विश्लेषणः एक कमजोरी ने कांग्रेस नेताओं को किया NCP अध्यक्ष शरद पवार के पास जाने पर मजबूर

दूसरी पार्टियों की तरह कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ संगठन पर ढीली हो गई है उसके पीछे की वजह ये है कि संगठनात्मक बैठकों में गांधी परिवार का ना आना और प्रदेश के नेताओं से लगातार संवाद ना करना

महाराष्ट्र की महाविकास आघाडी सरकार में शामिल कांग्रेस इन दिनों अब तक के सबसे मुश्किल दौर में है, प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले के बयान से ना केवल NCP या शिवसेना नाराज है बल्कि कांग्रेस के कई मंत्री भी नाराज हैं और इसे पीछे सत्ता की लालसा और संगठन से ज्यादा खुद को बढ़ाने की भूख के तौर पर देखा जा सकता है.

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मुंबई. संगठन और सरकार क्या एक ही है या सरकार और संगठन को एक ही मान लेना चाहिए? ये सवाल महाराष्ट्र की सियासत में बहुत अहम हो गया है. नाना पटोले का संगठन बढ़ाने के लिए सरकार पर सवाल खड़ा करने से अगर शरद पवार या शिवसेना नाराज है तो पिछली सरकार में देवेंद्र फडणवीस सरकार पर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने जो टिप्पणियां कीं. कार्यपद्धति और सरकारी योजनाओं, घोषणाओं या मुआवजों पर सवाल खड़ा किया था क्या वो भी सही नहीं था. अगर वो सही है तो नाना के बयान पर सियापा क्यों? महाराष्ट्र की महाविकास आघाडी सरकार में शामिल कांग्रेस इन दिनों अब तक के सबसे मुश्किल दौर में है, प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले के बयान से ना केवल NCP या शिवसेना नाराज है बल्कि कांग्रेस के कई मंत्री भी नाराज हैं और इसके पीछे सत्ता की लालसा और संगठन से ज्यादा खुद को बढ़ाने की भूख के तौर पर देखा जा सकता है.

पवार को बना दिया कांग्रेस का संरक्षक!
दूसरी पार्टियों की तरह कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ संगठन पर ढीली हो गई है. उसके पीछे की वजह ये है कि संगठनात्मक बैठकों में गांधी परिवार का ना आना और प्रदेश के नेताओं से लगातार संवाद ना करना, कहीं ना कहीं कांग्रेस नेताओं के ऊपर से दिल्ली का डर कम होता जा रहा है. 2019 के चुनाव परिणाम के बाद जब कांग्रेस के नेताओं को राजस्थान ले जाया गया और बीजेपी या शिवसेना के साथ ना जाने की सलाह दी गई तो सरकार में शामिल होने के लिए कई नेताओं ने मंत्री बनने की लालच में राहुल गांधी की सहमति के विरुद्ध अधिकतर नेताओं ने NCP से हाथ मिलाने की धमकी तक दी थी. जिसके बाद राज्य के भीतर बगावती तेवर को देखते हुए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने पर सहमति तो दे दी, लेकिन शरद पवार को इसमें निर्णायक भूमिका या यूं कहे कि कांग्रेस का संरक्षक नियुक्त कर दिया.

पवार के गढ़ का दौरा करना नहीं भाया
सरकार से अलग हटकर नाना को संगठन बढ़ाने की कमान मिलते ही उन्होंने महाराष्ट्र भर में कई दौरे किए और कांग्रेस को बढ़ाने के लिए पवार के गढ़ यानि पुणे और पश्चिम महाराष्ट्र सहित कई जगहों के दौरे ने शिवसेना और NCP को नाराज कर दिया. नाराजगी तब फूटकर बाहर आ गई जब शिवसेना और NCP दोनों ने कांग्रेस राज्य के मुखिया को छोटा और बड़बोला नेता करार दे दिया. यही नहीं ऐसे समय में जब कांग्रेस के नेताओं को अपने प्रदेश अध्यक्ष के साथ खड़ा होना चाहिए तो सभी ने उलटा नाना पर ही सवाल खड़े करते ही अपने केंद्रीय नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका से बात करने की बजाय शरद पवार की नाराजगी दूर करने चले गए और नाना के मसले का पटाक्षेप करने की गुजारिश की. जिसके बाद नाना को भी झुकना पड़ा और अपने ही बयान से किनारा कर यू टर्न लेना पड़ा.


केंद्रीय नेतृत्व का निष्क्रिय रहना ठीक नहीं
ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि महाराष्ट्र में कांग्रेस सोनिया गांधी और राहुल गांधी नहीं बल्कि NCP प्रमुख शरद पवार चलाते है. इस बात से जुड़े कई सबूत भी मिलते हैं अगर शिवसेना को कांग्रेस के मंत्रियों या नेताओं की शिकायत करनी हो तो सोनिया गांधी से नहीं बल्कि शरद पवार से शिकायत करती है. अगर सरकार में कांग्रेस की शिकायत करनी है तो शरद पवार से करते हैं. यहां तक तो ठीक है लेकिन अगर कांग्रेस के नेता और प्रभारी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष की शिकायत और उनकी तरफ से माफी मांगने के लिए शरद पवार के पास जाते हैं तो निश्चित ही कांग्रेस में चिंता का विषय है. अगर केंद्रीय नेतृत्व इसी तरीके से निष्क्रिय रहा तो कई दूसरे राज्यों की तरह महाराष्ट्र कांग्रेस के दो-चार नेता छोड़ सत्ता के लालच में अगर NCP में शामिल हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा.

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