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Bengal Assembly Election: ब्रिगेड मैदान में जुटा जनसमूह क्या कांग्रेस-लेफ्ट-ISF की कराएगा नैया पार?

कांग्रेस-लेफ्ट-आईएफएस गठबंधन ने रविवार को कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड परेड मैदान (Brigade Parade grounds) में मेगा रैली के साथ ही बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने अभियान का आगाज कर दिया. (AP)

कांग्रेस-लेफ्ट-आईएफएस गठबंधन ने रविवार को कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड परेड मैदान (Brigade Parade grounds) में मेगा रैली के साथ ही बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने अभियान का आगाज कर दिया. (AP)

West Bengal Assembly Election 2021: कांग्रेस-लेफ्ट-आईएफएस गठबंधन ने रविवार को कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड परेड मैदान (Brigade Parade grounds) में मेगा रैली के साथ ही बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने अभियान का आगाज कर दिया. वाम मोर्चे ने वर्षों से बड़े पैमाने पर इस मैदान में रैलियां करके इसे ऐतिहासिक बना दिया था. मंच पर एक विशाल बैनर लगा है. जिसमें लिखा है- 'आमराई बिकोल्पो, आमराई धोर्मोनिरपेक्खो, आमराई भोबिश्यॉत (हम ही विकल्प हैं. हम ही धर्मनिरपेक्ष हैं और हम ही भविष्य हैं).”

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(अर्क देब)

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Election 2021) को लेकर राजनीतिक पार्टियां जोर-शोर से प्रचार में जुटी हैं. कांग्रेस-लेफ्ट-आईएफएस गठबंधन (Left-Congress-ISF alliance) ने रविवार को कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड परेड मैदान (Brigade Parade grounds) में मेगा रैली के साथ ही बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने अभियान का आगाज कर दिया. वाम मोर्चे ने वर्षों से बड़े पैमाने पर इस मैदान में रैलियां करके इसे ऐतिहासिक बना दिया था. मंच पर एक विशाल बैनर लगा है. जिसमें लिखा है- 'आमराई बिकोल्पो, आमराई धोर्मोनिरपेक्खो, आमराई भोबिश्यॉत (हम ही विकल्प हैं. हम ही धर्मनिरपेक्ष हैं और हम ही भविष्य हैं).”

इस रैली को ऐतिहासिक बनाने के लिए लेफ्ट के लाखों समर्थक ब्रिगेड परेड मैदान में जुटे थे. भीड़ को देखकर वाम मोर्चा के अध्यक्ष बिमान बसु और कांग्रेस सांसद अधीर चौधरी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि उन्होंने पहले कभी ऐसा दृश्य नहीं देखा. रविवार को रैली के बाद भीड़ धीरे-धीरे तितर-बितर होने लगी. तीतर-बितर होती भीड़ एक सवाल छोड़ गई- क्या वामपंथी नेताओं के ये मुस्कुराते चेहरे 2 मई तक रहेंगे? बंगाल के रण के आखिर में वे कितने सफल होंगे?



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पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 3 फरवरी, 2019 को एक वामपंथी रैली के दौरान भारी भीड़ देखी गई थी. इससे विपक्ष के नेता चिंतित हो गए थे. ये रैली वामपंथियों की ताकत का प्रदर्शन था. इसका उद्देश्य ममता बनर्जी की 'यूनाइटेड इंडिया’ की उस रैली से मेल खाना था, जो 19 जनवरी को उसी स्थल पर आयोजित हुई थी. उस रैली में बुद्धदेव भट्टाचार्य और देबलीना हेम्ब्रोम ने भाषण दिया था. उत्साह और उमंग के ज्वार को देखते हुए राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने नए सिरे से गणना शुरू की थी कि चुनाव में वामपंथियों को कितनी सीटें मिलेंगी. सात-चरण के वोटिंग के आखिर में 23 मई 2019 को यह देखा गया कि वाम दलों ने शून्य सीटें जीतीं. इसकी यादें वामपंथियों के लिए भयावह हैं.

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सीपीआई (एम) 2019 के लोकसभा चुनावों में कोई छाप नहीं छोड़ सकी. पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान वामदलों को 26 प्रतिशत वोट मिले, जो 2019 के लोकसभा चुनावों में केवल 7.52 प्रतिशत वोट पर आ गए. बंगाल के राजनीतिक क्षेत्र में एक नया सिद्धांत स्थापित किया गया कि वाम वोट बीजेपी के पास चला गया.


ऐसा क्यों हुआ, इसके कई वजहें हैं. 2019 में एक बात स्पष्ट हो गई कि ब्रिगेड मैदान में जुटी भीड़ और ईवीएम पर संख्याओं का अंतर बहुत बड़ा है. अगर ब्रिगेड मैदान में इकट्ठा होने वाले सभी लोगों ने अगर लेफ्ट को वोट दिया तो वोट प्रतिशत केवल 7 प्रतिशत कैसे आया? सवाल ये भी खड़ा होता है कि इतनी भारी भीड़ इकट्ठा होने का क्या मतलब है? जब वे अपनी पार्टी को वोट नहीं देते हैं?

पश्चिम बंगाल के पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने कहा, 'अगर कोई पांच अलग-अलग जगहों पर रैलियां करता है, तो मतदाताओं की मानसिकता को समझ सकता है. जहां वोट चर्चा का मुख्य विषय है. ऐसा ही कुछ 1977 में हुआ था, जब इंदिरा गांधी प्रचार कर रही थीं. उस समय भीड़ इससे कहीं अधिक थी, लेकिन कांग्रेस उस साल पाटीदार तौर पर हार गई थी.'

हालांकि, उन्होंने इन रैलियों के प्रभाव से इनकार नहीं किया. सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, 'हां, इस तरह की सभाएं लोगों के बीच प्रभाव डालती हैं. लेकिन इस तरह की रैलियां आम जनता को आकर्षित नहीं कर सकती हैं.'

आंकड़े कहते हैं कि पिछले 2019 के लोकसभा चुनावों में वामदलों के समर्थकों ने वामदलों को ही वोट नहीं दिया था. हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षक शुभमॉय मैत्रा इस घटना को एक प्रवृत्ति के रूप में स्वीकार नहीं करते. उनके अनुसार, 2019 में लोगों ने राष्ट्रीय राजनीति के लिए वोटिंग की थी. लोगों ने केंद्र में बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए मतदान किया था. इस बार का नज़ारा अलग है.


राजनीतिक क्षेत्र में 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणामों की कई व्याख्याएं हैं. कई पर्यवेक्षकों ने गणना की कि वामदलों का वोट अब बीजेपी के पास है. तीन साल पहले हुए पंचायत चुनावों में बीजेपी को 10.16 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2019 में 40.23 प्रतिशत वोट मिले थे. सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, 'वामपंथी दल टीएमसी को हटाने के लिए बीजेपी का हाथ मजबूत करने के इरादे से उनके साथ आ गया है.'

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लेकिन, रविवार की ब्रिगेड रैली ये दिखाती है कि वामदलों का क्या रुख है और वाम दलों के पास कितनी ताकत है? तृणमूल-बीजेपी इसी के आधार पर बंगाल में अपना ब्लू-प्रिंट तैयार करेगी. इसके अलावा, पुलवामा घटना पर लोगों की राष्ट्रवादी भावना ने बीजेपी का हाथ मजबूत किया है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. अंग्रेजी में इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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