West Bengal Assembly Election 2021: बंगाल में तृणमूल-भाजपा की लड़ाई में वामदलों की भूमिका क्यों है अहम?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021

West Bengal Assembly Election 2021: सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने कहा, 'मुझे लगता है कि लोकसभा चुनावों में जो हुआ, वह फिर नहीं होगा. जनता जानती है कि बीजेपी और टीएमसी दोनों ही छद्म युद्ध कर रहे हैं.'

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 26, 2021, 10:39 AM IST
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पल्लवी घोष

कोलकाता. 
पश्चिम बंगाल (West Bengal Assembly Election 2021) में वामपंथी दल (Left Parties In Bengal) मुकाबला करने के मूड में दिख रहे हैं. बीते कुछ सालों में त्रिपुरा और बंगाल खो चुके वाम दल के पास फिलहाल सिर्फ केरल में सरकार है. हाल ही में यहां भी विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए हैं और कांग्रेस, सत्ता छीनने की फिराक में है. बंगाल में वाम दलों की गिरावट में बहुत तेजी रही. ना केवल साल 2019 के लोकसभा चुनाव में, बल्कि उसके पारंपरिक समर्थकों का एक वर्ग भारतीय जनता पार्टी में चला गया. माना जाता है कि वाम दलों के समर्थकों के भाजपा में गए वर्ग के चलते ही पार्टी 42 में से 18 लोकसभा सीटें जीती.

भले ही चल रहे बंगाल चुनावों की कथा काफी हद तक भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के इर्द-गिर्द केंद्रित हो, लेकिन वामपंथी दल राजनीतिक जानकारों को चौंका सकते हैं. चुनावी लोकतंत्र में वाम दलों का भविष्य दांव पर है.

सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने कहा, 'मुझे लगता है कि लोकसभा चुनावों में जो हुआ, वह फिर नहीं होगा. जनता जानती है कि बीजेपी और टीएमसी दोनों ही छद्म युद्ध कर रहे हैं. वे वास्तव में एक हैं.  केवल हम लोग ही इनका विकल्प हैं. लोग राज्य के चुनावों में अलग वोट देते हैं और वामपंथी दल अच्छा प्रदर्शन करेंगे.'
ममता आईं तो वामपंथियों के साथ क्या हुआ?

आंकड़ों की बात करें साल 2006 में 50% से साल 2011 में इसका वोट शेयर 40% तक गिर गया. साल  2016 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट का वोट शेयर आगे 26% तक गिर गया. इस विधानसभा चुनाव में यह अपने सहयोगी कांग्रेस से भी कम थी. सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुनिश्चित किया कि राज्य में उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वियों खत्म हो जाएं. माकपा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग टीएमसी में शामिल हो गया और शीर्ष वाम नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए.

वामपंथियों के साथ समस्या यह है कि इनके सबसे भरोसेमंद मतदाता भी इनकी जीत की बातों को खारिज कर रहे हैं. वामपंथी दलों को सबसे पहले उन मतदाताओं को आश्वस्त करना होगा जिनसे यह पूछा जा रहा है कि किसी ऐसी पार्टी के लिए वोट क्यों देना चाहिए जो वैसे भी हारने वाली है.





'वामदलों के खिलाफ- भाजपामुल'

बंगाल चुनाव में वाम दलों के प्रदर्शन की अहम भूमिका है. अगर वामपंथी अपने समर्थकों को वापस लाने में कामयाब होते हैं, तो इससे भाजपा को नुकसान होगा. दूसरी ओर, अगर कांग्रेस और फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी के भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (ISF) के साथ गठबंधन से मुस्लिम वोटों में बड़ा विभाजन हो जाता है, तो TMC को कड़ी टक्कर मिल सकती है.

नैहाटी से चुनाव लड़ रही इंद्राणी मुखर्जी ने कहा -'यह भाजपा या टीएमसी नहीं बल्कि भाजपामुल (भाजपा + तृणमूल) हमारे खिलाफ चुनाव लड़ रही है. वे एक-दूसरे की बी-टीम हैं, और इसलिए वामपंथी ही असली विकल्प हैं. हमने बंगाल को बहुत कुछ दिया है, और हम बंगाल को समझते हैं.'

यह खबर मूलतः अंग्रेजी में है. इसे यहां भी पढ़ सकते हैं- Searching For The Right Move: Why Left's Show Matters In Bengal's BJP-TMC Poll Battle
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