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Opinion: बंगाल को दशकों की राजनीतिक हिंसा के खात्‍मे की जरूरत

राजनीतिक हिंसा से जूझ रहा है पश्चिम बंगाल. (File pic)

राजनीतिक हिंसा से जूझ रहा है पश्चिम बंगाल. (File pic)

2018 के अंत में पश्चिम बंगाल राजनीतिक हत्याओं के मामले में देश में टॉप पर रहा. 2019 और 2020 के आंकड़े कहां हैं? हमें नहीं पता क्योंकि राज्य सरकार ने इसे एनसीआरबी को देने से इनकार कर दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 4, 2021, 11:47 AM IST
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अभिषेक बनर्जी

1997 में तत्‍कालीन पश्चिम बंगाल सरकार (West Bengal) ने विधानसभा में यह बात स्‍वीकार की थी कि 1977 में वाम मोर्चे की सरकार बनने के बाद से राज्‍य में 28000 राजनीतिक हत्‍याएं हुई थीं. इस लिहाज से यह सालाना करीब 1400 राजनीतिक हत्‍याओं का आंकड़ा होता है. 20 साल में हर दिन करीब 4 हत्‍याएं. हालांकि यह सिर्फ सरकारी आंकड़े हैं.

यह चौंकाने वाली संख्या है. इससे राज्य और देश को सदमा और शोक हुआ होगा. इससे आश्चर्य भी नहीं हुआ होगा. इस आंकड़े को कुछ राजनीतिक करियर को समाप्त कर देना चाहिए था. इसने तो सेंध भी नहीं लगाई. तत्‍कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु लगातार ऊंचाई की ओर बढ़े. लोगों को याद होगा कि कैसे एक साल पहले 1996 में संयुक्त मोर्चा गठबंधन ने भी बसु को प्रधानमंत्री के पद की पेशकश की थी. राज्य के तत्‍कालीन गृह मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्जी, जिन्होंने इस आंकड़े को विधानसभा में पेश किया था, बाद में मुख्यमंत्री भी बने थे.



1960 और 1970 के दशक में बंगाल की धरती पर हत्या शुरू हुई और मौजूदा समय तक तीव्र रूप से जारी हैं. जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति की एक जगह दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई और किसी को भी यह पता नहीं चला कि इस वारदात को किसने अंजाम दिया. खून से सनी जमीन पर, डर की कहानी और खूब हत्‍याएं जैसे मरीचझापी नरसंहार, कालिमपोंग नरसंहार, नानूर नरसंहार समेत कई अन्‍य वारदातें हुईं. जब मैं छोटा था तो दक्षिण कोलकाता में स्थित अपनी दादी के घर कई बार गया. मुझे थोड़ा सा पता है कि सड़क के उस पार शहर के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक पर 17 लोग जिंदा जला दिए गए थे. यह आनंद मार्गीस का बिजोन सेतु नरसंहार था. इसमें कभी भी किसी एक की भी गिरफ्तारी नहीं हुई.
2018 के अंत में पश्चिम बंगाल राजनीतिक हत्याओं के मामले में देश में टॉप पर रहा. 2019 और 2020 के आंकड़े कहां हैं? हमें नहीं पता क्योंकि राज्य सरकार ने इसे एनसीआरबी को देने से इनकार कर दिया है. हम यह जानते हैं कि राजनीतिक जीवन के मुख्य पहलू के रूप में हिंसा के प्रति अब सहिष्णुता, यहां तक ​​कि स्वीकृति का एक चौंकाने वाला स्तर है. राज्‍य अब चुनावों की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में सामान्‍य लोगों के बीच लोकप्रिय शब्‍द 'खेला' और दूसरा लोकप्रिय शब्‍द बोमा यानी बम है.

भारत की राजनीतिक हिंसा का सबसे लंबा दुःस्वप्न 'राष्ट्रीय’ रडार के अंतर्गत इतनी आसानी से कैसे उड़ रहा है? निस्संदेह, टिप्पणी करने वालों के एक हिस्से के राजनीतिक झुकाव ने इसमें भूमिका निभाई है. 2018 के पंचायत चुनावों में कुल सीटों में से एक तिहाई पर भी विपक्षी उम्मीदवार नहीं थे. यह असामान्य है. यह डराने वाला है. लेकिन जब भी दिल्ली पुलिस वॉटर कैनन का इस्‍तेमाल करती है तो उस समय 'लोकतंत्र की मृत्यु' या 'मानवाधिकारों के उल्लंघन' के बारे में बात करने वाला वर्ग बंगाल के बारे में हमेशा अजीब तरह से चुप रहता है.

