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    West Bengal Election 2021: 294 सीटें लेकिन चुनाव 292 पर ही क्यों? जानिए क्या कहते हैं पश्चिम बंगाल के चुनावी समीकरण

    2021 में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव 292 सीटों पर होंगे.
    2021 में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव 292 सीटों पर होंगे.

    पश्चिम बंगाल के चुनाव को करीब से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार कौशिक सेन के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी बीजेपी का चेहरा थे, जिसकी वजह से बंगाल में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया और पार्टी को 18 सीटें मिलीं. हालांकि, तब केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी के लिए लोगों ने वोट किया था और इस बार राज्य के लिए वोट करना है. ऐसे में परिस्थितियां बदली सी हैं, हालांकि दोनों ही पार्टियां मजबूत नजर आ रही हैं.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 20, 2020, 12:40 AM IST
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    बिहार विधानसभा (Bihar Vidhan Sabha Election) में जीत हासिल करने के बाद अब भाजपा (BJP) का पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल (West Bengal) को फतह करने पर है. अभी से ही बीजेपी के बड़े नेताओं ने जोर लगाना शुरू कर दिया है. साल 2016 के विधानसभा चुनाव में जहां तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) ने जीत हासिल की थी और भाजपा को 10.16 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 3 सीटें ही मिली थीं. वहीं, 2019 आते-आते परिस्थितियां बदल गईं और लोकसभा चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. बता दें कि पश्चिम बंगाल में कुल 294 सीटें हैं, जिसमें से 2 सीटों पर सदस्यों को मनोनित किया जाता है. ऐसे में चुनाव सिर्फ 292 सीटों पर ही होता है.

    क्या कहते हैं वोट शेयर?
    पश्चिम बंगाल में भाजपा का उभरना कभी बेहद मुश्किल माना जाता था, लेकिन संघ और पार्टी से जुड़े नेताओं ने कड़ी मेहनत की. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 17 फीसदी वोट के साथ कुल 2 सीटें मिली थीं, लेकिन 2019 में न सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ा, बल्कि सीटें भी बढ़ गईं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 2019 में पश्चिम बंगाल की 40.2 फीसद जनता ने वोट किया, जिसकी वजह से भाजपा को 18 सीटें मिलीं. वहीं, टीएमसी ने 2014 में 34 सीटें हासिल की थीं और उसका वोट शेयर 39.7 फीसदी था. लेकिन 2019 में टीएमसी को 12 सीटों का नुकसान हुआ और 22 सीटें मिलीं. हालांकि, उसका वोट शेयर बढ़कर 43.3 फीसदी हो गया. बता दें कि 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 211 सीटें जीतीं और उनका वोट शेयर था 44.91 फीसदी था, वहीं बीजेपी के हाथ तीन सीटें लगी थीं और उनका वोट 10.16 फीसदी था.

    पश्चिम बंगाल के चुनाव को करीब से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार कौशिक सेन के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी बीजेपी का चेहरा थे, जिसकी वजह से बंगाल में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया और पार्टी को 18 सीटें मिलीं. बात अगर 2019 लोकसभा के आंकड़ों के हिसाब से करें तो टीएसमी को 164 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली तो बीजेपी को 121 और कांग्रेस को 9 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल हुई थी. हालांकि, तब केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी के लिए लोगों ने वोट किया था और इस बार राज्य के लिए वोट करना है. ऐसे में परिस्थितियां बदली सी हैं, हालांकि दोनों ही पार्टियां मजबूत नजर आ रही हैं.




    NRC-CAA के मुद्दे का होगा असर?
    केंद्र सरकार ने देश में CAA बिल को जब से पास कराया, तब से ही इसका विरोध हो रहा है. लोग इसे NRC से भी जोड़ रहे हैं. इससे एक धड़ा केंद्र से नाराज है, तो दूसरा वर्ग इसके समर्थन में है. ऐसे में अल्पसंख्यक वोट का पश्चिम बंगाल में ध्रुवीकरण होता है तो इसका सीधा फायदा ममता बनर्जी को मिलेगा. हालांकि, यह कुल मतदाताओं का लगभग 28 प्रतिशत वोट ही होता है. वहीं, अगर NRC-CAA मुद्दे पर बहुसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण होता है तो इसका फायदा 70 फीसदी वोट के साथ सीधे-सीधे भाजपा को मिल सकता है. बता दें कि एनआरसी-सीएए का विरोध करने की वजह से हिंदू समुदाय ममता से नाराज भी हुआ था.

    किस ओर जाएगा मटुआ समुदाय?
    बंगाल में 23 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है. इनमें सबसे प्रमुख समुदाय मटुआ समुदाय है जिसको अपनी ओर करने के लिए राजनीतिक दल लगे हुए हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मटुआ समुदाय से जुड़े कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, विष्णुपुर और बोनगांव के क्षेत्रों में जीत हासिल की थी. यह समुदाय पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से से आता है. मटुआ समुदाय सीएए के तहत नागरिकता दिए जाने की मांग कर रहा है. बीजेपी सीएए के माध्यम से मटुआ शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देना चाहती है. ऐसे में ये समुदाय बीजेपी की ओर जा सकता है. हालांकि, इस समुदाय के साथ ममता बनर्जी के संबंध भी काफी अच्छे हैं. मटुआ समाज की कुलदेवी बीनापाणि देवी, 'बोरो मां', ने 2010 में ममता बनर्जी को मटुआ समाज का मुख्य संरक्षक बनाया था. इसके बाद ममता सरकार ने मटुआ समाज के लिए कई कार्य किए हैं. मगर सीएए को लेकर ममता सरकार का रुख अलग है. ममता सरकार सीएए का विरोध कर रही है.
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