी.

यह सही है कि गांधी ने अपने चिंतन या लेखन में पर्यावरण शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है. यह शब्द हमारे प्राचीन लेखन में कहीं मौजूद नहीं है. इसकी एकमात्र वजह यह है कि उस वक्त यह शब्द प्रचलन में था ही नहीं. पर्यावरण शब्द का चलन नया है पर इससे जुड़ी चिंता नयी नहीं है. यह तो भारतीय संस्कृति के मूल में रही है. याद करें गांधी का वह खूब चर्चित वाक्य कि यह धरती सभी की जरूरत पूरी कर सकती है पर किसी एक की लालच नहीं. जाहिर है कि यहां संपूर्ण प्रकृति की बात कही जा रही है जिसमें हवा-पानी, पर्वत-नदी से लेकर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी तक शामिल हैं.

भारतीय चिंतन में सूर्य-नमस्कार, नदियों की स्तुति और आरती, पर्वतों की वंदना, वनस्पतियों में ईश्वर की परिकल्पना, मनुष्येतर जीवों के प्रति करुणा का भाव दिखते हैं. भारतीय चिंतन की यही प्रवृत्ति हमें गांधी से लोहिया तक के चिंतन में दिखाई पड़ती है.

बात शुरू हुई थी अक्टूबर के महीने के खास होने की. गौर कीजिए न कि अक्टूबर का यह महीना पर्वों से भरा पड़ा है. अभी-अभी दुर्गापूजा और दशहरा बीता. दीपावली आने वाली है और फिर उसके बाद पूर्वांचल का महापर्व छठ आएगा. इन पर्वों का धार्मिक महत्व तो है ही, इनके साथ भारतीय आस्था भी गहराई से जुड़ी हुई है. इसके अलावा इन पर्वों का अपना प्रतीकात्मक अर्थ भी है, जो हमें साफ-सफाई से लेकर प्रकृति तक से जोड़ते हैं.
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आखिर भारतीय संस्कृति के इन पर्वशृखंलाओं का सांकेतिक अर्थ क्या हैं? दुर्गापूजा में हमने शक्ति की देवी की आराधना की यानी शक्ति संचय किया. उस शक्ति से हमने अपने भीतर की कलुषताएं मारीं. अपने भीतर के अंधकार का नाश किया. रावण इसी अंधकार का प्रतीक पुरुष है. दशहरे में हमने रावण दहन की परंपरा का निर्वाह किया. रावन दहन किये जाने का संकेत है आत्मा के दोषों का निवारण. बुरे विचारों का अंत, यानी अंतर्मन की सफाई.

इसके बाद बारी आती है दीपावली की. दीपावली का यह पर्व हिंदू समाज के लिए बहुत व्यस्तता वाला पर्व है. यह बेहद सामान्य सी बात है कि इस पर्व के आने के पहले हम सब अपने घरों की सफाई में जुटते हैं. दीवारों पर रंग-रोगन होते हैं. हम मानते हैं कि दीपावली अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है. दीपावली को हिंदू कैलेंडर पर कार्तिक महीने की अमावस्या के दिन दिखलाया जाता है. हिंदुओं की धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस दिन श्रीराम लंका पर विजय हासिल कर अयोध्या लौटे थे. लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था.

कहने का मतलब यह कि दीपावली के संग कई कथाएं जुड़ी हैं. भारत के लगभग तमाम संप्रदायों में इसे मनाने के कारण अलग-अलग बताए गए हैं, लेकिन मनाने का तरीका हर तरफ एक सा है. इस अर्थ में देखें तो यह पर्व हमें पारंपरिक रूप से एकता के सूत्र में बांधता दिखता है.

आधुनिक दृष्टि यह कहती है कि यह पर्व हमें घर की साफ-सफाई के प्रति सजग करता है. हम रात में दीये जलाते हैं. दशहरे में आत्मा की कलुषता का नाश करने के बाद इस पर्व में हम अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा शुरू करते हैं. पर क्या आज हमने इस पर्व को इसी रूप में रहने दिया? या इसे बेहद खर्चीला और पर्यावरण प्रदूषण का कारण बना दिया? हम इस कदर आत्ममुग्ध हुए कि सफाई के बाद फिर से गंदगी फैलाने लगे, पर्यावरण प्रदूषित करने लगे. यह प्रदूषण इस हद तक फैला कि सुप्रीम कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना पड़ा.

दीपावली के बाद पूर्वांचल का महापर्व छठ आता है. अब यह पर्व कहने को सिर्फ पूर्वांचल का रह गया. दिल्ली- मुंबई से लेकर विदेशों तक में इस पर्व को मनाया जाने लगा है. यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें हम सूर्य को दीया दिखा कर उसके प्रति अपनी कृतज्ञयता प्रकट करते हैं. ऐसी कई वजहों के कारण इसे प्रकृति पूजा के पर्व के रूप में बताया जा सकता है.

फिलहाल इस टिप्पणी का मकसद यह ध्यान दिलाना है कि दशहरे पर आत्मा की गंदगी साफ करने के बाद दीपावली पर हमने घर की साफ सफाई की और छठ के आते ही हमने सफाई के इस अभियान को सड़क से लेकर जलाशयों तक पहुंचाया. ध्यान देने की बात है कि छठ के मौकों पर हम सड़कों की सफाई करते हैं, उन्हें पानी से धोया जाता है. नदी, तालाब, पोखरों की सफाई होती है. घाट बनाए जाते हैं.

इतने के बाद आखिर क्यों गांधी चिंतित रहे प्रकृति को लेकर? क्यों जेपी की सप्त क्रांति की कुछ क्रांतियां हमें पर्यावरण के प्रति सजग होने की याद दिलाती हैं? आखिर क्यों मौजूदा सरकार सफाई और स्वच्छता को लेकर व्यापक पैमाने पर अभियान चला रही है? दरअसल, इन सारे सवालों के जवाब एक हैं कि हमने प्रकृति के साथ बदसलूकी की है. उसे बुरी तरह नोचा-खसोटा है. उसके साथ छेड़छाड़ कर अनियोजित विकास कर विनाश को आमंत्रित किया है.

हमने अपने पर्वों के महज धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित कर दिया है. हम धर्म को पकड़ते रहे पर उसके मर्म की चिंता नहीं की. अगर की होती तो दशहरे पर आत्मशुद्धि से शुरू होकर जो स्वच्छता और सफाई का अभियान छठ तक आते-आते गांव-शहर और प्रकृति की रक्षा करने का संदेश फैलाता रहा है, उसके बाद हमें अलग से किसी सफाई अभियान की जरूरत नहीं होती.

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First published: October 17, 2019, 7:06 PM IST
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