राजनीतिक हिंसा के मामले में पश्चिम बंगाल और केरल राष्ट्रीय स्तर पर क्यों खड़े हैं? इन राज्यों के परिदृश्य के लिए कौन सा राजनीतिक तत्व आम है? कौन जानता है? बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री निश्चित रूप से एक बात के बारे में सही हैं. आंकड़ों में वाम मोर्चे के दौर से की अपेक्षा राजनीतिक हिंसा कम हुई है. वह जानती होंगी. 1993 में एक विरोधी नेता के रूप में उन्होंने कोलकाता में एक मार्च का नेतृत्व किया था. पुलिस ने गोलीबारी की और 13 प्रदर्शनकारी मारे गए थे. ममता बनर्जी को घटना के दौरान खुद चोट लगी थी. जबकि हिंसा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में कम है, यह किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए अभी भी बहुत अधिक है.

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति से तीन तत्वों को हटाने की आवश्यकता है. इनमें से पहली है हिंसा है. केवल हिंसा ही नहीं, बल्कि इसके लिए सहनशीलता का भी अंत होना चाहिए. विचारधारा के नाम पर एक-दूसरे के खून के लिए लड़ने वाले बेरोजगार युवकों के साथ-साथ देश में बम के निर्माण से कुछ भी अच्छा नहीं होने वाला है. पिछले साल बीरभूम में एक ट्रक से करीब 39,000 डेटोनेटर बरामद किए गए थे. यह एक छोटी सेना के लिए पर्याप्‍त होते हैं. यह असामान्य है. इसे खत्‍म करने की जरूरत है.

दूसरा तत्व अभिजात्‍य वर्ग है. यह गहरी पैठ बनाए है. बहुत लंबे समय के लिए, राज्य और इसकी राजनीति को कोलकाता के आसपास एक निश्चित मंडली के साथ बहुत पास से पहचाना गया है. यह है तथाकथित भद्रलोक. केवल उनके विचार ही मायने रखते हैं. राज्य के बाकी हिस्‍से खासकर पुरुलिया और मिदनापुर जैसे आदिवासी क्षेत्र अक्सर बातचीत से गायब हैं. सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के आसपास के क्षेत्र और फरक्का बैराज के उत्तर में स्थित कोई भी क्षेत्र अक्सर अपनी स्वदेशी भाषा और संस्कृति के साथ पूरी तरह से भूला दिया जाता है. जाहिर है इस प्रणालीगत बहिष्ककार के लिए एक परेशान वर्ग और जाति है. जबकि बंगाल में जातिगत राजनीति बहुत कम है, शायद ही किसी अन्य राज्य में उच्च जातियों का राजनीतिक एकाधिकार है. यह बंगाल में वाम शासन की समस्यात्मक विरासतों में से एक है.



तीसरा तत्व नया है. यह है 'बाहरी व्यक्ति' का भयावह डर. भद्रलोक अभिजात्यवाद का एक दुष्प्रभाव मारवाड़ी समुदायों के प्रति सांस्कृतिक अरुचि के साथ शुरू हुआ, जो कोलकाता में बस गए थे. इसे जल्द ही झारखंड और बिहार से आने वाले मजदूरों तक पहुंचाया गया. वे हिंदी बोलने और बाहर के प्रभावों को अपने साथ लाने के आरोपी थे, इसका मतलब जो भी हो. अब देवी दुर्गा की पूजा और भगवान राम की पूजा के बीच की रेखाएं खींचने के लिए बयानबाजी हुई है. हालात इतने बेकाबू हैं कि 2019 में मुख्यमंत्री ने कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों का बोहिरगोटो (बाहरी लोगों) के रूप में विरोध किया. पागलपन को जल्‍द खत्‍म कर देना चाहिए, इससे पहले कि कहीं वो सबको निगल न लें. हर चुनाव नई आशाएं और नई संभावनाएं लाता है. (यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक गणितज्ञ और स्‍तंभकार हैं)
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